भगवान‍्का द्वार सबके लिये खुला है

विश्वास करो—भगवान् अकारण सुहृद् हैं और परम करुणामय हैं। वे यह नहीं सोचते कि जीव सब दोषोंसे रहित होकर, परम विशुद्ध होकर मेरी शरणमें आयेगा, तभी उसे आश्रय मिलेगा। वे देखते हैं केवल एक बात, जीव मुझको ही अनन्य-गति समझकर मेरी शरणमें आना चाहता है या नहीं। यदि सचमुच चाहता है तो वह फिर चाहे जैसा भी पापी-तापी, दुराचारी-दु:खधारी, पतित-पीड़ित हो, भगवान् उसे अपना अभय आश्रय देते ही हैं।

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विश्वास करो—भगवान‍्का दरबार सबके लिये सदा खुला रहता है, जो भी वहाँ जाना चाहता है, सचमुच जाना चाहता है—उसीको जाने दिया जाता है और एक बार वहाँ पहुँच गया कि फिर उसके पाप-ताप, दुराचार-दु:ख, पतन-पीड़ा सदाके लिये समूल नष्ट हो जाते हैं।

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विश्वास करो—भगवान‍्के समान तुम्हारा अपना, सदा साथ देनेवाला आत्मीय, कभी किसी भी स्थितिमें घृणा न करनेवाला स्वामी और मित्र दूसरा कोई न है, न कभी हुआ है और न होगा। जिसको जगत‍्में कहीं भी स्थान नहीं मिलता, जो जगत‍्की दृष्टिमें सर्वथा नगण्य, तुच्छ, उपेक्षित और घृणित है, जिसको कहीं कोई भी अपना कहनेवाला तो है ही नहीं, दयाकी प्रेरणासे भी जिसकी ओर सुदृष्टिसे ताकनेवाला कोई नहीं है उसको भी भगवान् उतना ही प्यार करते हैं, जितना किसी भी दूसरेको।

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विश्वास करो—तुम कितना ही अपराध करो, कितना ही धोखा दो, कितना ही उसका तिरस्कार और अपमान करो; भगवान‍्के सहज प्यारमें कभी कोई अन्तर नहीं पड़ता। तुम्हीं जबतक मुख मोड़े रहोगे, तबतक उनके मधुर मुसकानभरे स्नेहपूर्ण वदनारविन्दकी झाँकीसे वंचित रहोगे, उनके स्नेह-सुधा-सागरमें अवगाहनका सौभाग्य नहीं पा सकोगे। इसमें चाहे कितना ही समय बीते, पर याद रखो—जिस क्षण तुमने उनकी ओर मुख मोड़ा, तुम देखोगे कि तुम्हारे किसी अपराधका, किसी धोखेका और तुम्हारे द्वारा किये हुए किसी तिरस्कार या अपमानका उन्हें मानो स्मरण ही नहीं है। जैसे स्नेहमयी जननीका वक्ष:स्थल शिशुके लिये सदा ही खुला रहता है, वैसे ही वे तुम्हें बड़े प्यारसे अपने हृदयसे चिपटानेको तैयार मिलेंगे।

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विश्वास करो—इतनेपर भी जो जीव उनकी ओरसे मुख मोड़े रहनेमें ही अपना गौरव मानता है; उसके समान अभागा और कोई नहीं है। सारे पाप-ताप सदा उसके लिये मुँह बाये खड़े रहते हैं और वह अपने जीवनमें किसी भी स्थितिमें कभी भी सच्ची सुख-शान्तिका साक्षात्कार नहीं कर सकता।

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विश्वास करो—मनुष्य जगत‍्में विषयोंकी दृष्टिसे चाहे जितना सौभाग्यवान् समझा जाय और जगत‍्में उसकी मान-प्रतिष्ठा तथा प्रशंसा-कीर्तिके चाहे जितने पुल बाँधे जायँ, असलमें वह बड़ा ही भाग्यहीन और निष्फल-जीवन है। मानव-जीवनकी सफलता भोगोंकी अधिकतामें नहीं है; वह तो प्रभुकी शरणागतिमें ही है।

सुनहु उमा ते लोग अभागी।

हरि तजि होहिं बिषय अनुरागी॥