भगवत्प्रीत्यर्थ कर्म करो

याद रखो—तुम जो शरीर, धन, स्त्री, स्वामी, पुत्र और आत्मीय आदिमें मोहवश प्रीति करते हो, उसमें तुम्हें कम त्याग नहीं करना पड़ता; परंतु उस त्यागका तुम्हें कोई श्रेष्ठ फल नहीं मिलता। मिलता है—केवल दु:ख, नैराश्य और बन्धन ही। यदि यही प्रीति मोहवश न करके ईश्वरके लिये करने लगो, यदि यही त्याग भगवान‍्की सेवाके भावसे करने लगो तो तुम्हारा महान् कल्याण हो सकता है।

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याद रखो—स्नेह, प्रीति और तज्जनित त्याग जब भोगोंके प्रति होता है, तब उसका नाम आसक्ति है और भगवान‍्के प्रति होता है तो उसका नाम भक्ति होता है।

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याद रखो—भोगासक्त सकामी पुरुषके हृदयमें भक्तिका निवास नहीं होता। कामना पूर्ण नहीं होती, तबतक तो उसके हृदयमें वैसे आग लगी रहती है और यदि कहीं कामनाकी पूर्ति हुई तो कामनाकी आग और भी बढ़ जाती है। इसलिये भक्तिदेवी उससे दूर हट जाती है। भक्तिकी प्राप्तिके लिये विषय-कामनाका त्याग अति आवश्यक है।

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याद रखो—कामनाके विषयको बदलकर उसे शुद्ध कर लोगे तो फिर वह स्वत: ही प्रेमके रूपमें परिणत हो जायगी। अपनी इन्द्रियोंकी तृप्तिके लिये होनेवाली इच्छाका नाम ‘काम’ है और भगवत्प्रीत्यर्थ होनेवाली इच्छाका नाम ‘प्रेम’ है। कामनाका विषय इन्द्रिय-सुख न हो, भगवत्प्रीति हो। ऐसा होते ही कामना प्रेमके रूपमें परिणत होकर विशुद्ध हो जायगी।

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याद रखो—प्रेममें प्रेमास्पदकी प्रीतिके अतिरिक्त अन्य कोई कामना रहती ही नहीं। रहती है तो वह प्रेम नहीं है, प्रेमके नामपर मोह बैठा हुआ है। प्रेमके साम्राज्यमें बसनेवाला प्रेमी भक्त अपना सर्वस्व श्रीभगवान‍्के अर्पण करके भगवान‍्को अपना बना लेता है। उसके धन, मकान, पुत्र, स्त्री, यश, कीर्ति आदि सब भगवान‍्के हो जाते हैं और भगवान् उसके बन जाते हैं। इसलिये फिर वह जो कुछ करता है, सब अपने प्रेमास्पद भगवान‍्के लिये ही करता है।

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याद रखो—तुम अपने वर्णाश्रमके अनुसार जो कुछ करते हो उसे छोड़नेकी आवश्यकता नहीं है। स्त्री, पुत्र, घर-परिवार आदिकी सेवा करते हो, उसे भी वैसे ही करते रहो, परंतु करो सब कुछ भगवत्प्रीत्यर्थ। जब तुम्हारे सारे काम भगवान‍्के लिये होने लगेंगे, तब उनमेंसे दोष-पाप अपने-आप ही निकल जायँगे, क्योंकि फिर तुम उन्हीं कामोंको करोगे, जिनको भगवान् पसंद करते होंगे और भगवान् उन कार्योंको ही पसंद करते हैं, जो शास्त्रोक्त, सर्वथा निष्पाप, सर्वहितकारी और मंगलमय होते हैं।

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याद रखो—शास्त्रोक्त कर्मका सम्पादन यथार्थमें उसीके द्वारा होता है, जो शास्त्रके आत्मा तथा प्रतिपाद्य भगवान‍्के लिये कर्म करता है, क्योंकि उसका अपना पृथक् कोई स्वार्थ रह ही नहीं जाता। पृथक् भोग भोगनेकी लालसा उसकी रहती ही नहीं। जितने भी शास्त्रविरुद्ध आचरण होते हैं, वे सब स्वार्थवश या भोगलालसाके कारण होते हैं। जब अपने लिये कर्म होंगे ही नहीं, केवल भगवान‍्के लिये ही होंगे, तब अशास्त्रीय क्यों होंगे? वरं वस्तुत: उसीके कर्म शास्त्रीय होंगे।

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याद रखो—जो पुरुष भगवत्प्रीत्यर्थ कर्म करता है, वही जगत‍्की यथार्थ सेवा करता है; क्योंकि उसका उन कर्मोंमें कोई व्यक्तिगत स्वार्थ रहता ही नहीं। कर्ममें विष भरनेवाला तो स्वार्थ ही है। जहाँ स्वार्थ है, वहाँ चाहे कितनी ही त्यागकी बातें की जायँ, यथार्थ त्याग नहीं आता। अतएव उसका विष भी नहीं निकल पाता। निर्दोष विषरहित कर्मसे ही जगत‍्का कल्याण होता है।