भक्त प्रह्लादकी पवित्र उक्ति

श्रीभगवान‍्के चरणोंकी शरण लेना ही जीवनकी एकमात्र सफलता है; क्योंकि भगवान् ही समस्त प्राणियोंके स्वामी, सुहृद्, प्रियतम और आत्मा हैं। जो लोग इन्द्रिय-भोगोंमें फँस जाते हैं, उन्हें भगवान‍्के परम कल्याणस्वरूप चरणकमलोंकी प्राप्ति नहीं होती।

इसलिये यह मानव-शरीर, जो भगवत्प्राप्तिके लिये पर्याप्त है—जबतक रोग-शोकादिसे ग्रस्त होकर मृत्युके मुखमें नहीं चला जाता, तभीतक बुद्धिमान् पुरुषको अपने कल्याणके लिये प्रयत्न कर लेना चाहिये।

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प्रभुका पथ बतलानेवाले और उसपर ले चलनेवाले गुरुकी भक्तिपूर्वक सेवा, अपनेको जो कुछ मिले—सब भगवान‍्के समर्पण कर देना, प्रेमी भक्त साधुओंका सत्संग, भगवान‍्की आराधना, भगवत्कथामें श्रद्धा, भगवान‍्के गुण और लीलाओंका कीर्तन, भगवान‍्के चरणकमलोंका ध्यान, भगवान‍्के श्रीविग्रहादिका दर्शन-पूजन आदि साधनोंसे भगवान‍्में सहज प्रेम हो जाता है।

भगवान् परमेश्वर श्रीहरि समस्त प्राणियोंमें विराजमान हैं, यह समझकर यथाशक्ति सभी प्राणियोंकी इच्छा पूरी करो और हृदयसे उन सबका सम्मान करो।

जो लोग काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद और मत्सर—इन छ: भीतरी शत्रुओंपर विजय प्राप्त करके उपर्युक्त प्रकारसे भगवान‍्की भक्ति करते हैं, उन्हें भगवान् वासुदेवके श्रीचरणोंमें अनन्य प्रेमकी प्राप्ति हो जाती है।

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प्रेम-भक्तिकी प्राप्ति होनेपर जब भगवान‍्के लीलाशरीरोंमें किये हुए अद्‍भुत पराक्रम, उनके अनुपम गुण और चरित्रोंको सुनकर अत्यन्त हर्षसे मनुष्यका रोम-रोम खिल उठता है, प्रेमाश्रुओंके कारण कण्ठ गद‍्गद हो जाता है और वह संकोच छोड़कर उच्च स्वरसे गाने और नाचने लगता है, जब वह ग्रहाविष्ट उन्मत्तकी भाँति कभी हँसता है, कभी करुण क्रन्दन करता है, कभी भगवान‍्के दिव्य गुणोंका स्मरण करके उनका ध्यान करता है तो कभी भगवद्भावसे सबकी वन्दना करने लगता है, जब वह भगवान‍्में तन्मय होकर नि:संकोच श्वास-श्वासमें ‘हरे, हे जगत्पते, हे नारायण’ इस प्रकार पुकारने लगता है, तब इस प्रेम-भक्तिके प्रभावसे उसके सारे बन्धन कट जाते हैं और भगवद्भावकी भावना करते-करते उसका हृदय भगवन्मय हो जाता है। उस समय उसके जन्म-मरणके बीजोंका भण्डार बिलकुल जल जाता है और वह पुरुष श्रीभगवान‍्को प्राप्त कर लेता है।

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धन, स्त्री, पशु, पुत्र, पुत्री, महल, जमीन, हाथी, खजाना और भाँति-भाँतिके ऐश्वर्य और तो क्या, संसारका समस्त धन तथा भोगपदार्थ—सभी क्षणभंगुर हैं। वे इस मरणशील मनुष्यको क्या सुख दे सकते हैं।

भगवान् मुकुन्दको प्रसन्न करनेके लिये ब्राह्मण, देवता या ऋषि होना, सदाचार और बहुत-सा ज्ञान होना तथा दान, तप, यज्ञ, शौच और बड़े-बड़े व्रतोंका अनुष्ठान पर्याप्त नहीं हैं। भगवान् श्रीहरि तो केवल निष्काम प्रेम-भक्तिसे ही प्रसन्न होते हैं, और सब तो विडम्बनामात्र हैं।

इसलिये सब प्राणियोंको अपने ही समान समझकर सर्वत्र विराजमान सबके आत्मा सर्वशक्तिमान् परमेश्वर श्रीहरिकी भक्ति करो।

यह भक्ति ऐसी है कि इसके प्रभावसे दैत्य, यक्ष, राक्षस, स्त्री, शूद्र, गोपालक, पशु, पक्षी और बहुत-से पापी जीव भी भगवद्भावको प्राप्त हो गये हैं।

इस जगत‍्में जीवका सबसे बड़ा स्वार्थ—परम स्वार्थ एकमात्र यह है कि वह सदा-सर्वदा, सर्वत्र सबमें भगवान‍्का दर्शन करता हुआ भगवान् गोविन्दकी अनन्य भक्ति करे!