प्रशंसामें भूलो मत
याद रखो—ऐसा कोई मनुष्य नहीं है, जिसमें कोई सद्गुण न हो तथा ऐसा भी कोई नहीं, जो दोषोंसे सर्वथा रहित हो। सभी गुण-दोषमय हैं। किसीमें दोष अधिक प्रकट हैं तो किसीमें गुण। ये दोष-गुण प्रकट होते हैं अनेक बाहरी कारणोंसे। हम किसीके सामने शुभ तथा सत् विषयोंको रखकर उनके सजातीय गुणोंको—जो छिपे हुए हैं, प्रकट कर सकते हैं और अशुभ तथा असत् विषयोंको रखकर उनके सजातीय दोषोंको प्रकट कर सकते हैं। गुण प्रकट होनेपर उन्हींके अनुसार क्रिया होती है, जिससे उसका तथा उसके सम्पर्कमें आनेवाले सभीका न्यूनाधिक हित होता है और सुख मिलता है। दोष प्रकट होनेपर भी उन्हींके अनुसार क्रिया होकर उसका तथा जगत्के लोगोंका अहित होता है और उन्हें दु:ख मिलता है। अतएव ऐसी कोई चेष्टा मत करो, जिससे किसीके अंदर छिपी हुई बुराई प्रकट हो और वह बुरा बन जाय। अपने सदाचरणोंके द्वारा मनुष्यके अंदर सोये हुए सद्गुणोंको जगाओ, बुरा आचरण करके दोषों-दुर्गुणोंको मत जगाओ।
••••
याद रखो—निन्दा-चुगली करके, गाली देकर या चुभनेवाली बात सुनकर अहित और अप्रिय आचरण करके एवं क्रोध, मान या लोभवश अन्यान्य आचरण करके किसीके अंदर सोयी हुई बुराईको जगाओगे और बढ़ा दोगे तो तुम जगत्का बड़ा अमंगल करोगे। फलत: तुम्हारा भी अमंगल निश्चित होगा। इसी प्रकार यदि तुम सच्ची प्रशंसा करके मधुर-प्रिय बात सुनाकर हितपूर्ण प्रिय आचरण करके प्रेम, सौहार्द और हितबुद्धिसे न्यायपूर्ण और प्रेमपूर्ण आचरण करके किसीके अंदर सोयी हुई भलाईको जगा दोगे तो तुम जगत्का मंगल करोगे और फलत: तुम्हारा भी मंगल अवश्य होगा।
याद रखो—जैसा बीज होता है, वैसा ही फल होता है। भलाईके बीज बोओगे तो भलाई पैदा होगी और वह अनन्तगुनी होकर दूर-दूरतक फैल जायगी। इसलिये यदि किसीमें बुराई प्रकट है और वह तुम्हारे साथ भी बुरा बर्ताव कर रहा है, तब भी उसके साथ भलाईका भला बर्ताव करो। भलाईकी इतनी प्रबल धार हो कि उसमें उसके बुराईके सब पौधे समूल बह जायँ। फिर उनके स्थानमें तुम अपनी भलाईके बीज बिखेर दो—प्रचुर मात्रामें, जो निश्चितरूपसे भलाई-ही-भलाई उत्पन्न कर दे।
••••
याद रखो—यदि लोग बुराईके बदले बुराई करना छोड़ दें तो बुराईकी परम्परा कुछ ही समयमें नष्ट हो जायगी और फिर सभीमें सब ओर भलाई-ही-भलाई भर जायगी, क्योंकि बुराई-से-बुराई और भलाई-से-भलाई उत्पन्न होती है। इसलिये बुराई करनेवालेके साथ जी भरकर भलाई करो, निन्दा करनेवालेमें भी गुणोंको खोजकर उनकी तारीफ करो, गाली देनेवालोंको आशीर्वाद दो, मारनेवालोंके लिये भगवान्से प्रार्थना करो और अपने मनको सदा ही सद्भावनासे भरा रखो—जिसमें वह किसीकी बुराईके बदलेमें बुराई करनेकी कल्पना भी न कर सके।
••••
याद रखो—जो लोग तुम्हारी निन्दा करते हैं, वे चाहे किसी कारणसे करते हों, तुम्हारा भला ही करते हैं, और उनकी की हुई निन्दामेंसे अधिकांश सत्य होती है तथा प्रशंसा करनेवालोंकी प्रशंसामें अधिकांश झूठी होती है। गहराईसे देखोगे तो इसका स्पष्ट पता चल जायगा। अतएव प्रशंसामें भूलकर भी भूलो मत, भूलो मत और निन्दामें दु:खी मत होओ। वरं निन्दापर विचार करो और उसमें जितनी सत्यता हो उसका तुरंत संशोधन करके निन्दकका उपकार मानो और बदलेमें उसकी नि:स्वार्थ सेवा करनेका शुद्ध प्रयत्न करो।