भगवान् परम सुहृद् हैं

विश्वास करो—भगवान् सत्य हैं, नित्य हैं और सर्वत्र हैं। ऐसा कोई क्षण और स्थल नहीं जब जहाँ वे तुम्हारे साथ न हों।

विश्वास करो—भगवान् तुम्हारे परम सुहृद् हैं और वे सर्वशक्तिमान् हैं एवं तुम्हारे चाहते ही वे अपनी सारी शक्ति लगाकर तुम्हारा कल्याण करनेको प्रस्तुत हैं।

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विश्वास करो—भगवान‍्की प्रतिज्ञा है, ‘जो मुझे जैसे भजता है, मैं भी उसे वैसे ही भजता हूँ।’ तुम भगवान‍्से मिलनेको अधीर होओगे तो वे भी तुमसे मिलनेको अधीर हो उठेंगे, तुम उनको जैसे चाहोगे तो वे भी तुमको वैसे ही चाहेंगे और तुम उन्हें अपनी कोई प्रिय वस्तु दोगे तो वे भी तुम्हें अपनी प्रिय वस्तु देंगे।

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विश्वास करो—भगवान् सत्यसंकल्प हैं। वे जब तुमसे मिलनेका संकल्प करेंगे तब उसी क्षण तुमसे निर्बाध मिलकर तुम्हें कृतार्थ कर देंगे। तुम उन्हें चाहोगे अपने क्षुद्र, संकुचित और पाप-ताप-कलुषित जड मनसे, क्योंकि तुम्हारा मन ऐसा ही है और वे तुम्हें चाहेंगे अपने महान् विशाल और परम पवित्र दिव्य चिन्मय मनसे; क्योंकि उनका मन वैसा ही है। अत: उनके चाहते ही तुम कृतकृत्य और महान् बन जाओगे। तुम उन्हें दोगे अपनी कोई अनित्य, अपूर्ण और मायाजनित प्रिय वस्तु या अधिक-से-अधिक अर्पण कर दोगे अपना कर्मजन्य पांचभौतिक रक्तमांसमय घृणित शरीर, क्योंकि तुम्हारे पास वही है और वे तुम्हें देंगे अपनी नित्य पूर्ण शाश्वत दिव्य वस्तु या अर्पण कर देंगे अपना नित्यपूर्ण सर्वधर्ममय सच्चिदानन्दस्वरूप क्योंकि उनके पास वही है। सोचो कितना लाभ है, उनसे मिलनेकी चाहमें, उन्हें चाहनेमें और उन्हें कोई वस्तु समर्पण करनेमें।

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विश्वास करो—भगवान् तुम्हारे लिये कृपामूर्ति ही हैं—‘प्रभु मूरति कृपामयी है।’ उनके पास इस कृपाके विपरीत या इनके अतिरिक्त और कुछ है ही नहीं, तब फिर तुम क्यों डरते हो कि कभी भगवान‍्की अकृपा हो गयी या कृपा न हुई तो जाने क्या होगा? जब तुम्हें देनेके लिये उनके पास कृपाके अतिरिक्त दूसरी वस्तु है ही नहीं, तब वे देंगे कहाँसे और तुमको वह मिलेगी भी कैसे?

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विश्वास करो—जहाँ-कहीं दु:ख-संकट या पीड़ा-यातनाकी प्रतीति होती है, वहाँ वस्तुत: उनकी कृपा ही उस रूपमें प्रकट होकर तुम्हारा कोई महान् हित-साधन कर रही है, जिसको तुम जानते नहीं और इसीलिये उससे बचना चाहते हो, परंतु वे दयालु प्रभु तुम्हें उससे वंचित नहीं करना चाहते।

विश्वास करो—उनकी कृपाका कठोर रूप वैसा ही है जैसा निकम्मे खेलमें रमे हुए मैले-कुचैले और भूखे-नंगे पुत्रके प्रति स्नेहमयी जननीके द्वारा उसे नहलाने-धुलाने, खिलाने-पिलाने और सच्चा आराम पहुँचाकर सुखी करनेके उद्देश्यसे की हुई डाँट-डपट।

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विश्वास करो—भगवान् नित्य-निरन्तर तुम्हारे ऊपर अपनी कृपासुधा-धाराकी अनवरत-अजस्र वर्षा कर रहे हैं। तुम्हारे आगे-पीछे, दायें-बायें और ऊपर-नीचे केवल कृपाकी ही सुधाधारा बह रही है। तुम आपाद-मस्तक उसीमें सराबोर हो। तुम्हारी शक्ति ही नहीं जो उसको किसी ओरसे भी हटा सको।