दोष-दर्शन
याद रखो—जो सद्गुण भगवान्में प्रीति बढ़ानेवाले नहीं हैं उनमें कहीं-न-कहीं कोई दोष है। उसको खोजो और दूर करो! सद्गुणकी यही पहचान है कि वह भगवान्की ओर ले जाता है।
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याद रखो—जिसको अपने सद्गुणोंका अभिमान है और जो अपनेको उनका निर्माण करनेवाला मानता है, उसके सद्गुणोंकी संख्यावृद्धि तथा विशुद्धि रुक जाती है। सद्गुणोंका अभिमान दूसरोंमें दोषोंका दर्शन करता है एवं उनके प्रति हेयदृष्टि, घृणा उत्पन्न करता है। जिसका परिणाम व्यवहारमें क्रमश: प्रेमशून्यता, कटुता, द्वेष, द्रोह और अन्तमें हिंसा-प्रतिहिंसातक हो सकता है।
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याद रखो—जहाँ दोष-दर्शनकी बान पड़ी कि फिर किसीके छोटे दोष भी बहुत बड़े दीखते हैं, बिना हुए ही दोष दीखने लग जाते हैं और अन्तमें कोई भी पुरुष ऐसा नहीं बच जाता कि जिसमें दोष-दर्शन करनेवालेकी दोषपूर्ण बुद्धि किसी दोषको न देखे। यहाँतक कि फिर उसकी दृष्टिमें मंगलमय भगवान्में भी दोष दीखने लगते हैं।
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याद रखो—जितना ही दोष-दर्शन बढ़ता है उतना ही दोषोंका चिन्तन, मनन भी बढ़ता है। फलत: दोषोंमेंसे घृणा निकल जाती है और उनमें प्रीति उत्पन्न होने लगती है।
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याद रखो—अच्छे उद्देश्यसे भी बुरी वस्तुका बार-बारका चिन्तन-मनन उस वस्तुके विविध चित्र हृदयपर अंकित कर देता है और फिर बार-बार उसीकी स्फुरणा और स्मृति होती है तथा सद्गुण क्षीण होने लगते हैं।
याद रखो—जब इस प्रकार बाहर-भीतर दोष-ही-दोष आकर बस जाते हैं और उन्हींमें मन घुल-मिल जाता है, तब सारे सद्गुण क्षीण होते-होते लुप्त हो जाते हैं। परिणाम यह होता है कि दोषोंमें ही गुणबुद्धि होने लगती है, पापमें ही पुण्यबुद्धि होने लगती है।
याद रखो—जहाँ बुद्धिने गुणको दोष और दोषको गुण मान लिया कि फिर चित्तका भण्डार दोषोंसे भर जाता है, उनमें आसक्ति हो जाती है और बार-बार प्रयत्न होता है नये-नये दोषोंका संग्रह करनेके लिये।
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याद रखो—सद्गुण वे ही टिकते हैं, जो प्रभुको समर्पित होते रहते हैं और जिनकी प्राप्तिमें प्रभुको ही कारण माना जाता है। इस स्थितिमें प्रभुकृपा अभिमान नहीं उत्पन्न होने देती और सद्गुणोंकी बड़ी सावधानीसे रक्षा करती है। फिर ये सद्गुण भगवान्की पूजाके पुष्प बन जाते हैं और इनकी सुगन्ध तथा प्रसादसे आस-पासका सारा वातावरण सुख-शान्तिकी मधुर मनोहर सुगन्धसे भर जाता है।
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याद रखो—सद्गुण वे ही हैं, जो किसी भी लौकिक कामना-वासनासे या अहंता-ममतासे कलंकित न होकर प्रभुके चरणोंमें समर्पित होनेयोग्य होते हैं। जिन सद्गुणोंपर अभिमानकी, ममताकी, मोहकी, कामना-वासनाकी कालिमा लग जाती है, वे भगवत्-चरणोंपर चढ़नेयोग्य नहीं रहते। उनसे तो कलंक ही बढ़ता है।
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याद रखो—वे ही सद्गुण हैं, वे ही सद्भाग्य हैं, जो मानव-जीवनको भगवत्-चिन्तनमें लगा दें। सद्गुणोंके अभिमानसे भरी लम्बी आयुकी अपेक्षा घड़ी-दो-घड़ी वह समय महान् श्रेष्ठ है, जिसमें मनुष्य अपनेको तृणादपि सुनीच और सर्वथा पुरुषार्थहीन एवं गुणहीन मानकर भगवान्के पावन चरणोंका आश्रय ले पाता है।