भगवान् अशरण-शरण हैं
देखो, तुम्हारी क्या दशा है—शरीर रोगग्रस्त है, मन चंचल और अपवित्र है, बुद्धि व्यभिचारमें प्रवृत्त है, जीवन दु:खोंका घर बना है और यों ही रोते-चिल्लाते तुम सतत मृत्युकी ओर बहे चले जा रहे हो।
••••
संसार-समुद्रकी भीषण तरंगें उछल-उछलकर तुमपर चोट कर रही हैं। तुम कुछ भी विचार नहीं कर पाते कि इनसे कैसे छुटकारा होगा। कभी कुछ विचार स्थिर करने लगते हो तो उसी समय एक नयी तरंग आकर तुम्हें झकझोर डालती है और तुम्हारे विचारको बहाकर न मालूम कहाँ ले जाती है।
••••
इस प्रकार पता नहीं कितने दीर्घकालसे तुम इस दु:खसागरमें डुबकियाँ लगा रहे हो—कहीं भी न तो तुम्हें कोई बचनेका साधन दीखता है और न कहीं इसका ओर-छोर ही नजर आता है।
••••
तुम्हारी इस दुर्दशाका अन्त एक ही उपायसे हो सकता है। वह उपाय है—‘भगवान्के शरण होकर उन्हें पुकारना।’ भगवान्ने कहा है—‘जो मुझमें चित्त लगाते हैं, उनको संसार-सागरसे बहुत ही शीघ्र मैं तार देता हूँ।’ भवसागरकी भयानक तरंगोंसे बचना चाहते हो तो उनको पुकारो। उनसे कहो—‘नाथ! मैं जहाँ गया’ वहींसे गिरा; क्योंकि मुझे अभीतक कोई अच्युत मिला ही नहीं। तुम अच्युत हो, आज मैं दु:खी-दीन होकर तुम्हारी शरण आया हूँ। मुझे इस भयानक भयसे बचा लो।
••••
निश्चय समझो—तुम्हारी पुकार सच्ची होगी तो वे अवश्य-अवश्य तुमको बचा लेंगे। वे यह नहीं देखेंगे—तुम कौन हो, किस श्रेणीके हो, किस प्रकारके आचार-विचार रखते हो, पुण्यात्मा हो या पापी हो। वे देखेंगे केवल यही कि तुम्हारा उनपर—उनकी कृपापर विश्वास है या नहीं; और तुम्हारी पुकारमें कितनी सचाई है।
••••
याद रखो—भगवान् अशरण-शरण हैं, दीनबन्धु हैं, पतित-पावन हैं। तुम अपनेको यथार्थ ही अशरण, दीन और पतित मानकर उनकी ओर निहारोगे और अपनानेके लिये उन्हें पुकारोगे तो निश्चय ही वे तुम्हें वैसे ही अपनाकर, पवित्र बनाकर अपनी गोदमें ले लेंगे, जैसे स्नेहमयी जननी मैलेसे भरे प्यारे पुत्रको गोदमें उठाकर स्वयं अपने ही हाथों उसका मल धोकर उसे हृदयसे लगा लेती है।
••••
निश्चय करो—भगवान्के समान तुम्हारे प्यारे, निकट-से-निकट आत्मीय, प्राणोंके प्राण, जीवनके जीवन और आत्माके आत्मा केवल भगवान् ही हैं। तुम उनको बहुत ही प्यारे हो। प्यारे! प्यारसे उन्हें एक बार पुकारो तो सही। देखोगे, तुम्हें बदलेमें कितनी जल्दी और कितना अनोखा उनका प्यारा प्यार मिलता है।