भगवान् ज्ञानमय, प्रेममय और आनन्दमय हैं
भगवान् ज्ञानमय, प्रेममय और आनन्दमय हैं। तुम उनके शरण होकर उनकी ओर चलने लगोगे तो तुम्हारे अंदर भी भगवान्के ये दिव्य गुण प्रकट होने लगेंगे। तुम भी ज्ञान, प्रेम और आनन्दको पाकर कृतार्थ हो जाओगे।
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तुम जितना-जितना ही भगवान्की ओर आगे बढ़ोगे, उतना-उतना ही तुम्हें ज्ञानका प्रकाश, प्रेमका अमृत और आनन्दका प्रवाह अधिक-से-अधिक मिलने लगेगा।
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जगत्में लोगोंको जो दिन-रात भटकते, वैर-विरोध करते और रोते-कलपते देखते हो, इसका यही कारण है कि वे ज्ञानसे रहित अज्ञानके अन्धकारमें, प्रेमसे शून्य द्वेष-द्रोहके विषकूपमें और आनन्दसे विरहित विषाद-शोकके प्रवाहमें पड़े हैं।
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जीवमात्र सच्चिदानन्दमय भगवान्के सनातन अंश हैं। उनमें भी भगवान्का ज्ञान, प्रेम और आनन्द है; पर वह छिपा है और उसके स्थानपर विरोधी भावोंका प्रकाश हो रहा है। इसीसे जीव दु:खी है। यद्यपि इन विरोधी भावोंकी आड़में भी ज्ञान, प्रेम और आनन्द ही भरे हैं।
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मनुष्य तो भगवान्की परम प्रिय सृष्टि है। अनुकूल संग मिल जाय और सच्चे हृदयसे कुछ साधनाका प्रयत्न हो तो थोडे़ ही आयाससे उसके अंदर छिपे हुए ज्ञान, प्रेम और आनन्दका उदय हो सकता है; क्योंकि वे उसमें सदा ही रहते हैं।
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मनुष्यको चाहिये कि वह प्रतिक्षण इस बातका निश्चय करता रहे कि मैं भगवान्का सनातन अंश हूँ। उनसे अभिन्न हूँ। उनके दिव्य गुणोंका भण्डार मुझमें भरा है। बस, वह भण्डार अब खुल गया है। मैं ज्ञान, प्रेम और आनन्दको पा गया हूँ। उनसे ओत-प्रोत हूँ, उन्हींमें डूब रहा हूँ। अब मुझपर कभी अन्धकारका अधिकार नहीं हो सकेगा। अब मेरे मनमें कभी द्वेष-द्रोह, ईर्ष्या-वैर, हिंसा-प्रतिहिंसाके भाव उत्पन्न नहीं होंगे। अब मैं कभी शोक-विषाद और दु:ख-दैन्यके दावानलसे नहीं जलूँगा।
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उसे निश्चय करना चाहिये, मैं सच्चिदानन्दघन भगवान्का हूँ। किसी पाप-ताप या दु:ख-दैन्यकी शक्ति नहीं, जो मेरे समीप फटक सके। मैं शुद्ध हूँ, चेतन हूँ, ज्ञान, प्रेम और आनन्दरूप हूँ। सदा सुखी, अपार सुखी और नित्य सुखी हूँ—सुखस्वरूप ही हूँ।
जगत्की कोई भी घटना मुझे अपनी स्थितिसे हिला नहीं सकती। जैसे अनन्त सागरके वक्ष:स्थलपर अनन्त लहरें उठती हैं और पुन: उसीमें समा जाती हैं, उसी प्रकार जगत्के उत्थान-पतनकी तरंगें सब मेरे परम आश्रय—मेरे अंशी भगवान्में ही उठती-समाती हैं। उन सभीमें मेरे भगवान् भरे हैं। वे सभी उनकी दिव्य लीलाकी ही तरंगें हैं। उन्हें देख-देखकर मुझे बड़ा ही उल्लास होता है। लीलामयकी लीला-लहरियाँ सभी आनन्दमयी हैं।
मेरे प्रभु ज्ञानमय हैं, प्रेममय हैं और आनन्दमय हैं—अतएव उनकी लीला भी ज्ञान, प्रेम और आनन्दसे परिपूर्ण है, चाहे उनका बाहरी रूप कैसा ही हो।
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यह निश्चय करना चाहिये कि मैं भगवान्को जान गया—पहचान गया हूँ। वे चाहे कैसे भी भयानक बीभत्स और रुद्ररूपमें प्रकट हों, कैसा ही विकट वेष धारण करके आवें, मैं उनसे कभी डरूँगा नहीं, पर उनके चरणोंमें गिर पडूँगा और उनकी लीलाको देख-देखकर प्रफुल्लित होऊँगा, हँसूँगा!