भगवान् मंगलमय
निश्चय करो—मेरे मनमें सदा-सर्वदा मंगलमय भगवान् निवास करते हैं। उनके समस्त दिव्य गुण और भाव मेरे मनमें सदा तरंगित हो रहे हैं। अब मैं उनके सिवा मनमें किसी भी अन्य वस्तुको और किसी भी बुरे विचार और भावको नहीं आने दूँगा।
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निश्चय करो—मैं सर्वत्र भगवान् और उनके मंगलमय भावोंको देखूँगा। सदा सद्विचार करूँगा, मेरे मुखसे सदा भगवान्की महिमाको बतानेवाले, सबका हित करनेवाले, सुख पहुँचानेवाले सत्य, मधुर और पवित्र वचन ही निकलेंगे।
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निश्चय करो—मैं कभी कोई ऐसा काम नहीं करूँगा, जो श्रीभगवान्की प्रसन्नताका कारण न हो। सदा उनकी सेवाके लिये ही उनके प्रीतिकर कर्म करूँगा। मेरी इच्छा सदा उन्हीं कर्मोंके करनेकी होगी, जिनसे भगवान् और उन्हींके अभिव्यक्त रूप जगत्के प्राणियोंको सुख होता हो।
निश्चय करो—मुझे कभी भी सद्विचार तथा सत्कर्मको छोड़कर अन्य किसी भी विचार तथा कर्मके लिये अवकाश ही नहीं मिलेगा। मन तथा शरीर नित्य भगवान्की सेवामें ही लगे रहेंगे। एक क्षणका भी सेवा-वियोग मुझको सहन नहीं होगा।
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निश्चय करो—मेरा कभी कोई अमंगल नहीं हो सकता, मेरा कभी कोई बुरा नहीं कर सकता, क्योंकि सभीमें सभी समय मेरे भगवान् ही निवास करते हैं और मेरे लिये जो कुछ भी जिस-किसीके द्वारा भी होता है, सब भगवान्के मंगलमय विधानसे मेरे मंगलके लिये ही होता है!
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निश्चय करो—संसारमें मुझको कोई भी मनुष्य या घटना कभी भी निराश या उदास नहीं कर सकते; क्योंकि मेरे परम सुहृद् भगवान् नित्य स्वाभाविक ही मेरा मंगल करते रहते हैं और जब सर्वशक्तिमान्, सर्वत्र विराजमान मेरे प्रभु मेरे मंगल-विधानमें संलग्न हैं, तब सफलतामें संदेहको स्थान ही कहाँ है, जिससे निराशा और उदासीकी सम्भावना हो।
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निश्चय करो—जब भगवान्के मंगलमय राज्यमें अमंगलको स्थान ही नहीं है, तब अमंगलकी कल्पना करके मैं क्यों व्यर्थ ही अमंगलको बुलाऊँ?
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निश्चय करो—जब सभीमें मेरे भगवान् भरे हैं, तब सभी मंगलसे ही ओत-प्रोत हैं। फिर मैं किसीमें अमंगलके दर्शन करके इस सत्यका हनन क्यों करूँ?
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निश्चय करो—जब सर्वत्र और सदा मंगल-ही-मंगल और आनन्द-ही-आनन्द है, तब मैं सदा आनन्दमें ही निमग्न रहूँगा। जीवन-मृत्यु, लाभ-हानि, सुख-दु:ख, मान-अपमान, स्तुति-निन्दा—किसी भी बाहरी अवस्थाका मेरी इस नित्य आनन्दमयी स्थितिपर कोई प्रभाव नहीं पड़ सकेगा।
याद रखो—यहाँ जो तुम्हें दोष, दु:ख, अमंगल तथा अशुभ दीखता है, वह इसीलिये दीखता है कि तुम सदा-सर्वत्र नित्य मंगलमय और आनन्दमय भगवान्को नहीं देख पा रहे हो। यहाँ जो कुछ ऊपरसे दीखता है—वह उन मंगलमय भगवान्के ही विभिन्न छद्मवेष हैं। उन्हींकी लीलाके विविध दृश्य हैं। इनकी आड़में नित्यानन्दघनस्वरूप भगवान् सदा विराजमान हैं।
याद रखो—तुम अशुभकी कल्पना करते हो। इसीसे तुम्हें दु:ख होता है। किसी भी अशुभ-से-अशुभ कहे और माने जानेवाले पदार्थ और भावमें भी, गहराईसे देखोगे तो तुम्हें परम शुद्ध और परम सुखस्वरूप भगवान् छिपे दिखायी देंगे। जहाँ जाओ, जहाँ देखो, उन्हें ही देखनेका प्रयत्न करो। अपनी तीक्ष्ण दृष्टिसे उन्हींका अनुसन्धान करो। उन्हें पहचान लो और निहाल हो जाओ।