कल्याणकारी विश्वास

विश्वास करो कि मैं भगवान‍्की कृपाशक्तिपर विश्वास करके जिस साधन-मार्गपर चल रहा हूँ, मेरे लिये वही प्रशस्त है और मैं उसमें निश्चय ही सफलता प्राप्त करूँगा। ऐसा कभी मत सोचो कि साधन ठीक है या नहीं, अथवा सफलता मिलेगी या नहीं। संदेह मार्गमें रोक देता है और विश्वास लक्ष्यपर पहुँचा देता है।

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विश्वास करो और निश्चय करो कि मैं इस बार मानव-शरीर धारण करके जगत‍्में आया ही इसलिये हूँ कि अबकी बार मैं शरीरके बन्धनमेंसे जो अज्ञानजनित है, छूटकर ही रहूँगा! अज्ञानके कारण ही मैं अनादिकालसे अबतक भटकता रहा। अब नहीं भटकूँगा, नहीं भटकूँगा।

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विश्वास करो कि अज्ञानका सर्वथा समूल नाश होना और भगवत्तत्त्वका साक्षात्कार होना एक ही बात है। यह भगवत्तत्त्व-साक्षात्कार ही मानव-जीवनका चरम एवं परम लक्ष्य है और यह निश्चय करो कि मैं उस भगवत्तत्त्व-साक्षात्कारका सर्वथा अधिकारी होकर ही आया हूँ तथा उसे प्राप्त करके ही रहूँगा।

विश्वास करो कि मेरे इस अधिकारका एकमात्र बल है भगवान‍्की कृपा और वह भगवान‍्की कृपा मुझे अनन्त और असीमरूपमें प्राप्त है। मैं उस कृपा-समुद्रमें निमग्न हूँ, इसलिये अब मुझे यह भी सोचना नहीं है कि भगवत्तत्त्वका साक्षात्कार भी मुझे करना है; क्योंकि भगवत्कृपाके अथाह समुद्रमें निमग्न हो जानेके बाद न तो कोई सोच-विचार होता है और न उसकी आवश्यकता ही रहती है।

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विश्वास करो कि भगवान‍्की कृपाशक्ति समस्त भागवती शक्तियोंकी स्वामिनी है। सारी शक्तियाँ इन्हींकी अनुगता होकर कार्य करती हैं। यह महती कृपाशक्ति जिसको अपना लेती है, वह भगवत्तत्त्व-साक्षात्कार ही क्या भगवान् को—समग्ररूपसे—सब प्रकारसे पाकर निहाल हो जाता है।

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विश्वास करो—जहाँतक अपने पुरुषार्थ तथा अपनी पृथक् क्षुद्र शक्तिपर आस्था है, तबतक एक तुच्छ अहंकारका तुमपर आधिपत्य है। ऐसे अहंकारके रहते तुम्हारे लिये वस्तुत: भगवान‍्की कृपाशक्तिका कार्य रुका रहता है। कृपाशक्ति चाहती है—पूर्ण निर्भरता, पूर्ण प्रपत्ति और पूर्ण आत्मनिवेदन। अपनेको अपनी सारी शक्तियोंसहित सारी शक्तियोंके उद‍्गम और आकरस्वरूप भगवान‍्के समर्पण कर दो। अपने समस्त अहंकारको जला दो, गलाकर बहा दो और सर्वतोभावसे कृपामाताका आश्रय ग्रहण करो। फिर देखोगे, कितनी जल्दी और कितनी सुकरता एवं सुन्दरतासे तुम्हारी यह आखिरी जीवनयात्रा सफल होती है।

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विश्वास करो—भगवत्कृपा तुम्हें अपनाने, तुमपर बरसने, तुम्हें अपनी महान् मधुर और शीतल छायाका आश्रय देनेके लिये सदा-सर्वदा तैयार है तथा वह यह भी नहीं देखती कि तुम्हारा पूर्व इतिहास, अबतकका आचरण कैसा है। तुम पुण्यात्मा हो या पापी, तुम सात्त्विक हो या तामस, तुम ब्राह्मण हो या चाण्डाल, तुम देवता हो या दानव, तुम हिंदू हो या मुसलमान, तुम धनी हो या गरीब और तुम पंडित हो या मूर्ख—वह तो केवल देखती है तुम्हारे अंदरका भाव। यदि तुम सचमुच अन्य सारे साधनोंसे हताश-निराश होकर और एक विश्वास-भरोसेके साथ उसकी ओर निहार रहे होगे तो वह उसी क्षण तुम्हें अपना लेगी, तुमपर चारों ओरसे बरस पड़ेगी और तुम्हें अपनी सुखद छायाका आश्रय देकर निश्चिन्त, निर्भय और निष्काम बना देगी। तुम्हारी कोई भी कामना अपूर्ण नहीं रहेगी उस समय, परंतु तुम्हें कामना और उसकी पूर्तिका भी पता नहीं रहेगा। तुम उस समय उस कृपाशक्तिकी पवित्र लहरोंके साथ घुल-मिलकर स्वयं पवित्र— कृतार्थरूप हो जाओगे।

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विश्वास करो—भगवान‍्की कृपा तुमपर है ही। वह सदा सभीपर है। सभीको प्राप्त है। तुम विश्वास नहीं करते—मानते नहीं, इसीसे अन्य साधनोंका सहारा खोजते हो और इसीसे उस नित्यप्राप्त जन्मसिद्ध अपने परम धनसे वंचित हो रहे हो!