भगवान‍्की इच्छामें अपनी इच्छा मिला दो

याद रखो—तभीतक तुम्हारा निर्णय भ्रमपूर्ण, संदिग्ध और परिणाममें हानिकारक होता है, जबतक कि तुम्हारे मनमें काम, क्रोध, लोभ, स्वार्थ, घृणा, द्वेष, अभिमान, भय, प्रतिशोधकी भावना, वैर और हिंसादि दोष वर्तमान हैं और भगवान‍्की दिव्य वाणीकी स्फुरणाके लिये खुला मार्ग नहीं है।

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याद रखो—जब तुम मनको दोषोंसे मुक्तकर भगवान‍्की कृपाके प्रकाशसे भर लोगे और शुद्ध भगवदीय विचार जिनमें आगे-पीछे सर्वत्र परहितकी भावना भरी होगी, तुम्हारे मनको छा लेंगे, तब तुम्हारा जो कुछ भी निर्णय होगा, वह निर्भ्रान्त, सत्य और परिणाममें हितकारक होगा।

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याद रखो—व्यक्तिगत स्वार्थ मनुष्यके ज्ञानको हरकर उसे अंधा बना देता है, फिर उसकी बुद्धिपर पर्दा पड़ जानेके कारण वह यथार्थ निर्णय नहीं कर सकती। जो बुद्धि स्वार्थसे ढकी नहीं होती, उसीके द्वारा भगवान‍्के ज्ञानका प्रकाश होता है।

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याद रखो—जिस हृदयमें नित्य-निरन्तर भगवान् विराजित रहते हैं, उस हृदयमें दैवी सम्पत्तिके गुण—त्याग, क्षमा, वैराग्य, नि:स्वार्थभाव, प्रेम, सुहृदता, विनय, निर्भयता, सहिष्णुता, स्नेह और अहिंसा आदि—स्वाभाविक ही रहते हैं और वहींसे भगवान‍्की दिव्य वाणी स्फुरित हुआ करती है।

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याद रखो—जब तुम्हारा मन भगवदीय सत्यको प्राप्त करनेके लिये उत्सुक तथा उन्मत्त होगा, तब उसमें स्वयं ही उस सत्यका प्रकाश होगा और तब जो कुछ निर्णय होगा, वह सत्य ही होगा।

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याद रखो—जब तुम्हारे हृदयमें दूसरोंका हित ही अपने हितके रूपमें प्रकट होगा, तब उसमें स्वाभाविक वही विचार आयेंगे, जो परहितकारक होंगे और तदनुसार ही निर्णय होगा तथा जिस निर्णयमें परहित भरा है, उस निर्णयसे परिणाममें अपना अहित कभी हो ही नहीं सकता।

याद रखो—जब मनुष्यके हृदयमें भगवत्प्रेमका प्रादुर्भाव होता है, तब उसको जगत‍्में कोई पराया दीखता ही नहीं। ऐसी अवस्थामें उसका स्वार्थ भी विस्तृत हो जाता है, फिर वह जगत‍्के भलेमें ही अपना भला देखता है, किसी एक क्षुद्र प्राणीका अहित भी उसे सहन नहीं होता; इस प्रकारके प्रेमका प्रकाश स्वार्थके अन्धकारको सर्वथा नष्ट कर देता है। फिर उस प्रकाशमें जो कुछ निर्णय होता है वह सर्वथा मंगलमय होता है।

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याद रखो—जब तुम भगवान‍्की इच्छामें अपनी इच्छा मिला दोगे, तभी तुम्हारा निर्णय निष्पक्ष निर्भ्रान्त होगा।

याद रखो—भगवान‍्की इच्छासे विरुद्ध इच्छा रखनेवालेकी इच्छा कभी सफल तो होती ही नहीं; पद-पदपर उसे असफलता, निराशा और वेदनाका सामना करना पड़ता है। उसका प्रत्येक निश्चय, प्रत्येक विचार भ्रान्त और परिणाममें पीड़ादायक होता है—तथा उसका जीवन नित्य अशान्तिमें ही बीतता है।

याद रखो—तुम यदि अपनेको भगवान‍्के प्रति सौंप देते हो, अपनी इच्छाओंको भगवान‍्की इच्छामें मिला देते हो एवं अपने ज्ञान और बलको भगवान‍्के ज्ञान और बलका अंश मान लेते हो तो निश्चय समझो—फिर तुम भगवान‍्की मंगलमयी इच्छासे मंगलमय बनकर भगवान‍्के नित्य, सत्य और अचिन्त्य अपरिमित बलसे सुरक्षित होकर केवल अपना ही कल्याण नहीं करोगे; तुम्हारा प्रत्येक विचार, तुम्हारा प्रत्येक निश्चय और तुम्हारी प्रत्येक क्रिया अखिल जगत‍्का मंगल करनेवाली होगी।