अपनी गलतियोंको देखो
संसारमें ऐसा कोई नहीं है, जिसमें कोई दोष न हो अथवा जिससे कभी गलती न होती हो। अतएव किसीकी गलती देखकर जलो मत और न उसका बुरा चाहो।
अपनी गलतियाँ देखो और उन्हें सुधारनेकी सतत चेष्टा करो। दूसरोंको देखना हो तो उन्हें उन्हींके दृष्टिकोणसे और उन्हींकी परिस्थितिमें पहुँचकर देखो, फिर उनकी गलतियाँ उतनी नहीं दिखायी देंगी।
ऐसा कभी मत सोचो कि हम दूसरोंको सुधारनेके लिये ही जीवन धारण करते हैं। पहले अपना सुधार करो। तुम्हारा सुधार हो गया तो जगत्का एक अंग अपने-आप ही सुधर गया। यों यदि सब अपना-अपना सुधार करने लगें तो सारा जगत् अपने-आप ही सुधर जाय।
दूसरोंको सीख देना मत सीखो; अपनी सीख मानकर उसके अनुसार बन जाना सीखो। जो सिखाते हैं, खुद नहीं सीखते—सीखके अनुसार नहीं चलते, वे अपने-आपको और जगत्को भी धोखा देते हैं।
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सच्ची कमाई है उत्तम-से-उत्तम सद्गुणोंका संग्रह। संसारका प्रत्येक प्राणी किसी-न-किसी सद्गुणसे सम्पन्न है। गुण देखोगे—गुण पाओगे। दोष देखोगे—दोष मिलेगा। दुनियाके प्राणियोंमें दोष-ही-दोष देखनेवाला दोषोंका समुद्र बन जाता है।
जिसका जीवन सुन्दर है, शुभ है—वही वास्तवमें सुन्दर है। परंतु जिसकी केवल बातें ही सुन्दर हैं, जीवन कलुषित है, वह तो पूरा कलंकी है। उसकी सुन्दर बातें वैसे ही हैं जैसे जहरसे भरे घड़ेके ऊपरका दूध अथवा मलसे भरा हुआ चमकीला मटका।
प्रतिक्षण अपनेको देखते रहो; जरा-सा भी दोष मनमें दिखायी दे तो उसे निकालनेकी कोशिश करो। तुम्हें फुरसत नहीं मिलनी चाहिये अपने सुधारसे।
जब तुम सचमुच सुधर जाओगे, तब तुम्हारे बिना बोले ही तुम्हारा जीवन जगत्को सीख देगा। बल्कि यदि उस हालतमें तुम एकान्तमें भी रहोगे, तब भी तुम्हारे अंदरके सद्गुणोंके सुवाससे जगत्को सुख और कल्याण प्राप्त होगा।
‘दूसरे लोगोंके साथ वैसा ही बर्ताव करो, जैसा तुम दूसरोंसे अपने लिये चाहते हो। सबके गुण देखो और अभिमान छोड़कर नम्रताके साथ उन्हें लेते चले जाओ।’
जैसे धनका लोभी चुपचाप धन कमानेमें लगा रहता है, वह धनके लिये व्याख्यान नहीं दिया करता, वैसे ही चुपचाप दैवी गुणोंकी सम्पत्ति कमानेमें लगे रहो। न तो ढिंढोरा पीटो और न केवल बात बनानेमें ही जीवन बिताओ।
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यह विचार छोड़ दो कि बिना डाँट-डपटके, बिना डराने-धमकानेके और बिना छल-कपटके तुम्हारे मित्र-साथी, स्त्री-बच्चे या नौकर-चाकर बिगड़ जायँगे। सच्ची बात तो इससे उलटी है। डर-डाँट और छल-कपटसे तो तुम उनको पराया बनाते हो और सदाके लिये उन्हें अपनेसे दूर कर देते हो।
प्रेम, सहानुभूति, सम्मान, मधुर वचन, सक्रिय हित, त्याग और निश्छल सत्यके व्यवहारसे ही तुम किसीको अपना बना सकते हो। तुम्हारा ऐसा व्यवहार होगा तो लोग तुम्हारे लिये बड़े-से-बड़े त्यागको तैयार हो जायँगे। तुम्हारी लोकप्रियता मौखिक नहीं होगी। लोगोंके हृदयोंमें बड़ा मधुर और प्रिय स्थान तुम्हारे लिये सुरक्षित हो जायगा। तुम भी सुखी हो जाओगे और तुम्हारे सम्पर्कमें जो आयेंगे, उनको भी सुख-शान्ति मिलेगी।
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याद रखो—तुम जो कुछ दोगे, वही तुम्हें एक बीजके असंख्य फलकी भाँति बहुत बड़े परिमाणमें वापस मिल जायगा। सुख चाहते हो, सुख दो, प्रेम चाहते हो, प्रेमका दान करो; हित चाहते हो, सबके हितकी बात सोचो; सम्मान चाहते हो, सबका सम्मान करो; सद्गुण चाहते हो, सद्गुणोंका दान करो और संसारमें शान्तिपूर्वक रहकर अन्तमें अनन्त शान्ति प्राप्त करना चाहते हो तो जगत्के जीव जिसमें शान्तिसे रह सकें—सहज ही शान्तिको प्राप्त कर सकें, ऐसे कर्म करते रहो।