एकमात्र प्रभुके शरण हो जाओ

याद रखो—संसारमें तुम्हारे लिये जो कुछ हो रहा है, सब दयामय, प्रेममय और न्यायकारी भगवान‍्की सुनिश्चित व्यवस्थाके अंदर उन्हींके मंगल-विधानसे हो रहा है। वे मंगलमय हैं, इसलिये उनके मंगल-विधानके मूल निर्झरसे सदा आनन्दका स्रोत बहता रहता है। प्रत्येक विपत्तिमें प्रतिकूलतामें, पीड़ामें, पराभवमें यहाँतक कि मृत्युमें भी उनकी मंगलमयता भरी रहती है। इस बातपर विश्वास कर लोगे तो तुम्हें तुरंत शान्ति मिल जायगी।

याद रखो—भगवान् तुम्हारे परम सुहृद् हैं, सर्वज्ञ हैं और सर्वशक्तिमान् हैं। उनके समान या उनसे बढ़कर तुम्हारा कल्याण चाहनेवाला, किस बातमें तुम्हारा यथार्थ कल्याण है, इस रहस्यको जाननेवाला और कल्याण करनेवाला दूसरा कोई नहीं है, इस बातपर विश्वास कर लोगे तो तुम्हें तुरंत शान्ति मिल जायगी।

याद रखो—जो कुछ भी दु:ख, अशान्ति और पाप है, सारा कामनामें है। कामनाका मूल है आसक्ति। आसक्तिका मूल है इस जड शरीर तथा नाममें मेरेपनका भाव। तुम अपनेको भगवान‍्के हाथका यन्त्र समझकर यदि कामना, आसक्ति, ममत्व और अहंकारका त्याग कर दोगे तो तुम्हें तुरंत शान्ति मिल जायगी।

याद रखो—जबतक विषयोंमें, कर्मोंमें और कर्मफलमें तुम्हारी ममता और आसक्ति है, तबतक तुम्हारे मनमें कामनाका अभाव नहीं हो सकता, न तबतक तुम कर्मफलका त्याग ही कर सकते हो। अतएव तुम यदि भगवान‍्के स्वरूपका महत्त्व समझकर ममता, आसक्ति और कामनाका त्याग कर दोगे तो तुम्हें तुरंत शान्ति मिल जायगी।

याद रखो—जबतक तुम्हारा मन विषयोंमें भटकता रहेगा और भगवान‍्में नहीं लगेगा, तबतक तुम कभी शान्त और सुखी नहीं हो सकोगे; पर भजनका अभ्यास बढ़ाकर यदि तुम मनको अपने वशमें कर लोगे और उसे श्रीभगवान‍्के स्वरूपचिन्तनमें लगा दोगे तो तुम्हें तुरंत शान्ति मिल जायगी।

याद रखो—पापका अभ्यास बहुत बुरा होता है, परंतु जबतक मनुष्यकी पापबुद्धि है; पाप बन जानेपर उसके मनमें पश्चात्ताप होता है, तबतक वह पापोंसे बचनेका प्रयत्न करता है और अन्तमें एकमात्र भगवान् ही पापोद्धारक और परम शरण्य हैं, ऐसा निश्चय करके अशरण-शरण पतितपावन भगवान‍्को पुकारता है। पश्चात्तापयुक्त पापीके लिये दयामय भगवान‍्का द्वार सदा खुला रहता है। वे उसे शरण देकर अपना लेते हैं और उनके अपनाते ही वह पापमुक्त होकर धर्मात्मा बन जाता है तथा सनातन शान्तिको पा जाता है। अतएव तुम भी यदि इसी प्रकार भगवान् पर अनन्य विश्वास करके उनका भजन करोगे तो तुम्हें तुरंत शान्ति मिल जायगी।

याद रखो—भगवान‍्के स्वरूप-तत्त्वको जाने बिना मनुष्य दु:ख-सागरसे नहीं तर सकता; इस ज्ञानकी प्राप्तिमें सबसे पहली आवश्यक वस्तु है श्रद्धा। श्रद्धासे तत्परता आती है और तत्परतासे इन्द्रियोंका संयम होता है। अत: यदि तुम ‘भगवान‍्के स्वरूपमें’, ‘उनका स्वरूपज्ञान साधकको प्राप्त होता है’ इस सिद्धान्तमें और ‘तुमको अवश्य प्राप्त हो सकता है’ इस अपनी योग्यतामें श्रद्धा प्राप्त कर लोगे तो तुम्हें वह ज्ञान प्राप्त हो जायगा और तुरंत शान्ति मिल जायगी।

याद रखो—भगवान‍्की अनन्य शरणागति ऐसा महान् साधन है जो मनुष्यको सारे पाप-तापोंसे मुक्त करके अनायास ही परम शान्तिका अधिकारी बना देता है, अतएव सारी आशाओं और सारे भरोसोंको छोड़कर एकमात्र प्रभुके शरण हो जाओ, फिर तुम्हें तुरंत ही आत्यन्तिक और शाश्वती शान्ति मिल जायगी।