आनन्द और शान्ति

श्रीभगवान् परम आनन्द और परम शान्तिके समुद्र हैं। उन श्रीभगवान‍्के साथ तुम्हारा सम्बन्ध जितना ही बढ़ता जायगा, उतना ही आनन्द और शान्ति भी तुम्हारे अंदर बढ़ते जायँगे।

फिर तुम जहाँ भी जाओगे, आनन्द और शान्तिको साथ लेते जाओगे और तुम्हारे आनन्द तथा शान्तिसे जगत‍्के प्राणियोंको भी यथायोग्य आनन्द और शान्तिकी प्राप्ति होगी।

साथ-ही-साथ तुम भी क्रमश: अधिक-से-अधिक आनन्द और शान्तिकी प्राप्ति करते जाओगे; क्योंकि तुम्हारा हृदय हर समय, हर स्थानमें उनका आकर्षण करता रहेगा।

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तुम्हारे हृदयका द्वार जिसके लिये खुला होता है तुम्हें वही वस्तु मिलती है और जो वस्तु अंदर होती है, उसीको अधिक पानेके लिये हृदयका द्वार भी खुला रहता है।

तुम यदि आनन्द और शान्ति चाहते हो तो आनन्द और शान्तिके सागर भगवान‍्से सम्बन्ध जोड़ो, तुम्हारे हृदयमें आनन्द और शान्ति आयेगी और ज्यों-ज्यों यह जगत‍्में फैलेगी, त्यों-ही-त्यों तुम्हारे अंदर भी बढ़ती जायगी।

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तुम यदि भगवान‍्के सम्बन्धको भूलकर शोक और अशान्तिसे भरे विषय-वैभवसे सम्बन्ध जोड़ोगे तो तुम्हें आनन्द और शान्तिके बदले शोक और अशान्तिकी प्राप्ति होगी।

फिर ज्यों-ज्यों तुम्हारा विषय-सम्बन्ध बढ़ता जायगा, त्यों-ही-त्यों शोक और अशान्ति भी बढ़ते जायँगे।

फिर तुम जहाँ जाओगे—शोक और अशान्ति भी तुम्हारे साथ जायँगे और जगत‍्के प्राणियोंमें फैलकर बदलेमें तुम्हारे शोक और अशान्तिको और भी बढ़ा देंगे।

तुम्हारे हृदयका दरवाजा आनन्द और शान्तिके लिये बंद हो जायगा और तुम शोक तथा अशान्तिसे सन जाओगे।

फिर जगत‍्की ऊँची-से-ऊँची किसी स्थितिमें भी तुम्हें आनन्द और शान्तिके यथार्थ दर्शन नहीं होंगे।

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इसलिये परम शान्ति और परमानन्दमय भगवान‍्के साथ सम्बन्ध जोड़ लो, फिर तुम जहाँ भी रहोगे—वहीं शान्ति और आनन्दको आकर्षित कर सकोगे और दूसरोंमें वितरण भी कर सकोगे।

उन मनुष्योंका संग करो, अधिक-से-अधिक समय उनके साथ रहने और उनके निकट होकर उनकी सेवा करनेमें बिताओ, जिनका हृदय परम शान्ति और परम आनन्दके समुद्र भगवान‍्में निमग्न है, उनके संगसे—अविरत संगसे तुम्हारे हृदयका भी भगवान‍्के साथ सम्बन्ध जुट जायगा। फिर तुम्हारे हृदयके द्वार भी परम आनन्द और परम शान्तिके लिये खुल जायँगे।

ऐसे महापुरुष जगत‍्में सर्वत्र शान्ति और आनन्दका प्रवाह ही बहाया करते हैं; जहाँ शोक, अशान्ति, विषाद और भय होता है, वहाँ यदि उनकी हृदयस्थ शान्ति और आनन्दकी किरणें पहुँच जाती हैं तो वे शोक, अशान्ति आदिके अन्धकारका नाश करके आनन्द और शान्तिकी अत्युज्ज्वल चाँदनी फैला देती हैं।