भगवान‍्के आश्रय बिना सत्यादि गुण नहीं रह सकते

याद रखो—श्रीभगवान‍्के आश्रय बिना सत्य, अहिंसा, ब्रह्मचर्यादि सद‍्गुण वैसे ही नहीं ठहर सकते, जैसे बिना प्राणोंके शरीरकी इन्द्रियाँ। भगवान‍्का आश्रय न होनेपर सद‍्गुणोंसे मनुष्यके मनमें वह अभिमान उत्पन्न होता है, जो समस्त सद‍्गुणोंका नाशक और दुर्गुणोंका जनक है और तुरंत ही अपने परिवारको फैलाकर सद‍्गुणोंको हृदयसे निकाल देता है।

याद रखो—अभिमान मनुष्यको अपने दोष देखनेका अवसर ही नहीं आने देता, वह निरन्तर उसे अन्धा बनाये रखता है; जिससे मनुष्य अपनी तनिक-सी भी सच्ची समालोचना जो उसके लिये परम हितकर होती है, नहीं सह सकता; एवं इसलिये सहज ही दोषोंका घर बन जाता है।

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याद रखो—जो मनुष्य अभिमानके वशमें होकर केवल जगत्-सम्मानके लिये लालायित हो उठता है, उसमें एक ऐसी दुर्बलता आ जाती है, जो उसके हृदयमें एक विषाक्त क्षत कर देती है। फिर वह सम्मानके लोभसे अपने अपराध, पाप, दोष, स्वार्थपरता, कृतघ्नता, नीचाशयता, परस्वापहरणता, परसुखकातरता आदि जघन्य वृत्तियोंको छिपाकर अपनेको सत्पुरुष प्रसिद्ध करनेके लिये न मालूम कितनी नयी-नयी झूठ बोलता है, कितने सुन्दर स्वाँग बनाता है और कितने उपदेश करता है, इससे उसको परिणाममें सम्मान तो मिलता ही नहीं; प्रत्युत उसके भीतरका घाव बढ़ता ही जाता है एवं अन्तमें ऐसी स्थिति हो जाती है कि एक दिन उसकी भीषण यन्त्रणासे छटपटाकर उसे आर्त पुकार करनी पड़ती है, परंतु फिर उसकी रक्षाका कोई सहज साधन नहीं रह जाता।

याद रखो—जो अपने अपराधोंको छिपाता है और दूसरोंपर सहस्रों नये-नये दोष मढ़नेका प्रयत्न करता है, वह बड़ा ही अभागा है। उसमें सहज ही सद‍्गुण आ ही नहीं सकते। सद‍्गुणोंको लाना और उन्हें स्थायीरूपसे अपने अंदर बसाना हो तो समस्त सद‍्गुणोंके समुद्र भगवान‍्को हृदयमें बसा लो।

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याद रखो—भगवान‍्के हृदयमें आते ही समस्त दुर्गुण वैसे ही नष्ट हो जायँगे, जैसे सूर्यका उदय होते ही अन्धकार मर जाता है। जगत‍्का यह सूर्य तो फिर छिपता भी है, परंतु भगवान् एक बार जिसके हृदयमें उदय हो जाते हैं—फिर वे कभी छिपते ही नहीं; एक बार जिसके हृदयमें आ बसते हैं, फिर वहाँसे निकालनेपर भी नहीं निकलते।

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याद रखो—दुर्गुणोंका ही परिणाम दु:ख है, जब दुर्गुण नहीं रहेंगे, तब दु:ख भी नहीं रहेंगे और सद‍्गुण आ जायँगे तो सद‍्गुणोंका स्वाभाविक परिणाम सुख भी अनायास ही आयेगा। साथ ही भगवान‍्की निवासभूमिमें सद‍्गुण उनके स्वभावगत होनेसे सबसे बड़ा लाभ यह होगा कि ये सद‍्गुण फिर कभी नष्ट नहीं होंगे, इसलिये सुख भी स्थायी और आत्यन्तिक होगा।

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याद रखो—वस्तुत: सुख किसी सद‍्गुणमें नहीं है या सद‍्गुणका परिणाम भी नहीं है। यह तो भगवान‍्में स्वभावगत वैसे ही है, जैसे सूर्यमें स्वभावत: ही प्रकाश और उष्णता होती है और उनसे अन्धकार एवं सर्दीका स्वाभाविक नाश होकर विलक्षण दृष्टिशक्ति और स्फूर्ति प्राप्त होती है। भगवान‍्से रहित जो सद‍्गुण हैं, वे वस्तुत: सद‍्गुण ही नहीं हैं। वे तो वैसे ही नकली गुण हैं, जैसे मिट्टीपर रंग चढ़ाये हुए नकली आम, अमरूद, संतरे, सेव आदि खिलौने होते हैं, जो ऊपरसे फल-से दीखते हैं परंतु वे हैं केवल मिट्टी-ही-मिट्टी। इसी प्रकार भगवान‍्से रहित सद‍्गुण केवल कल्पनामात्र होते हैं। इस बातको समझो और समझकर निरन्तर अपने हृदयमें भगवान‍्को बसानेका प्रयत्न करो।

याद रखो—भगवान् तो सभीके हृदयमें हैं, परंतु तुम इस बातपर विश्वास नहीं करते, इसीसे नित्य निवास करनेवाले भगवान् भी वहाँ प्रकट नहीं हो पाते और इसीसे सद‍्गुण टिक नहीं पाते तथा दुर्गुणोंका परिवार बढ़ता रहता है। भजनके द्वारा विश्वास प्राप्त करो और फिर विश्वासकी आँखोंसे देखो, भगवान् तुम्हारे अंदर प्रकट हो जायँगे। उनके प्रकट होते ही तुम सब प्रकारसे निहाल हो जाओगे।