निराशा, विषाद आदिको मनमें स्थान मत दो

मनमें कभी निराशा, विषाद, उदासी, असमर्थताको स्थान मत दो; यह समझो कि मुझे अपना ध्येय निश्चय ही प्राप्त होगा। मनमें कभी ऐसी कल्पना न आने दो कि मेरा जीवन निष्फल होगा, मुझे भगवान‍्की प्राप्ति नहीं होगी।

मनमें यह दृढ़ निश्चय करो कि मेरा भगवान‍्के साथ नित्य सम्बन्ध है, भगवान‍्की पूर्ण और अनन्त कृपा मुझपर सदा-सर्वदा बरसती रहती है। भगवान‍्की कृपा मेरा भगवान‍्से अलग रहना देख ही नहीं सकती। इसलिये भगवान‍्की कृपाके बलसे ही मैं इसी जीवनमें निश्चय ही भगवान‍्को प्राप्त करूँगा।

भगवान‍्की प्राप्तिके प्रतिबन्धक काम-क्रोध, लोभ-मोह, मद-मत्सर, शोक-विषाद, दम्भ-दर्प, वैर-विरोध, अभिमान-अहंकार और ममता-आसक्ति आदि दोषोंको भगवत्कृपाने मारकर मेरे मनसे भगा दिया है, वे अब कभी मेरे समीप भी आनेका साहस नहीं कर सकते।

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मेरा मन भगवान‍्को पानेके लिये उत्साह, उमंग, उत्कण्ठा और उल्लास आदिसे भर गया है। उसमें श्रद्धा, विश्वास, निश्चयका ही साम्राज्य हो गया है।

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मेरे मनमें सभी सात्त्विक भावोंका उदय हो गया है—श्रद्धा-विश्वासके प्रभावसे निर्भयता, निश्चिन्तता, अलोलुपता, अनुभूति, धृति, क्षमा, दया, अहिंसा, तेजस्विता, नम्रता, शान्ति, शुद्धि, तितिक्षा, उपरामता, समता, सत्य, शम, दम, आर्जव, तप, त्याग, वैराग्य, संतोष, ज्ञान, समाधान और प्रेम आदि सद‍्गुण और सद्भावोंका पूर्ण विकास हो गया है। इनके नित्य संयोगसे मेरा मन परमानन्दसे भर गया है। अब मुझे पद-पदपर और पल-पलमें भगवत्कृपाके शुभ मंगलमय दर्शन होते हैं और मैं यह अनुभव करता हूँ कि मेरे चारों ओर ऊपर-नीचे, बाहर-भीतर केवल कृपा-ही-कृपा, आनन्द-ही-आनन्द भरे हैं।

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मेरा मन मेरे कल्याणमें ही नियुक्त है; क्योंकि वह मेरे वशमें है और वह भगवान‍्की ओर झुक गया है।

इसलिये मेरा मन मेरा मित्र है, उसकी प्रत्येक चेष्टा मित्रताके भावसे ही होती है।

अब मुझे यह दृढ़ निश्चय हो गया है कि मेरा मन सर्वथा भगवान‍्का अनुगामी होकर केवल उन्हींके अधिकारमें आ गया है और उन्हींके इशारेपर चलता है।

मैं पाप-तापसे मुक्त और भगवत्प्रेमसे युक्त होकर निहाल हो गया हूँ।