भगवान् और भगवान‍्की लीला

याद रखो—दुनियामें दो ही चीजें हैं भगवान् और भगवान‍्की लीला। जड़-चेतन सब कुछ भगवान् हैं और इसमें जो कुछ हो रहा है, सब उनकी लीला हो रही है एवं जब भगवान् कल्याणमय—मंगलमय हैं, तब उनकी लीला भी वस्तुत: कल्याणमयी-मंगलमयी ही है।

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अपने-आपको समझो कि तुम कौन हो? माता-पिता, पुत्र-कन्या, पति-पत्नी, राजा-प्रजा, धनी-गरीब और वृद्ध-बालक आदि बाहरी रूप क्या तुम्हारा वास्तविक स्वरूप है? नहीं, कभी नहीं। तुम्हारा असली स्वरूप तो त्रिकालमें एक तथा एक-सा रहनेवाला आत्मा है, जो परमात्मा—भगवान‍्का अभिन्न सनातन अंश है और जो जगत‍्के सारे प्राणियोंमें एक है।

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उस विश्वात्मा भगवान‍्के अनन्तरूप ही जगत‍्के ये सब प्राणी हैं और वह विश्वात्मा भगवान् ही इन सब प्राणियोंकी विविध विचित्र क्रियाओंके रूपमें अपनी लीला कर रहा है। वह स्वयं अपने-आप ही, अपने-आपसे ही, अपने-आपमें ही और अपने-आप बने हुए खिलौनोंसे सदा खेल रहा है!

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खेल देखनेमें सुन्दर हो या भयानक, करुण हो या रौद्र, शान्त हो या बीभत्स......है खेल ही और उसके प्रत्येक स्तरमें तथा प्रत्येक स्थलमें खिलाड़ीकी सुन्दरतम समरस कलाका प्रदर्शन हो रहा है और साथ ही उसके अपने परम मधुरतम सौन्दर्यका भी!

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इस रहस्यको समझो और इस दृष्टिसे जगत‍्के कार्योंको, जगत‍्की घटनाओंको और जगत‍्के स्वरूपको देखो; फिर इस अनित्य और असुख जगत‍्में सर्वत्र, सब समय और सब रूपोंमें नित्य अनन्त कल्याणमय सत्य-शिव-सुन्दर सच्चिदानन्द भगवान‍्का दर्शन और स्पर्श प्राप्त होगा और तुम सदा-सर्वदा परम शान्ति, परमानन्दमें निमग्न रहोगे।

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याद रखो—तुम तभीतक भगवान‍्की इच्छाके साथ अपनी इच्छाका मेल नहीं कर सकते, जबतक अपनेको उनसे भिन्न, अपनी इच्छाको स्वतन्त्र और अपने विचारोंकी पृथक् सत्ता समझते तथा उन्हें महत्त्व देते हो!

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सब कुछमें और सम्पूर्ण क्रियाओंमें भगवान‍्की अखण्ड और अनन्त मंगलमयी सत्ताका अनुभव प्राप्त होनेपर सभी बातोंमें तुम उनसे सर्वथा सम्मत हो जाओगे। फिर अपनी स्वतन्त्र कामनाका अस्तित्व रहेगा ही नहीं और जब भगवान‍्की मंगलमयी इच्छासे तुम्हारी इच्छाका ऐक्य हो जायगा, तब तुम स्वाभाविक ही जगत‍्में सदा-सर्वत्र उनकी इच्छानुकूल परिस्थितिका अनुभव कर सकोगे। फिर, तुम्हारा सभीके साथ मेल हो जायगा; क्योंकि तुम सबमें एकमात्र उन्हींको देखोगे जो तुम्हारेमें हैं।

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यह निश्चय करो कि मैं भगवान‍्में हूँ, भगवान् मुझमें हैं और बाहर-भीतर भगवान‍्से पूर्ण होनेके कारण मैं नित्य मंगल और नित्य कल्याणमें ही स्थित हूँ।

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यह निश्चय करो कि जगत‍्में अमंगल है ही नहीं, क्योंकि भगवान‍्में कभी अमंगलकी कल्पना ही नहीं होती। जैसे छोटे शिशुके मनमें कामकी भावनाका अभाव होनेसे वह कामकी कल्पना भी नहीं कर सकता, इसी प्रकार जब तुम्हारे हृदयमें अमंगल-भावना नहीं होगी, तब तुम्हें जगत‍्में कहीं अमंगल नहीं मिलेगा।

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यह निश्चय करो कि बाहरी वर्ण, जाति, पद, व्यवसाय, शिक्षा, व्यवस्था और कार्य आदि मेरा स्वरूप नहीं है। मैं तो नित्य सच्चिदानन्दघन भगवान‍्में स्थित स्वरूपभूत अंश हूँ।

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यह निश्चय करो कि भगवान‍्की लीला कल्याणकारिणी है, अतएव मुझे कभी अकल्याण छू नहीं सकता। इसी प्रकार मुझसे भी किसीका अकल्याण नहीं हो सकता; क्योंकि मुझमें अकल्याण है ही नहीं।

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यह निश्चय करो कि मैं जहाँ रहूँगा, वहाँका वातावरण पवित्र-विशुद्ध और प्रेम-आनन्दसे पूर्ण रहेगा; क्योंकि प्रेमानन्दस्वरूप भगवान‍्ने ही मुझको अपनेमें स्थान दे रखा है।

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यह निश्चय करो कि मेरे पड़ोसीसे मुझको कभी कष्ट नहीं मिलेगा; क्योंकि मुझसे उसे कभी कष्ट मिलनेकी सम्भावना नहीं है। यह इसलिये कि जो मंगलमय सुहृत्तम भगवान् उसमें हैं, वही मुझमें हैं, फिर वे अपने-आपको ही कष्ट कैसे देंगे।

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असहिष्णु प्रेम प्रेम नहीं है; सहनशीलता प्रेमका एक अंग है। प्रेम ही सहना जानता है। वह अनन्त दु:खोंके पहाड़ोंको उठा लेता है, पर प्रेमास्पदकी प्रसन्नता देखकर उसीमें सुखका अनुभव करता है। उसे एक ऐसे सात्त्विक आनन्दकी अनुभूति होती है, जो स्वार्थपरायण भोगीको किसी भी अनुकूल-से-अनुकूल भोगदशामें भी नहीं होती। वरं यों कहना चाहिये कि स्वार्थपरायण भोगीके भाग्यमें तो ऐसे सात्त्विक आनन्दकी कल्पना भी नहीं आती।

लम्बे संयोग-वियोगकी दशामें कालक्रमसे कामकी प्रीति शिथिल होकर क्रमश: नष्ट हो जाती है; परंतु प्रेमका पवित्र बन्धन तो संयोग-वियोग दोनों ही अवस्थाओंमें दृढ़-से-दृढ़तर और दृढ़तम होता जाता है।