ईश्वरमें विश्वास
तुम यदि निराशा, असफलता, दु:ख, शोक, विषाद, अशान्ति, अवनति, दुर्गति, अवरोध, कलह, युद्ध, भय, बन्धन, बीमारी और विनाश आदिकी बातें सोचते रहोगे, मनमें इन्हींकी कल्पना करके इन्हींके विविध भयानक चित्रोंको देखते रहोगे तो याद रखो—तुम्हारी कल्पनाके ये चित्र बाहर भी तुम्हारे लिये वैसा ही भयानक वातावरण, वैसे ही बुरे संयोग, वैसे ही असाधारण कारण और अन्तमें वैसी ही परिस्थिति पैदा कर देंगे। मनमें जैसा संकल्प होता है वैसा ही परिणाम भी होता है।
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अतएव यदि शुद्ध परिणाम चाहते हो तो नित्य शुद्ध संकल्प करो। उत्साह, सफलता, सिद्धि, सुख, आनन्द, आह्लाद, शान्ति, उन्नति, विकास, प्रेम, सेवा, निर्भयता, मुक्ति, स्वस्थता और निर्माणके सुन्दर सुशोभन संकल्प करो। इनसे तुम्हारा चित्त-क्षेत्र बहुत ही निर्मल सुगन्धिसे भर जायगा। फिर बाहरके वातावरण, संयोग, कारण और परिस्थिति भी ठीक वैसी ही बन जायगी। जीवन अपरिमित अपूर्व सुख-शान्तिसे ओत-प्रोत हो जायगा।
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याद रखो—जो लोग दिन-रात अशुभ संकल्प करते रहते हैं, वे स्वयं तो दु:खी रहते ही हैं, जगत्को भी स्वाभाविक ही अपने अशुभ भावोंका दान देकर—उन्हें फैलाकर सबको न्यूनाधिकरूपसे दु:खी करते हैं। इसी प्रकार शुभ संकल्प करनेवाले पुरुष स्वयं सुखी होते हैं और संसारके सब प्राणियोंको भी सुखी करते हैं।
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यह भी याद रखो कि सारे सुखका परम आधार है—ईश्वरमें विश्वास। समस्त शुभ विचार, शुभ संकल्प, शुभ गुण और शुभ भाव ईश्वर-विश्वाससे ही उदय होते और टिकते हैं। जिसका ईश्वरमें विश्वास नहीं, वह शुभ संकल्प और शुभ पदार्थोंका उत्पादन, संग्रह-संवर्धन और संरक्षण नहीं कर सकता। उसका चित्त बरबस अशुभकी ओर प्रवृत्त होगा।
जिसका ईश्वरमें विश्वास होगा, वही यह समझेगा कि दुनिया जो कुछ है सब ईश्वर है और दुनियामें जो कुछ है सब ईश्वरका है तथा वही अपनेको और अपने सब कुछको ईश्वरके अर्पण कर सकेगा। इस प्रकार जो अपना सर्वस्व ईश्वरके अर्पण कर देता है, उसका फिर जगत्के साथ केवल पवित्र सेवाका सम्बन्ध शेष रह जाता है। वह केवल सेवाके लिये ही जीवन धारण और जीवनके समस्त कार्योंका यथाविधि सम्पादन करता है; क्योंकि वह सचराचर प्राणीमें अपने प्रभुको देखता है—‘मैं सेवक सचराचर रूप स्वामि भगवंत।’
इस प्रकारके विश्वासी सेवकमें सारे सद्गुण, सारे सद्विचार, सारे सत्संकल्प अपने-आप ही आ जाते हैं—उसके चित्तमें कभी अशुभका, असत् का उदय ही नहीं होता। वह सर्वथा और सर्वदा नित्य नयी-नयी उमंगसे अपने प्रभुके सुखमय स्मरणके साथ-साथ उनकी सेवाके ही शुभ संकल्प किया करता है और इसी आनन्दमें निमग्न रहता है कि प्रभु कृपापूर्वक सेवामें उसे निमित्त बनाते हैं और उसकी सेवा स्वीकार करते हैं।
उसको न अपनेमें मोह-ममता रहती है और न तो जगत्के किसी पदार्थमें ही। वह अपने शरीरकी तथा जगत्के पदार्थोंकी इसीलिये देख-रेख करता है कि वे प्रभुकी सेवाके साधन हैं। ऐसी अवस्थामें उसके अन्त:करणमें अशुभका तो कोई लेश रहता ही नहीं, वरं वह आग्रहपूर्वक किन्हीं शुभ संकल्पोंको भी अपनेमें रखनेका प्रयत्न नहीं करता। वे तो उसी प्रकार अनिवार्यरूपसे उसके हृदयमें स्वाभाविक ही बने रहते हैं, जैसे चन्द्रमाके साथ उसकी निर्मल शीतल सुधामयी ज्योत्स्ना और सूर्यके साथ उसका प्रखर प्रकाश रहता है।
जबतक ऐसा न हो, तबतक सत्संग, स्वाध्याय और भजनके द्वारा ईश्वरमें विश्वास बढ़ानेकी तथा बार-बार अशुभ संकल्पोंको हटाकर शुभके स्मरण, संवर्धन और संरक्षणकी सतत चेष्टा करते रहो।