दूसरोंके हितमें ही अपना हित है

विश्वास करो—जो मनुष्य दूसरेका बुरा करके अपना भला करना चाहता है, वह बहुत बड़ी भूलमें है। अपनी सच्ची भलाई—अपना यथार्थ हित उसीमें है, जिसमें दूसरोंकी भलाई—दूसरोंका हित भरा है। इसलिये प्रत्येक कर्म करनेसे पहले यह देख लो कि इस कर्मके परिणाममें किसीकी बुराई तो नहीं होगी—साथ ही यह भी देख लो, इस कर्मसे दूसरोंकी भलाई होगी या नहीं। यदि भलाई नहीं होती तो यह समझकर कि इसमें मेरी भी भलाई नहीं होगी, उस कर्मसे हाथ हटा लो।

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विश्वास करो—सारा चराचर जगत् भगवान‍्का ही स्वरूप है अथवा उसमें एकमात्र भगवान् ही व्याप्त हैं। और यह समझकर सदा सबकी अपनी शक्तिभर यथायोग्य सेवा करो। सेवा वही है, जो सेव्यके लिये सुखदायक और हितकर हो।

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विचार करो—जब सब कुछ भगवान् हैं या सबमें भगवान् हैं तब पराया कौन है? सभी तो आत्माके भी आत्मा अपने प्रभुके स्वरूप हैं—सभी तो अपने सेव्य हैं, फिर किससे और कैसे वैर-विरोध, हिंसा-द्वेष या छल-कपट करें। किसीका भी अनिष्ट करनेकी कल्पना ही कैसे हो?

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विश्वास करो—सबमें भगवान‍्को देखनेवाले पुरुषके हृदयमें रहनेवाले काम-क्रोध, लोभ-मोह, मद-मत्सर, वैर-हिंसा, अहंकार-अभिमान आदि शत्रु अपने-आप ही मर जाते हैं। उसका हृदय स्वयमेव ही सच्चे सुहृद्का काम करनेवाले पवित्र त्याग-क्षमा, संतोष, विवेक, मैत्री-मुदिता, प्रेम-क्षमा और विनम्रता-दीनता आदि विशुद्ध दैवी भावोंसे भर जाता है।

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विश्वास करो—दैवी भावोंसे भरे हुए हृदयमें ही भगवान् प्रकट होते हैं, वही उनकी मधुर-मनोहर देवदुर्लभ झाँकी होती है। जबतक हृदयमें दुर्गुण और दुर्विचार भरे हैं, तबतक वहाँ भगवान‍्का प्रकट होना सम्भव नहीं।

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विचार करो—तुम मानव-योनिमें आये हो मायाके बन्धनसे छूटकर भगवान‍्को प्राप्त करनेके लिये, देवत्वमें ओत-प्रोत होकर परम देव पुरुषोत्तमका पावन प्रेम और नित्य अपरोक्ष सान्निध्य प्राप्त करनेके लिये। इसके बदले यदि तुम काम-क्रोधादि शत्रुओंके—लुटेरोंके वशमें होकर मानव-जीवनके महान् उद्देश्यको भूल गये—विषय-सेवनमें लग गये और आसक्तिवश नये-नये पाप कमाने लगे तो देवत्व तो दूर रहा, मिला हुआ मानवत्व भी छिन जायगा और फिर तुम्हें बार-बार आसुरी योनियोंमें ही नहीं, उससे भी अधम गतियोंमें जाना पड़ेगा। क्या मानव-जीवनका यह जघन्य फल तुम्हें स्वीकार है? यदि नहीं तो चेतो, सावधान हो जाओ और अपने उद्देश्यकी पूर्तिमें प्राणपणसे लग जाओ। याद रखो—समय बहुत थोड़ा है, प्रलोभन बहुत हैं और संसारमें फँसाये रखनेवाले तथा जीवनके उद्देश्यको भुलाये रखनेवाली प्रतिकूल परिस्थितियोंका पार नहीं है। जगत‍्की सारी परिस्थितियोंकी समाप्तिके बाद उद्देश्य-साधनमें लगोगे—इस दुराशाको छोड़ दो। जहाँ हो, जिस परिस्थितिमें हो, वहाँसे उसीमें कुछ भी किसीकी परवा न करके अपने उद्देश्यकी पूर्तिमें लग जाओ। परिस्थिति अपने-आप बदल जायगी। तुम यह निश्चय कर लो कि तुम्हारा सबसे पहला और प्रधान कर्तव्य एकमात्र यही है।

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विश्वास करो—तुम्हारा निश्चय यदि एक और दृढ़ होगा, तुम्हारी लालसा यदि अनन्य होगी और तुम्हारा विश्वास यदि पूर्ण होगा तो जीवनके बचे हुए अल्प-से-अल्प समयमें ही तुम सफल हो जाओगे। वर्षोंसे बंद अँधेरे घरमें सूर्यका प्रकाश आते ही अन्धकार भाग जाता है। वह यह नहीं कहता कि मुझे इतना समय रहते हो गया है तो कुछ समय और रहूँगा। बस, प्रकाश आया कि अन्धकार मरा, इतना ही समय चाहिये। इसी प्रकार निश्चय, लालसा और विश्वासकी अनन्यता तथा दृढ़ता होनेपर तत्काल भगवान‍्का प्रकाश प्रकट हो जाता है और अनादिकालका अज्ञानान्धकार उसी क्षण नष्ट हो जाता है। लग जाओ पूरे भरोसेके साथ।