किसीसे भी घृणा मत करो
किसीसे भी घृणा न करो; घृणासे भय, द्वेष, क्रोध और हिंसा आदि महान् दोष उत्पन्न होते हैं, जो दूसरोंका बुरा करनेसे पहले तुम्हारा ही बुरा करते हैं। किसीका भी अहित न चाहो, किसीके भी पतनकी चाह न करो, किसीको भी दु:खी देखनेकी इच्छा मत करो। ऐसा करोगे तो उनका तो कुछ होगा या नहीं—पता नहीं, पर तुम्हारा अहित, तुम्हारा पतन और तुम्हें दु:ख-लाभ अवश्य हो जायगा।
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किसीकी निन्दा न करो, किसीके भी दोष न देखो, न किसीमें दोषका आरोप ही करो। याद रखो—जगत्में दोष-गुण होते ही हैं। तुम दोषी ही ढूँढ़ने और देखने लगोगे तो तुम्हें दोषी ही मिलेंगे! तुम अपने मनमें जैसा कुछ सोचते-विचारते हो वैसा ही तुम्हें प्रतिफल प्राप्त होता है। जो दूसरोंके प्रति घृणा, द्वेष, भय, वैर और डाह रखते हैं, उन्हें दूसरोंसे यही चीजें मिलती हैं।
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चिढ़ो मत, ऊबो मत, झुँझलाओ मत, खीझो मत, अहंकारके भाव न मनमें आने दो, न जबानपर। ऐसा कर सको तो याद रखो—तुम्हारे बहुत-से दु:ख और संकट अपने-आप ही दूर हो जायँगे।
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यह आशा मत करो कि सब तुम्हारी ही बात मानें, तुम्हारे ही मतका समर्थन करें, तुम्हारे ही आज्ञाकारी बनें और तुम्हारे प्रत्येक कार्यकी प्रशंसा ही करें। जब तुम दूसरोंके लिये ऐसा नहीं कर सकते, तब दूसरोंसे ऐसी आशा क्यों कर सकते हो। करोगे तो निराशा, दु:ख, अपमानबोध और विषादके सिवा और कुछ भी हाथ न लगेगा।
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धीरज रखो, शान्त रहो और जहाँतक बने सहनशील बनो! जगत् भगवान्की विचित्र मायाका विचित्र कार्य है। पता नहीं, इसमें क्या-क्या भरा है। तुम्हारी अपनी छोटी-सी दुनिया है, तुम उसीमें विचरते हो, परंतु ऐसी अनन्त दुनिया भगवान्के इस विश्वमें है—क्योंकि विश्वमें अनन्त प्राणी हैं। तुम्हारी दृष्टिमें जो बात बुरी है, अनहोनी है, असम्भव है, वही बात दूसरोंकी दृष्टिमें अच्छी, जरूर होनेवाली और सर्वथा सम्भव है। नयी बात—अपनेसे विपरीत अनोखी चीज देखकर उससे द्वेष न करो। भगवान्की अनन्त महिमा देख-देखकर प्रसन्न होओ।
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भगवान् अनन्त हैं, एकमात्र भगवान् ही सब कुछ हैं—भगवान्से अतिरिक्त, भगवान्से बाहर और भगवान्से परे कुछ है ही नहीं। ऐसी स्थितिमें जो कुछ भी है, होता है, सब भगवान्में ही है और होता है। फिर खण्डन-मण्डन कैसा? मतका आग्रह कैसा? और लड़ाई कैसी?
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मनमें दोषके विचार, व्यर्थ विचार आते ही उन्हें निकालनेकी चेष्टा करो। सदा चौकन्ने रहो। मनके बुरे विचार ही बुरे कार्योंकी जन्म-भूमि है।
अपनेको सदा सत्कर्मोंमें लगाये रखो। तुम्हारे मनको कभी फुरसत ही नहीं मिलनी चाहिये—असत् का विचार भी करनेके लिये। मनके सामने सदा इतने सद्विचार और सत्-कार्य रखो कि एकके पूरा होनेके पहले ही दूसरेकी चिन्ता उसपर सवार रहे। निकम्मा मन ही प्रमाद करता है।
सदा भगवच्चिन्तन करो; सदा सबका भला चाहो और भला देखकर प्रसन्न रहो। किसी भी दल-विशेषमें मत मिलो। जहाँतक बने मनको एकान्त—मौन रखनेकी चेष्टा करो।
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मन एकान्त—मौन न हो सके तो भगवान्से प्रार्थना करो। उन्हें नित्य अपने सामने, अपने अति समीप, अपने ही अंदर निश्चयरूपसे जानकर—उनके सामने रो पड़ो। उनसे शक्तिकी भीख माँगो, सद्विचारोंकी चाहना करो और चाहना करो उनके पावन अनन्य प्रेमकी। मनसे ऐसा करते रहोगे तो थोड़े ही दिनोंमें निहाल हो जाओगे।