धर्माचरणका फल कभी बुरा नहीं होता

ईश्वरकी सेवाके लिये धर्मके अनुकूल कार्य करते रहो। यह मत देखो कि उसका अभी-अभी दिखायी देनेवाला फल अनुकूल है या प्रतिकूल। यह सदा निश्चय रखो कि ईश्वरप्रीत्यर्थ किये जानेवाले धर्माचरणका आखिरी फल कभी बुरा नहीं हो सकता।

सम्भव है, किसीको परोपकार करनेके बाद ही किसीके द्वारा आघात लगे, दूसरोंकी सेवा करनेमें अपमान मिले या किसीको बचानेमें प्राणोंपर आ बने, पर यह निश्चय रखो कि ये परिणाम तुम्हारे वर्तमान सत्कर्मके नहीं हैं! किसी प्रारब्धका फल मिला है और संयोगसे मिला उसी समय है, जिस समय तुम सत्कर्म कर रहे हो। इसीसे तुम्हारी यह धारणा हो सकती है कि यह फल मेरे वर्तमान सत्कर्मका है, पर यह तुम्हारी भ्रान्त धारणा है।

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यह भी निश्चय करो कि ईश्वर सदा ही सत्कर्ममें सहायक होता है, सम्भव है कभी-कभी तुम्हें सत्कर्मके पथपर दृढ़ करनेके लिये तुम्हारे सामने ईश्वर विघ्नोंको भेजें, पर तुम्हें चाहिये कि विघ्नोंको तुम्हारे उत्साह-वर्धनके लिये भेजा हुआ समझकर उनसे डरो मत। यदि कभी वे ऐसे प्रबल हों कि तुम्हें स्थूल शरीरसे उनके सामने झुकना पड़े तो झुक जाओ; परंतु मनसे कभी मत झुको। सत्कर्ममें मनका प्रवाह अबाध बहने दो और यह निश्चय रखो कि ईश्वर तुम्हारी सेवा स्वीकार कर रहा है।

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ईश्वरसे बढ़कर न तो तुम्हारा कोई अत्यन्त निकट आत्मीय है और न कोई सहायक ही है। जिस समय सारी सहायताओंका मार्ग सर्वथा बंद हो जाता है, किसी आत्मीयका मनसे भी दर्शन नहीं होता, उस समय विश्वासी भक्तको यह प्रत्यक्ष अनुभव होता है कि ईश्वर मेरा परम आत्मीय है और एकमात्र सहायक है। जहाँ कोई नहीं पहुँच सकता, किसीकी शक्ति सहायक नहीं होती, वहाँ ईश्वरकी कृपा अनायास पहुँचती है और सहायता करती है।

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विपत्तिमें घबराकर ईश्वरकी महती कृपाका अपमान न करो। निश्चय रखो, विपत्तिहारी भगवान् ही विपत्तिके रूपमें तुम्हारी असली विपत्तिका हरण करने और तुम्हें इस विपत्तिसे यथार्थत: बचनेका साधन बताने आये हैं। यदि तुम्हारा विश्वास होगा तो तुम्हें यह बात प्रत्यक्ष दिखलायी देगी।

बहुत-सी विपत्तियाँ तो ऐसी होती हैं, जो अत्यन्त कड़वी दवा या लम्बे ऑपरेशनकी भाँति देखनेमें बड़ी भयावनी प्रतीत होती हैं, पर उनका परिणाम दवा या ऑपरेशनसे रोगनाशकी भाँति कल्याणकारी ही होता है; मनुष्य इन औषधरूप साधनोंको ही विपत्ति मानकर कभी-कभी भगवान‍्के प्रति नाराज-सा होने लगता है। यह उसकी भूल है। उसे समझना चाहिये कि माँकी मारमें भी प्यार भरा रहता है।

माँ चाहे कभी भूल भी कर जाय, या क्रोध-विषाद आदिके आवेशमें असलमें बुरा करके पछताये भी, परंतु ज्ञानस्वरूप परम प्रेमी ईश्वरसे न तो भूल ही हो सकती है और न किसी आवेशमें किसीका अकल्याण ही सम्भव है।

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निश्चय करो—ईश्वर जो कुछ करते हैं, सब कल्याणकर ही है। कल्याणमय ईश्वरमें अकल्याण असम्भव है।