मनको भगवच्चिन्तनमें लगाइये
याद रखो—निकम्मा मन प्रमाद करता है। जबतक वह किसी दायित्वपूर्ण कार्यमें लगा रहेगा, तबतक उसे व्यर्थ, अनावश्यक तथा न करनेयोग्य बातोंके सोचनेका अवसर ही नहीं मिलेगा; पर जहाँ दायित्वके कामसे छुटकारा मिला—स्वच्छन्द हुआ कि मन उन विषयोंको सोचेगा, जिनका स्मरण भी उसे कार्यके समय नहीं होता था।
याद रखो—जब नया साधक ध्यानका अभ्यास आरम्भ करता है, तब उसके सामने सबसे बड़ी एक यही कठिनाई आती है कि अन्य समय जिन सड़ी-गली गंदी और भयावनी बातोंकी उसे कल्पना भी नहीं होती, वे ही उस समय याद आती हैं और वह घबरा-सा जाता है। इसका कारण यह है कि वह जिस वस्तुका ध्यान करना चाहता है, उसमें तो मन अभ्यस्त नहीं है और जिन विषयोंमें अभ्यस्त है, उनसे उसे हटा दिया गया है; ऐसी हालतमें वह निकम्मा हो जाता है; पर निकम्मा रहना उसे आता नहीं, इसलिये वह उन पुराने चित्रोंको उधेड़ने लगता है, जो उसपर संस्काररूपसे अंकित है और जिनके उधेड़नेका उसे अन्य दायित्वपूर्ण कार्योंमें संलग्न रहते समय अवसर नहीं मिलता है।
याद रखो—यदि साधक इस स्थितिमें घबराकर ध्यानके अभ्यासको नहीं छोड़ बैठेगा और लगनके साथ अभ्यास करता रहेगा तो कुछ ही समयके बाद अभ्यास दृढ़ हो जानेपर मन ध्येय वस्तुके स्वरूपमें रम जायगा और फिर तदाकार भी हो जायगा।
याद रखो—प्रमादी मनवाला मनुष्य ही ऐसे काम कर बैठता है, जो उसे नहीं करने चाहिये। प्रमादका अर्थ ही है—करनेयोग्य कर्मका न करना और न करनेयोग्यका करना। इसलिये मनको निरन्तर शुभ चिन्तनमें लगाये रखो और उसका उसपर इतना दायित्व थोप दो कि यह काम तुम्हें अवश्य करना है एवं सुन्दर सुव्यवस्थित रूपसे करना है। कार्यमें इतना संलग्न रहना चाहिये कि उसीका चिन्तन करते-करते नींद आ जाय और उठते ही फिर उसीका चिन्तन हो। ऐसा होनेपर तदाकार-वृत्ति शीघ्र और सहज होती है।
याद रखो—नये विषयमें लगनेसे मन एक बार घबराता है, रुकता है, ऊबता है और कभी-कभी प्रबलरूपसे उसे अस्वीकार भी कर देता है, परंतु इससे घबराओ मत। गाय पहले-पहल नयी जगह, नये खूँटेपर बँधनेसे इन्कार करती है, चाहे वह नयी जगह उसके लिये पहलीकी अपेक्षा कितनी ही अधिक सुखप्रद क्यों न हो, जरा-सी रस्सी ढीली होते ही या अवसर पाते ही भागकर पुरानी जगह पहुँच जाती है। इसी प्रकार मन भी नये विचारमें लगना नहीं चाहता और इसी कारण विषय-चिन्तनमें अभ्यस्त मन भगवच्चिन्तनमें लगनेसे घबराता, रुकता, उकताता और इन्कार करता है। पर यदि निराश न होकर उसे निरन्तर लगाते जाओगे तो वह विषय-चिन्तनको छोड़कर भगवच्चिन्तनमें वैसे ही लग जायगा, जैसे गौ कुछ दिनों बाद पुरानी जगहको भूलकर नयी जगहमें ही रम जाती है।
याद रखो—जीवका विषय-चिन्तनका अभ्यास बहुत पुराना है। उसे छुड़ाकर भगवच्चिन्तनमें लगानेमें यदि एक मानव-जीवनका आधेसे अधिक काल भी लग जाय तो भी बहुत थोड़ा ही है। मन बड़ा दुर्निग्रह और चंचल है, पर अभ्यास (नूतन-वस्तु—भगवच्चिन्तनमें बराबर लगाने) और वैराग्य (पुराने विषय-चिन्तनके दु:ख-दोष दिखा-दिखाकर उससे हटाने)-का सावधानीके साथ सतत प्रयोग करनेपर वह भगवच्चिन्तनपरायण हो ही जायगा। फिर किसी भी प्रमादकी आशंका या सम्भावना नहीं रहेगी।