मीठी और हितभरी वाणी बोलो

निश्चय करो—मीठी और हितभरी वाणी दूसरोंको आनन्द, शान्ति और प्रेमका दान करती है और स्वयं आनन्द, शान्ति और प्रेमको खींचकर बुलाती है।

मीठी और हितभरी वाणीसे आत्माका पोषण होता है; मनको पवित्र शक्ति प्राप्त होती है, बुद्धि निर्मल होती है और जीवनकी क्रियाएँ सुचारुरूपसे सुव्यवस्थित चलती हैं।

मीठी और हितभरी वाणीमें भगवान‍्का आशीर्वाद उतरता है और उससे अपना-पराया सबका कल्याण होता है।

मीठी और हितभरी वाणीमें ही सत्यकी रक्षा होती है और उसीमें सत्यकी शोभा है।

••••

मुखसे कभी ऐसा शब्द मत निकालो, जो किसीका जी दुखावे और अहित करे।

कड़वी और अहितकारिणी वाणी सत्यको नहीं बचा सकती और उसमें रहनेवाले आंशिक सत्यका स्वरूप भी बड़ा कुत्सित और भयानक हो जाता है।

••••

यह निश्चय करो कि जिसकी जबान गंदी होती है, उसका मन भी गंदा होता है।

••••

एक बार महामना मालवीयजीसे किसी विशिष्ट विद्वान‍्ने कहा—‘आप मुझे सौ गाली देकर देखिये मुझे गुस्सा नहीं आयेगा।’ मालवीयजी महाराजने उत्तर दिया—‘आपके क्रोधकी परीक्षा तो पीछे होगी, मेरा मुँह तो पहले ही गंदा हो जायगा।’

••••

दूसरा कोई कड़वा बोले, गाली दे तो उसे ग्रहण मत करो—तुमपर उसका कोई असर नहीं होगा, तुमपर तो तभी असर होता है जब तुम उसे ग्रहण करते हो।

••••

तुम जिसकी भाषा नहीं समझते, चाहे वह कितनी ही गाली दे, तुम्हें कोई दु:ख नहीं होता या तुम शब्दका अर्थ समझनेपर भी जबतक यह समझ रहे हो कि वह दूसरे किसीको गाली बक रहा है, तबतक दु:ख भी नहीं होगा। दु:ख तब होगा जब तुम समझोगे कि गाली मुझको दे रहा है। इसका मतलब यह कि तुम गालीको ग्रहण कर रहे हो!

रज्जबने कहा है—

रज्जब रोष न कीजिये कोई कहो क्यों ही।

हँसकर उत्तर दीजिये हाँ बाबाजी! यों ही॥

••••

भगवान् मंगलमय हैं, जगत् भगवान‍्से भरा है अतएव तुम भी मंगलमें ही निवास करते हो।

जैसे बादलसे सूर्य ढका रहता है और जैसे राखसे आग ढकी रहती है, वैसे ही तुम्हारे अविश्वाससे मंगलमय भगवान् ढके हुए हैं। वास्तवमें उनका मंगलमय स्वरूप नित्य और सर्वत्र है।

••••

प्रत्येक स्थितिमें, प्रत्येक सिद्धि-असिद्धिमें, प्रत्येक चिन्तनमें भगवान् को—उनके मंगलमय स्वरूपको देखो। फिर तुम्हें कभी अमंगलके दर्शन नहीं होंगे। तुम मंगलमय भगवान‍्को भूलकर, मंगलमयी भगवत्कृपाको भूलकर—नित्य अमंगलका चिन्तन, अमंगलकी आशंका और अमंगलका भय करते हो, इसीसे व्यर्थ ही तुम्हारे सामने नाना रूपोंमें अमंगल आ खड़ा होता है। वह तुम्हारी ही कल्पनाका है। वास्तवमें नहीं है।

••••

यह निश्चय करो—मैं सर्वत्र, सर्वथा और सर्वदा मंगलसे घिरा हूँ, मंगलसे भरा हूँ, मंगलमें डूबा हूँ, मंगलसे सना हूँ, मंगलसे तना हूँ और मेरे बाहर-भीतर, भूत-भविष्य सभी मंगलसे ओत-प्रोत हैं, क्योंकि नित्य मंगलमय भगवान‍्का मुझमें नित्य निवास है और मैं नित्य मंगलमय भगवान‍्में स्थित हूँ।