प्रभुकी वस्तु प्रभुके अर्पण
दूसरोंको सुख पहुँचाना, उनके दु:खको अपना दु:ख बनाकर अपना सुख उन्हें दे देना—इस प्रकारका क्षणभरका मनोरथ भी महान् पुण्यरूप है! दूसरेके दु:खको सर्वथा अपना बना लेना तो अत्यन्त ही महत्त्वकी बात है, उसके दु:खका जरा-सा हिस्सा बँटाना भी बहुत बड़ा सौभाग्य है। इसीमें मानवताका विकास है।
सत्पुरुषोंको दु:ख होता है, पर अपने दु:खसे नहीं। अपने दु:खकी उन्हें परवा ही नहीं होती। वे तो दूसरोंके दु:खसे ही दु:खी होते हैं। इसी प्रकार निर्विकार संतोंकी सहज नित्य सुखरूपता भी दूसरेके सुखमें सुखका अनुभव किया करती है।
गोस्वामी तुलसीदासजी कहते हैं—
संत हृदय नवनीत समाना।
कहा कबिन्ह परि कहै न जाना॥
निज परिताप द्रवइ नवनीता।
पर दुख द्रवहिं संत सुपुनीता॥
‘कवियोंने संत-हृदयकी तुलना नवनीतसे की, पर वह ठीक बैठी नहीं; क्योंकि मक्खन तो स्वयं ताप (गरमी) पाकर पिघलता है, लेकिन पवित्र-हृदय संत दूसरेके दु:खसे द्रवित हो जाते हैं।’
इसीलिये संत पुरुष स्वयं विपत्तिका वरण करके दूसरेको सुख पहुँचाया करते हैं। उनका जीवन होता है इसीलिये, नहीं तो उन आप्तकाम महात्माओंका जगत्के कर्मप्रपंचसे क्या सम्बन्ध!
संसारमें उनका जीवन सर्वथा घृणित, पापमय और निकृष्ट है, जो दूसरोंको दु:ख देनेके लिये ही जीवन धारण करते हैं और उसीमें सुख तथा सफलताकी अनुभूति करते हैं।
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भूखे गरीबको अन्न, नंगेको कपड़ा, रोगीको दवा तथा पथ्य और निराश्रयको आश्रय जरूर दो, परंतु मनमें ऐसा अभिमान कभी मत करो कि वह आश्रयहीन दरिद्र है और मैं उसपर उपकार करनेवाला समर्थ कृपालु हूँ। असलमें सबको भगवान् ही देते हैं। तुम तो उसमें निमित्तमात्र हो। शुभ कर्ममें भगवान्ने तुमको निमित्त बनाया है, यह तुमपर उनकी विशेष कृपा है।
सभी रूपोंमें भगवान् हैं, यह समझकर भगवत्पूजाकी भावनासे गरीब, अपाहिज और रोगीकी खूब सेवा करो; और भगवान्ने इन रूपोंमें आकर तुम्हारी सेवाको स्वीकार किया, इसे अपना परम सौभाग्य समझो।
असलमें तुम्हारे पास तुम्हारा अपना है ही क्या? सभी वस्तुएँ भगवान्की ही हैं। तुम उन्हें अपनी मानकर और अपनेको उनका दाता समझकर अभिमान करने लगो तो यह तुम्हारी बेईमानी होगी। प्रभुकी वस्तु प्रभुके अर्पण हो और यह कार्य सुचारुरूपसे—सुव्यवस्थित रीतिसे हो, यह तुम्हारा कर्तव्य है। कर्तव्यसे चूकते हो तो तुम मालिकके अपराधी बनते हो।
भगवान्की वस्तुओंको अपनी मानना बेईमानी, उन्हें अपनी बताकर किसीपर अहसान करना बेईमानी, अपनेको उनका दानी घोषित कर रोब गाँठना बेईमानी और न देकर स्वयं मालिक बन बैठना तो सबसे बड़ी बेईमानी है।
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यह सदा स्मरण रखो कि सब कुछ भगवान्का है और सब भगवान्के रूप हैं। भगवान्की वस्तु, भगवान्को जब जिस रूपमें जैसे जरूरत हो, उस रूपमें वैसे ही देनेके लिये ही वह वस्तु तुम्हें सौंपी गयी है और इस सेवाका तुम्हें सदा बदला मिलता रहता है—यहाँ ‘योग-क्षेम’ का निर्वाह होता है और मति-गति शुभ होती है। आगे इससे भी बहुत बड़ा पुरस्कार मिलनेवाला है। इस सेवाके बदलेमें मालिक स्वयं तुम्हें अपना आत्मदान करनेवाले हैं। इसलिये ईमानदारीसे सेवा करनेमें कभी मत चूको।