भक्तिमें आडम्बरकी आवश्यकता नहीं
याद रखो—भगवान्की भक्तिमें आडम्बरकी आवश्यकता नहीं है। बाहरी दिखावा तो वहाँ होता है, जहाँ भीतरकी अपेक्षा बाहरका—करनेकी अपेक्षा दिखानेका महत्त्व अधिक समझा जाता है। भक्ति तो भीतरकी वस्तु है—करनेकी चीज है, इसमें दिखावा कैसा? बस, चुपचाप मनको चले जाने दो उनके श्रीचरणोंमें और मस्त हो रहो! जब तुम्हारे पास मन ही अपना न होगा, तब दूसरी बात सोचोगे कैसे? दिन-रात आलिंगन करते रहो अपने प्रियतमका भीतरके बंद कमरेमें और बाहरको भूल जाओ! वस्तुत: ऐसी अवस्थामें—इस मस्तीकी मौजमें बाहरकी याद आती ही किसे है?
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याद रखो—किसी दूसरे कामके लिये भगवान्से प्रेम करना सच्चा प्रेम नहीं है। वह तो असलमें प्रेमका तिरस्कार है। प्रेममें चाह नहीं होती। ‘फिर प्रेम क्यों करते हो?’ इसीलिये कि ‘किये बिना रहा नहीं जाता।’ मनको न जाने दो उधर! ‘जाने देनेकी कौन-सी बात; मन इधर तो आता नहीं। एक क्षणके लिये भी तो वहाँसे हटना नहीं चाहता। उसे न कोई चाह है, न परवा! वह तो मतवाला हो गया है।’ यह है भगवत्प्रेम। इसीकी साधना करो।
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याद रखो—जब सच्चे प्रेमका स्रोत हृदयमें बह निकलेगा, तब क्षणमें अनन्त कालकी सारी कालिमा धुल जायगी। फिर स्मरण, कीर्तन, ध्यान और तन्मयता अपने-आप ही होने लगेंगे। रोमांच, अश्रुपात आदि सात्त्विक भावोंका उदय और अभ्युदय स्वाभाविक ही होता रहेगा। ऐसा ही भक्त भुवनको पावन करनेवाला होता है। ‘मद्भक्तियुक्तो भुवनं पुनाति।’
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याद रखो—सच्चा सौन्दर्य वही है, जहाँ भगवान्का प्रेम छलक रहा है। भगवत्प्रेमको छोड़कर जो कुछ भी है, वह तो सदा ही भयानक और बीभत्स है। मन जब विषयासक्तिसे रहित होकर सारी असद्भावनाओंसे मुक्त हो जाता है, तब उसमें भगवत्प्रेमकी प्रतिष्ठा होती है। इस प्रेमसे जिस स्वरूपका प्रकाश होता है, वस्तुत: वही यथार्थ सुन्दर है।
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याद रखो—इस प्रेमकी साधनाके लिये आवश्यकता है निष्कपट प्रेम-कामनाकी। बस, उनका प्रेम ही चाहो, प्रेमसे ही चाहो, प्रेममें ही चाहो। दिल खोलकर सरलतासे उन्हें पुकारो। भगवत्प्रेम निष्कपट प्रेम-कामनासे ही मिलता है। मनको टटोल-टटोलकर देखते रहो—उसमें कोई दूसरी कामना छिपी तो नहीं है।
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याद रखो—तुम जिसको चाहते हो, जिसको अपना बनाना चाहते हो उसके अनुकूल तो तुम्हें होना ही पड़ेगा। तुम भगवान्को और उनके प्रेमको चाहोगे तो तुम्हारा पहला कर्तव्य होगा तन-मनसे उनके अनुकूल चलना। साथ ही तुम्हें अपने बाहर-भीतरके आचरणोंसे यह भी सिद्ध कर देना होगा कि तुम उनके सामने भोग-मोक्ष—सभीको तुच्छ समझते हो। इसमें विशेष सावधानीकी आवश्यकता है, नहीं तो विशुद्ध प्रेम-कामना ही उदय नहीं होगी।