एक क्षण भी भगवत्कृपासे वंचित नहीं

याद रखो—तुमपर भगवान‍्की कृपा नित्य-निरन्तर बरस रही है। वह सदा सब ओरसे तुम्हें नहला रही है। ऐसा कोई क्षण नहीं जाता, जिस समय तुम भगवान‍्की कृपासे वंचित रहते हो। वंचित रहते भी कैसे? तुम उनकी अपनी प्यारी-से-प्यारी रचना जो ठहरे। तुमपर वे कृपा क्या करते, उनके हृदयमें तो पल-पलमें स्नेह उमड़ा आता है। सचमुच विश्वास करो—जबसे तुम हुए, न मालूम किस अज्ञातकालसे; तभीसे उन्होंने तुम्हें अपनी गोदमें ले रखा है। एक क्षणके लिये भी कभी उन्होंने तुमको दूर नहीं किया। उनका कल्याणमय कर-कमल निरन्तर तुम्हारे सिरपर रहता है और निरन्तर तुम उनका शीतल-मधुर स्पर्श पा रहे हो।

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तुम पूछोगे—फिर यह जो जलन हो रही है; दिन-रात हृदयमें शोक और विषादका दावानल धधक रहा है, इसका क्या कारण है? ठीक है। इसका सच्चा उत्तर यह है—न तो आग है न तो जलन; यह सब उनकी लीला है। तुम जो जलनका अनुभव कर रहे हो और पूछ रहे हो, यह भी उनके लीलाभिनयका ही एक अंग है। तुम्हारा ज्ञान और अज्ञान, तुम्हारा सुख और दु:ख, तुम्हारी तृप्ति और अतृप्ति, तुम्हारी शान्ति और संताप—यहाँतक कि तुम और मैं—सभी कुछ उनकी लीला है, उन्हींमें हो रही है, वे ही कर रहे हैं। आश्चर्यकी बात तो यह है; लीला और लीलामय भी भिन्न नहीं, एक ही हैं। वे स्वयं लीला करते हैं और स्वयं ही उसे देख-देखकर हँसते हैं।

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तुम्हारी यह सुखकी कामना, तुम्हारी यह शान्तिकी चाह, तुम्हारी यह मिलनकी उत्कण्ठा—सब उन्हींका खिलवाड़ है। उनका यह खेल पता नहीं कबसे चल रहा है। इसके आरम्भकालका पता आजतक किसीको न लगा और न आगे लगेगा ही। यह चलता ही रहता है। जिन्होंने देखा, इसे चलते ही देखा। खेलका रूप जरूर बदलता रहता है, सदा उसका एक-सा रूप नहीं रह सकता; परंतु खेल कभी खत्म नहीं होता। जब खिलाड़ी नित्य है तो खेल अनित्य कैसे हो? इसीसे जाननेवाले संतलोग भगवान‍्की लीलाको अनादि और अनन्त कहते हैं।

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यह जो सृष्टि दीख रही है, इसमें जो प्रतिपल सृजन और संहारका चक्र चल रहा है, इसमें जो शान्ति-अशान्तिकी लहरें लहरा रही हैं, यह सब भी उन्हींका रूप है। कभी भयानक और कभी सौम्य—रात और दिनकी भाँति दोनों एक ही लीलाकी दो दिशाएँ हैं। यहाँ कुछ भी विपरीत नहीं होता। सभी अनुकूल, सभी यथार्थ, सभी कल्याणमय और सभी ठीक हो रहा है। जो होना चाहिये, जैसा होना चाहिये; वह वैसे ही हो रहा है। यह सारी सृष्टि और उसकी क्रिया—उनकी आनन्दमयी-चिन्मयी लीला है। उनका स्वरूप ही है।

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जो होता है, होने दो—किसीके रोकनेसे रुकेगा भी नहीं। तुम तो बस, अपनेको उनकी मंगलमयी इच्छाके प्रवाहमें डाल दो। किसी खास स्थितिकी कल्पना छोड़कर निश्चिन्त हो जाओ। अब भी उसी प्रवाहमें ही पड़े हो, परंतु तुम्हें पता नहीं है, इसीसे भयानक और सुन्दरका भेद दीखता है। लीलामयसे प्रार्थना करो जिससे वे तुम्हें जता दें, जगा दें, तुम्हारी असली आँखें खोल दें। फिर तुम प्रत्यक्ष देख सकोगे कि तुम न कभी उनसे अलग थे, न अब अलग हो, न आगे ही अलग हो सकते हो। तुम तो उनकी अपनी ही रचना हो, उन्हींके स्वाँग हो, उन्हींके स्वरूप हो और उन्हींकी इच्छासे—उन्हींकी प्रेरणासे, उन्हींके खेलानेसे उन्हींमें खेल रहे हो। आनन्द! आनन्द!!