भक्तोंके लिये भगवान् साकार कैसे बनते हैं?

परमात्मा सत्-चित्-आनन्दघन नित्य अपाररूपसे सभी जगह परिपूर्ण हैं। उदाहरणके लिये अग्निका नाम लिया जा सकता है। अग्नि निराकाररूपसे सभी स्थानोंमें व्याप्त है, प्रकट करनेकी सामग्री एकत्र करके साधन करनेसे ही वह प्रकट हो जाती है। प्रकट होनेपर उसका व्यक्त रूप उतना ही लम्बा-चौड़ा दीख पड़ता है, जितना लकड़ी आदि पदार्थका होता है। इसी प्रकार गुप्तरूपसे सर्वत्र व्यापक अदृश्य सूक्ष्म निराकार परमात्मा भी भक्तके इच्छानुसार साकाररूपमें प्रकट होते हैं। वास्तवमें अग्निकी व्यापकताका उदाहरण भी एकदेशीय है; क्योंकि जहाँ केवल आकाश या वायु-तत्त्व है वहाँ अग्नि नहीं है, परंतु परमात्मा तो सब जगह परिपूर्ण है, परमात्माकी व्यापकता सबसे श्रेष्ठ और विलक्षण है। ऐसा कोई स्थान नहीं, जहाँ परमात्मा न हो और संसारमें ऐसी भी कोई जगह नहीं कि जहाँ परमात्माकी माया न हो। जहाँ देशकाल हैं वहीं माया है। मायारूप सामग्रीको लेकर परमात्मा चाहे जहाँ प्रकट हो सकते हैं। जहाँ जल है और शीतलता है वहीं बर्फ जम सकती है। जहाँ मिट्टी और कुम्हार है वहीं घड़ा बन सकता है। जल और मिट्टी तो शायद सब जगह न भी मिले; परंतु परमात्मा और उनकी माया तो संसारमें सभी जगह मिलते हैं। ऐसी स्थितिमें उनके प्रकट होनेमें कठिनता ही क्या है? भक्तका प्रेम चाहिये।

हरि ब्यापक सर्बत्र समाना।

प्रेम तें प्रगट होहिं मैं जाना॥

निराकारकी व्यापकताका विचार तो सभी कर सकते हैं, परंतु साकाररूपसे तो भगवान् केवल भक्तको दीखते हैं। वे सर्वशक्तिमान् हैं। चाहे जैसे कर सकते हैं। एकको, अनेकको या सबको एक साथ दर्शन दे सकते हैं। उनकी इच्छा है। अवश्य ही वह इच्छा लड़कोंके खेलकी तरह दोषयुक्त नहीं होती है। उनकी इच्छा विशुद्ध होती है। भक्तकी इच्छा भी भगवान‍्के भावानुसार ही होती है। भगवान‍्ने कहा है कि मैं भक्तके हृदयमें रहता हूँ। बात ठीक है। जैसे हम सबके शरीरमें निराकाररूपसे अग्नि स्थित है, उसी प्रकार भगवान् भी निराकार सत् -चित् -आनन्दघनरूपसे सभीके हृदयमें स्थित हैं, परंतु भक्तोंका हृदय शुद्ध होनेसे उसमें वे प्रत्यक्ष दीख पड़ते हैं, यही भक्तहृदयकी विशेषता है। सूर्यका प्रतिबिम्ब काठ, पत्थर और दर्पणपर समान ही पड़ता है, परंतु स्वच्छ दर्पणमें तो वह दीखता है, काठ, पत्थरमें नहीं दीखता। इसी प्रकार भगवान् सबके हृदयमें रहनेपर भी अभक्तोंके काष्ठसदृश अशुद्ध हृदयमें दिखलायी नहीं देते और भक्तोंके स्वच्छ दर्पण-सदृश शुद्ध हृदयमें प्रत्यक्ष दीख पड़ते हैं। भक्त ध्यानमें उन्हें जैसा समझता है वैसे ही वे उसके हृदयमें बसते हैं।

