भगवान्के अस्तित्वमें विश्वास
निश्चय करो—भगवान् हैं, भगवान् ही एकमात्र तुम्हारे परम प्रयोजनीय हैं—तुम्हें केवल उन्हींकी आवश्यकता है और तुम उन्हें पानेके निश्चित अधिकारी हो।
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जबतक मनुष्य किसी वस्तुके अस्तित्वमें, उसके प्राप्त करनेकी आवश्यकतामें और उसे प्राप्त करनेकी अपनी योग्यता और अधिकारमें पूर्ण श्रद्धा नहीं रखता तबतक उस वस्तुकी प्राप्तिके साधनमें तत्पर नहीं होता।
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जो सोचता है कि ‘पता नहीं वह वस्तु है या नहीं; जो सोचता है, वस्तु तो है पर मेरा काम तो उसके बिना भी मजेमें चलता है’ उसकी ऐसी क्या आवश्यकता है कि केवल उसीके पीछे सब कुछ छोड़ दूँ, इतनी दूसरी-दूसरी वस्तुएँ भी तो मेरे सुखकी साधन हैं और जो यह सोचता है कि ‘वस्तु भी है और आवश्यक भी है—उसके प्राप्त होनेमें ही जीवनकी सफलता भी है, परन्तु मुझ-सरीखे अनधिकारीको, मुझ-सरीखे अयोग्यको वह वस्तु मिल नहीं सकती’—वह कभी भी उस वस्तुकी प्राप्तिके लिये प्राणपणसे पूरा प्रयत्न नहीं कर सकता।
इसीलिये जो लोग भगवान्के अस्तित्वमें संदेह करते हैं, जीवनकी सफलताके लिये भगवान्की अनिवार्य आवश्यकता नहीं समझते और अपनेको भगवत्प्राप्तिके अयोग्य मानते हैं, वे भगवत्प्राप्तिके लिये साधना नहीं कर सकते।
पर सत्य तो यह है कि भगवान् हैं और नित्य सत्य हैं! जीव-जीवनकी सफलताके लिये—अचल, अखण्ड, नित्य सत्य पूर्ण आनन्दकी प्राप्तिके लिये—जिसकी मनुष्यमात्रको आकांक्षा है—भगवान्की ही अनिवार्य आवश्यकता है और मनुष्ययोनि भगवत्प्राप्तिके अधिकारके साथ ही मिलती है, अतएव कोई भी मनुष्य चाहे तो प्रयत्न करके भगवत्प्राप्ति कर सकता है।
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अन्यान्य वस्तुएँ तो प्रारब्धाधीन हैं, किये हुए कर्मोंके फलरूपमें प्राप्त होती हैं, परंतु भगवान् तो केवल अनन्य इच्छा होनेसे ही मिल जाते हैं; क्योंकि जीव उनका सनातन अंश है, उनके साथ अखण्ड सम्बन्ध रखता है और उन्हींसे ओत-प्रोत है। वह जभी सारे अन्यान्य मनोरथोंका त्याग करके भगवान्को पानेकी इच्छा करेगा, जभी अपने नित्य अभिन्न अंशी परम प्रभु भगवान्के लिये व्याकुल होकर उसके प्राण रो उठेंगे, बस, भगवान् तभी प्राप्त हो जायँगे।
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भगवान्के समान अपना आत्मीय, अत्यन्त समीप और नित्य-निरन्तर सर्वत्रका साथी अपना और कोई भी तथा कुछ भी नहीं है। जैसे अपनी चीजपर—अपनेपर अपना अधिकार होता है, वैसा ही अधिकार परम प्रेममय प्रभुपर तुम्हारा है। अन्यान्य वस्तुएँ तो जड या सीमित ज्ञानवाली होनेके कारण चाहे तुम्हारे मनकी व्याकुलताको तथा तुम्हारे अधिकारको नहीं समझें; पर भगवान् तो सर्वव्यापी सर्वतश्चक्षु तथा नित्य सत्य चेतनानन्दघन होनेसे तुम्हारी हर एक बातको जानते हैं। जब देखेंगे कि तुम्हारे मनमें उनकी—एकमात्र उन्हींकी चाह जाग उठी है, तुम उनके दर्शनके लिये आतुर हो, बस, तभी तुरंत वे तुम्हें दर्शन देकर, तुम्हारे अपने बनकर तुम्हें सदाके लिये कृतार्थ कर देंगे!