निन्दासे उद्विग्न न होनेवाले भाग्यवान् हैं

याद रखो—तुम्हारी निन्दा करनेवालोंमें अधिकांश सच्चे हैं और अनजानमें ही तुम्हारा हित कर रहे हैं; पर जो तुम्हारी प्रशंसा करते हैं, उस प्रशंसामें अधिकतर अत्युक्ति होती है और उससे तुम्हारी हानि होती है। अतएव निन्दासे घबराओ मत, न निन्दा करनेवालोंसे द्वेष करो और न उनको अपना वैरी समझो। धीरतासे विचार करो कि वे तुम्हारे उन दोषोंको, जिनका तुम्हें पता नहीं है, खोज-खोजकर निकालते और तुम्हारे सामने रखते हैं। अपने उन दोषोंको देखो, उन्हें दूर करनेकी चेष्टा करो एवं निन्दा करनेवालोंका उपकार मानो। इसी प्रकार प्रशंसा सुनकर फूल न जाओ, संकोच करो। अपनी असली स्थितिपर—जिसको तुम अच्छी तरह जानते हो, विचार करो और उससे अधिक कही जानेवाली बातें तुम्हारे लिये अहितकर हैं—इस बातका निश्चय करके प्रशंसकोंसे दूर रहो। उन्हें अधिक मुँह मत लगाओ, पर तिरस्कार भी न करो और निन्दनीय काम न करके कौशलसे एक ऐसी परिस्थिति उत्पन्न कर दो, जिसमें तुम्हारी प्रशंसा होनी बंद हो जाय।

याद रखो—आत्माकी निन्दा तथा प्रशंसासे कोई सम्बन्ध ही नहीं है। निन्दा-प्रशंसा होती है नाम तथा रूपकी। नाम और रूप दोनों ही तुम नहीं हो। आत्मस्वरूप तुमपर इनका आरोप किया गया है। ये बदलनेवाले हैं और अनित्य हैं। इनकी निन्दा-स्तुतिसे तुम्हारा वास्तवमें कुछ भी बिगड़ता-बनता नहीं है। अत: इनके सम्बन्धमें लोग कुछ भी कहें-सुनें, तुम उसकी ओर ध्यान ही मत दो। निरन्तर ध्यान रखो अपने मूल परमात्मस्वरूपकी ओर—जो नित्य है, शाश्वत है, निन्दा-स्तुतिसे परे है और सदा तुमसे अभिन्न है।

याद रखो—जबतक मिथ्या अभिमानवश तुम शरीर और नामको अपना स्वरूप माने हुए हो, तभीतक तुम्हें इनकी स्तुति-निन्दा और मान-अपमानसे सुख-दु:ख होते हैं। जिस दिन तुम अपनेको इनसे परे समझकर इनमें होनेवाली चेष्टाओंके द्रष्टा बन जाओगे, उसी दिन तुम इस कल्पित सुख-दु:खसे भी परे हो जाओगे। तुम्हारे अखण्ड नित्य आनन्दमय स्वरूपमें ये विकारी सुख-दु:ख हैं ही नहीं।

याद रखो—तुम्हारे आत्मस्वरूपमें कोई भी विकार नहीं है; वह सर्वथा विशुद्ध है। व्यावहारिक जगत‍्में कर्म करते समय तुम्हारी यदि इस आत्मस्वरूपमें स्थिति रहेगी तो व्यवहारमें यथायोग्य आचरण करते हुए भी तुम उससे अलग ही रहोगे। तथापि व्यावहारिक जगत‍्में इतना खयाल तो अवश्य होना चाहिये कि व्यवहार आदर्श हो; शास्त्रानुमोदित हो तथा आत्मस्वरूपकी स्थितिसे विचलित करनेवाला न हो।

याद रखो—व्यावहारिक जगत‍्में तुमको जैसे दूसरोंके द्वारा होनेवाली निन्दा-स्तुतिसे उद्विग्न नहीं होना चाहिये, वैसे ही तुम्हें यथासाध्य दूसरोंकी निन्दा-स्तुतिमें प्रवृत्त भी नहीं होना चाहिये। कहीं आवश्यकतावश किसीकी सच्ची स्तुति करनी पड़े तो इतनी आपत्तिकी बात नहीं; परंतु किसीकी निन्दा करके तो कभी जीभको गंदा करना ही नहीं चाहिये। निन्दामें पापकी—मलकी ही बाढ़ आयेगी और वह तुम्हारी जीभसे लगकर उसे तो गंदा करेगी ही, जीभके द्वारा अंदर मन:प्रदेशमें जाकर वहाँ भी गंदगी फैलायेगी।

याद रखो—वे लोग बड़े ही भाग्यवान् हैं और सच्चे परमार्थसाधक हैं, जो किसीके द्वारा निन्दा सुनकर उद्विग्न नहीं होते, प्रशंसा सुनकर हर्षित नहीं होते और स्वयं न तो जिन्हें किसीमें दोष दीखता है, न जिनकी जीभ क्षणभरके लिये भी किसीकी निन्दा करनेमें प्रवृत्त होती है और न जिनके कान ही किसीकी निन्दा सुनना पसंद करते हैं।