आत्म-समर्पण
याद रखो—सच्ची शरणागति भगवान्के प्रति पूर्ण आत्म-समर्पण हो जानेपर ही सिद्ध होती है और सच्चा आत्म-समर्पण वह है, जिसमें अपने पास अपना कुछ रहे ही नहीं—शरीर, मन, बुद्धि, अहंकार, चेतना—सभी कुछ श्रीभगवान्के हो जायँ।
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याद रखो—जिसने भगवान्के प्रति आत्म-समर्पण कर दिया है, वह भगवान्के कार्यका आधार बन जाता है। उसके द्वारा फिर जो कुछ भी क्रिया होती है, सब भगवान्की ही होती है, उसका अपना अपने लिये पृथक् कुछ कार्य रहता ही नहीं।
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याद रखो—जिसने भगवान्के प्रति आत्म-समर्पण कर दिया है, वह सदा-सर्वदा प्रसन्नतापूर्वक यन्त्रकी भाँति भगवान्का कार्य करता रहता है। वह किसी भी स्थितिमें प्रतिकूलताका अनुभव नहीं करता। उसकी प्रतिकूलता-अनुकूलता भगवान्की मंगलमयी इच्छामें मिलकर नित्य सम उल्लासमयी स्थितिके रूपमें परिणत हो जाती है।
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याद रखो—जिसने भगवान्के प्रति आत्म-समर्पण कर दिया है, वह इस जगत्को दूसरे लोगोंकी भाँति जड, अनित्य और दु:खपूर्ण नहीं देखता, उसकी आँखें बदल जाती हैं और वह इस चर-अचरात्मक समस्त जगत्को प्रतिक्षण शाश्वत चिदानन्दमय श्रीभगवान्के रूपमें देखता है एवं इसके प्रत्येक परिवर्तन और सृजन-संहारमें वह भगवान्की दिव्यलीलाका अनुभव करके आनन्दमग्न रहता है।
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याद रखो—जिसने भगवान्के प्रति आत्म-समर्पण कर दिया है, वह नित्य परम शान्तिको प्राप्त करता है। अशान्ति या चित्तकी चंचलता तभीतक रहती है, जबतक चित्तमें जन्म-मृत्युमय जगत्के अनन्त अनित्य दृश्य भरे रहते हैं और जब चित्त भगवान्के चित्तमें मिलकर घुल-मिल जाता है, तब वह नित्य शान्तिमय भगवान्का निवासस्थल बन जाता है। सागरके ऊपर-ऊपर ही तरंगें उछलती हैं, उसका गम्भीर अन्तस्तल अत्यन्त शान्त होता है, इसी प्रकार चित्त जबतक बाहरी जगत्में रमता है, तबतक उसकी चंचलता नहीं मिटती, पर वही जब अनन्त अथाह गहराईमें जाकर भगवान्को पा जाता है, तब सर्वथा शान्त स्थितिमें पहुँच जाता है।
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याद रखो—जिसने भगवान्के प्रति आत्म-समर्पण कर दिया है—वह आनन्दका दिव्य और अटूट भण्डार बन जाता है। उसके द्वारा नित्य आनन्दका स्रोत बहता रहता है और वह जगत्के अनेकानेक त्रितापतप्त प्राणियोंको दिव्य शान्तिमयी आनन्दसुधा-धारामें बहाकर उनके तापको सदाके लिये मिटा देता है।
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याद रखो—जिसने भगवान्के प्रति आत्म-समर्पण कर दिया है—वह यदि कुछ भी नहीं करता तो भी उनका जगत्में अस्तित्व-मात्र ही जगत्के कल्याणमें बहुत बड़ा सहायक बनता है और जो महापातकी लोग भी उसके सम्पर्कमें आ जाते हैं, उनका भी जीवन पलट जाता है। वे घोर नरकसे निकलकर दिव्य भगवद्धाममें पहुँच जाते हैं और वे भी तरण-तारण बन जाते हैं।
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याद रखो—जिसने भगवान्के प्रति आत्म-समर्पण कर दिया है—उसके लिये भगवान्का दिव्य धाम उतर आता है, वह नित्य भगवद्धाममें ही सोता-जागता, चलता-फिरता, खाता-पीता और सारी क्रियाएँ करता है। वह कभी भगवान्से अलग नहीं होता और भगवान् कभी उससे अलग नहीं होते। उसके भीतर-बाहर सर्वत्र सदा भगवान् ही भरे रहते हैं।