महात्मालोग कहा करते हैं कि जहाँ कीर्तन होता है, वहाँ भगवान् स्वयं साकाररूपसे उपस्थित रहते हैं। कीर्तन करते हुए भक्तको साकाररूपमें दीखते भी हैं। यह नहीं समझना चाहिये कि यह केवल भक्तकी भावना ही है। वास्तवमें उसे सत्यरूपसे ही दीखते हैं। केवल प्रतीत होनेवाला तो मायाका कार्य है। भगवान् तो मायाशक्तिके प्रभु हैं। महापुरुषोंकी यह मान्यता सत्य है कि—

मद्भक्ता यत्र गायन्ति तत्र तिष्ठामि नारद।

(आदि० १९। ३५)

यह हो सकता है कि भगवान् साकाररूपसे कीर्तनमें रहकर भी किसीको न दीखें, परंतु वे कीर्तनमें स्वयं रहते हैं, इस बातपर विश्वास करना ही श्रेयस्कर है।

जब भगवान् चाहे जहाँ जिस रूपमें भक्तके इच्छानुसार प्रकट हो सकते हैं, तब भक्त अपने भगवान‍्का किसी भी रूपमें ध्यान करे, फल एक ही होता है। मोरमुकुटधारी श्यामसुन्दर भगवान् श्रीकृष्णका ध्यान करे या धनुष-बाणधारी मर्यादापुरुषोत्तम भगवान् श्रीरामका करे। शंख, चक्र, गदा, पद्मधारी भगवान् श्रीविष्णुका ध्यान करे या विश्वरूप विराट् परमात्माका, बात एक ही है, जिस रूपका ध्यान करे उसीको पूर्ण मानकर करना चाहिये। इसी प्रकार जप भी अपनी रुचिके अनुसार ॐ, राम, कृष्ण, हरि, नारायण, शिव आदि किसी भी भगवन्नामका करे, सबका फल एक ही है। सगुणके ध्यानकी कुछ विधि ‘श्रीप्रेमभक्तिप्रकाश’ और ‘सच्चा सुख और उसकी प्राप्तिके उपाय’* नामक पुस्तकमें हैं, वहाँ देख लेनी चाहिये।

अब यहाँ भगवान‍्के विश्वरूपके सम्बन्धमें कुछ कहना है। भगवान‍्ने अर्जुनको जो रूप दिखलाया था, वह भी विश्वरूप था और वेदवर्णित भूर्भुव: स्व:रूप यह ब्रह्माण्ड भी भगवान‍्का विश्वरूप है। दोनों एक ही बात है, सारा विश्व ही भगवान‍्का स्वरूप है। स्थावर, जंगम सबमें साक्षात् परमात्मा विराजमान हैं। समस्त विश्वको परमात्माका स्वरूप मानकर उसका सत्कार और सेवा करना ही विश्वरूप परमात्माका सत्कार और सेवा करना है। विश्वमें जो दोष या विकार हैं वह सब परमात्माके स्वरूपमें नहीं हैं। ये सब बाजीगरकी लीलाके समान क्रीड़ामात्र हैं। नाम-रूप सब खेल हैं। भगवान् तो सदा अपने ही स्वरूपमें स्थित हैं। निराकाररूपसे तो परमात्मा बर्फमें जलकी भाँति सर्वत्र परिपूर्ण हैं, बर्फमें जलसे भिन्न अन्य कोई वस्तु नहीं है, जलकी जगह बर्फका पिण्ड दीखता है। वास्तवमें कुछ है नहीं, इसी प्रकार उस शुद्ध ब्रह्ममें यह संसार दीखता है, वस्तुत: है नहीं।

सगुणरूपसे अग्निकी तरह अव्यक्त होकर व्यापक है, सो चाहे जब साकाररूपमें प्रकट हो सकता है, यही बात ऊपर कही गयी है, इसी व्यापक परमात्माको विष्णु कहते हैं, विष्णु शब्दका अर्थ ही व्यापक होता है।