ध्यानकी दूसरी विधि
एकान्तस्थानमें बैठकर, आँखे मूँदकर ऐसी भावना करे कि मानो, सत् , चित् , आनन्दघनरूपी समुद्रकी अत्यन्त बाढ़ आ गयी है और मैं उसमें गहरा डूबा हुआ हूँ। अनन्त विज्ञानानन्दघन समुद्रमें निमग्न हूँ। समस्त संसार परमात्माके संकल्पमें था, उसने संकल्प त्याग दिया, इससे मेरे सिवा सारे संसारका अभाव होकर, सर्वत्र एक सच्चिदानन्दघन परमात्मा ही रह गये। मैं परमात्माका ध्यान करता हूँ तो परमात्माके संकल्पमें मैं हूँ, मेरे सिवा और सबका अभाव हो गया। जब परमात्मा मेरा संकल्प छोड़ देंगे, तब मैं भी नहीं रहूँगा, केवल परमात्मा ही रह जायँगे। यदि परमात्मा मेरा संकल्प न त्यागकर मुझे स्मरण रखें तो भी बड़े आनन्दकी बात है। इसी प्रकार भेदसहित निराकारकी उपासना करे।
इसमें साधनकालमें भेद है और सिद्ध-कालमें अभेद है; परमात्माने संकल्प छोड़ दिया; बस, एक परमात्मा ही रह गये। एक युक्ति यह है। इसके अतिरिक्त निराकारके ध्यानकी और भी कई युक्तियाँ हैं। उनमेंसे दो युक्तियाँ गीताप्रेससे प्रकाशित ‘सच्चा सुख और उसकी प्राप्तिके उपाय’ नामक पुस्तकमें बतलायी गयी हैं, वहाँ देखनी चाहिये। कहनेका अभिप्राय यह है कि निराकारका ध्यान दो प्रकारसे होता है—भेदसे और अभेदसे। दोनोंका फल एक अभेद परमात्माकी प्राप्ति ही है। जो लोग जीवको सदा अल्प मानकर परमात्मासे कभी उसका अभेद नहीं मानते, उनकी मुक्ति भी अल्प होती है, सदाके लिये वे मुक्त नहीं होते। उन्हें प्रलयकालके बाद वापस लौटना ही पड़ता है। इस मुक्तिवादसे वे ब्रह्मको प्राप्त हो करके भी अलग रह जाते हैं।
अब साकारके ध्यानके सम्बन्धमें कुछ कहा जाता है। साकारकी उपासनाके फल दोनों प्रकारके होते हैं। साधक यदि सद्योमुक्ति चाहता है, शुद्ध ब्रह्ममें एकरूपसे मिलना चाहता है तो उसमें मिल जाता है, उसकी सद्योमुक्ति हो जाती है। परंतु यदि वह ऐसी इच्छा करता है कि मैं दास, सेवक या सखा बनकर भगवान्के समीप निवास कर प्रेमानन्दका भोग करूँ या अलग रहकर संसारमें भगवत्प्रेम-प्रचाररूप परम सेवा करूँ तो उसको सालोक्य, सारूप्य, सामीप्य, सायुज्य आदि मुक्तियोंमेंसे यथा-रुचि कोई-सी मुक्ति मिल जाती है और वह मृत्युके बाद भगवान्के परम नित्यधाममें चला जाता है। महाप्रलयतक नित्यधाममें रहकर अन्तमें परमात्मामें मिल जाता है या संसारका उद्धार करनेके लिये कारक पुरुष बनकर जन्म भी ले सकता है; परंतु जन्म लेनेपर भी वह किसी फँसावटमें नहीं फँसता? माया उसे किंचित् भी दु:ख-कष्ट नहीं पहुँचा सकती, वह नित्य मुक्त ही रहता है। जिस नित्यधाममें ऐसा साधक जाता है, वह परमधाम सर्वोपरि है, सबसे श्रेष्ठ है। उससे परे एक सच्चिदानन्दघन निराकार शुद्ध ब्रह्मके अतिरिक्त और कुछ भी नहीं है। वह सदासे है, सब लोक नाश होनेपर भी वह बना रहता है। उसका स्वरूप कैसा है? इस बातको वही जानता है जो वहाँ पहुँच जाता है। वहाँ जानेपर सारी भूलें मिट जाती हैं। उसके सम्बन्धकी सम्पूर्ण भिन्न-भिन्न कल्पनाएँ वहाँ पहुँचनेपर एक यथार्थ सत्यस्वरूपमें परिणत हो जाती है। महात्मागण कहते हैं कि वहाँ पहुँचे हुए भक्तोंको प्राय: वह सब शक्तियाँ और सिद्धियाँ प्राप्त होती हैं जो भगवान्में हैं, परंतु वे भक्त भगवान्के सृष्टिकार्यके विरुद्ध उनका उपयोग कभी नहीं करते। उस महामहिम प्रभुके दास, सखा या सेवक बनकर जो उस परमधाममें सदा समीप निवास करते हैं, वे सर्वदा उसकी आज्ञामें ही चलते हैं। गीताके अध्याय ८। २४ का श्लोक इस परमधाममें जानेवाले साधकके लिये ही है। वृहदारण्यक और छान्दोग्य उपनिषद्में भी इस अर्चिमार्गका विस्तृत वर्णन है। इस नित्यधामको ही सम्भवत: भगवान् श्रीकृष्णके उपासक गोलोक, भगवान् श्रीरामके उपासक साकेतलोक कहते हैं। वेदमें इसीको सत्यलोक और ब्रह्मलोक कहा है। (वह ब्रह्मलोक नहीं, जिसमें ब्रह्माजी निवास करते हैं, जिसका वर्णन गीता अ० ८ के १६ वें श्लोकके पूर्वार्धमें है।) भगवान् साकाररूपसे अपने इसी नित्यधाममें विराजते हैं, साकाररूप मानकर नित्य परमधाम न मानना बड़ी भूलकी बात है।