भगवान्के बिना सर्वत्र दु:ख-ज्वाला है
अंधेकी तरह इधर-उधर ठोकरें खाकर इस महामूल्य मानव-जीवनको व्यर्थ ही क्यों नष्ट कर रहे हो, क्यों रात-दिन दु:खोंसे छटपटाते हो? आठों पहर सुखके लिये हाय! हाय! करते हो—सोते-जागते सब समय प्रमादमें पड़े तड़पते रहते हो। कहीं भी मिला सुख? जिसको भी सुख समझकर छातीसे लगाने जाते हो, वही दु:खकी ज्वालासे तुम्हें झुलस देता है। जहाँ भी सुखकी कल्पना करते हो, वहीं दु:खकी चट्टानसे टकराकर चूर-चूर हो जाते हो। मानमें, यशमें, धनमें, जनमें, स्त्रीमें, स्वामीमें, पुत्रमें, कन्यामें सभी जगह भय-चिन्ता है। तो क्या यहाँसे हट जानेपर सुख मिलेगा? कहीं भी दर्शन हुए सुखके? कहीं नहीं। सभी जगह दु:ख-ज्वाला है।
हटकर कहाँ जाओगे? जहाँ जाओगे, वहीं यही मिलेगा। हटनेकी जरूरत नहीं है। जरूरत है इस सत्यको समझ लेनेकी कि एकमात्र भगवान्में ही परम सुख है और वे भगवान् सर्वत्र, सर्वदा और सर्वथा परिपूर्ण हैं। जब इस सत्यका साक्षात्कार हो जायगा, तब सभी देश, सभी काल और सभी अनुकूल-प्रतिकूल दीखनेवाली परिस्थितियोंमें तुम्हें भगवान्के दर्शन होंगे। तभी तुम इस प्रकार सब ओरसे सब समय उन्हें पाकर ही यथार्थ सुखकी उपलब्धि कर सकोगे।
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जगत्में तुम जो इतने जल रहे हो; सर्वत्र ही जो अभाव, भय, दु:ख और विनाशका ताण्डव नृत्य दिखायी पड़ रहा है—इसका कारण यही है कि तुम भगवान्से शून्य जगत्को देखते हो। जहाँ भी भगवान्का अभाव माना जाता है, वहीं तमाम अभाव, तमाम भय, तमाम दु:ख और तमाम विनाश अपनी सारी भयावनी सेनाको साथ लिये डेरा डाले पड़े रहते हैं। इन शत्रुओंके घेरेसे तुम तबतक नहीं निकल सकते, जबतक कि तुम भगवान्को सर्वत्र परिपूर्ण समझकर उनके दर्शन न पा लो।
भगवान् सर्वत्र हैं, इसलिये नित्य तुम्हारे साथ हैं। उनको देखकर सदाके लिये सुखी हो जाओ! तुम ऐसा कर सकते हो। सत्यस्वरूप तुमको सत्यकी प्राप्तिका पूर्ण अधिकार है। वह तो तुम्हारा ही स्वरूप है।