जबतक और तबतक
जबतक तुम्हें अपना लाभ और दूसरेका नुकसान सुखदायक प्रतीत होता है, तबतक तुम नुकसान ही उठाते रहोगे।
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जबतक तुम्हें अपनी प्रशंसा और दूसरोंकी निन्दा प्यारी लगती है, तबतक तुम निन्दनीय ही रहोगे।
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जबतक तुम्हें अपना सम्मान और दूसरेका अपमान सुख देता है, तबतक तुम अपमानित ही होते रहोगे।
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जबतक तुम्हें अपने लिये सुखकी और दूसरेके लिये दु:खकी चाह है, तबतक तुम सदा दु:खी रहोगे।
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जबतक तुम्हें अपनेको न ठगाना और दूसरोंको ठगना अच्छा लगता है, तबतक तुम ठगाते ही रहोगे।
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जबतक तुम्हें अपने दोष नहीं दीखते और दूसरेमें खूब दोष दीखते हैं, तबतक तुम दोषयुक्त ही रहोगे।
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जबतक तुम्हें अपने हितकी और दूसरेके अहितकी चाह है, तबतक तुम्हारा अहित ही होता रहेगा।
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जबतक तुम्हें सेवा करानेमें सुख और सेवा करनेमें दु:ख होता है, तबतक तुम्हारी सच्ची सेवा कोई नहीं करेगा।
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जबतक तुम्हें लेनेमें सुख और देनेमें दु:खका अनुभव होता है, तबतक तुम्हें उत्तम वस्तु कभी नहीं मिलेगी।
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जबतक तुम्हें भोगमें सुख और त्यागमें दु:ख होता है, तबतक तुम असली सुखसे वंचित ही रहोगे।
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जबतक तुम्हें विषयोंमें प्रीति और भगवान्में अप्रीति है, तबतक तुम सच्ची शान्तिसे शून्य ही रहोगे।
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जबतक तुम्हें शास्त्रोंमें अश्रद्धा और मनमाने आचरणोंमें रति है, तबतक तुम्हारा कल्याण नहीं होगा।
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जबतक तुम्हें साधुओंसे द्वेष और असाधुओंसे प्रेम है, तबतक तुम्हें सच्चा सुपथ नहीं मिलेगा।
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जबतक तुम्हें सत्संगसे अरुचि और कुसंगमें प्रीति है, तबतक तुम्हारे आचरण अशुद्ध ही रहेंगे।
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जबतक तुम्हें जगत्में ममता और भगवान्से लापरवाही है, तबतक तुम्हारे बन्धन नहीं कटेंगे।
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जबतक तुम्हें अभिमानसे मित्रता और विनयसे शत्रुता है, तबतक तुम्हें सच्चा आदर नहीं मिलेगा।
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जबतक तुम्हें स्वार्थकी परवा है और परमार्थकी नहीं, तबतक तुम्हारा स्वार्थ सिद्ध नहीं होगा।
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जबतक तुम्हें बाहरी रोगोंसे डर है और काम-क्रोधादि भीतरी रोगोंसे प्रीति है, तबतक तुम नीरोग नहीं हो सकोगे।
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जबतक तुम्हें धर्मसे उदासीनता और अधर्मसे प्रीति है, तबतक तुम सदा असहाय ही रहोगे।
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जबतक तुम्हें मृत्युका डर है और मुक्तिकी चाह नहीं है, तबतक तुम बार-बार मरते ही रहोगे।
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जबतक तुम्हें घर-परिवारकी चिन्ता है और भगवान्की कृपापर भरोसा नहीं है, तबतक तुम्हें चिन्तायुक्त ही रहना पड़ेगा।
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जबतक तुम्हें प्रतिशोधसे प्रेम है और क्षमासे अरुचि है, तबतक तुम शत्रुओंसे घिरे ही रहोगे।
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जबतक तुम्हें विपत्तिसे भय है और प्रभुमें अविश्वास है, तबतक तुमपर विपत्ति बनी ही रहेगी।