सबके साथ मित्रताका बर्ताव करो
सबके साथ सहानुभूति और नम्रतासे युक्त मित्रताका बर्ताव करो। संसारमें अधिक मनुष्य ऐसे ही मिलेंगे जिनकी कठिनाइयाँ, जिनके कष्ट तुम्हारी कल्पनासे कहीं अधिक हैं। तुम इस बातको समझ लो और किसीके साथ भी अनादर और द्वेषका व्यवहार न करके विशेष प्रेमका व्यवहार करो।
तुमसे कोई बुरा बर्ताव करे तो उसके साथ भी अच्छा बर्ताव करो और ऐसा करके अभिमान न करो। दूसरेकी भलाईमें तुम जितना ही अपने अहंकार और जागतिक स्वार्थको भूलोगे, उतना ही तुम्हारा वास्तविक हित अधिक होगा।
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याद रखो—भगवान्के राज्यमें भलाईका फल बुराई कभी हो नहीं सकता। इसी तरह बुराईका फल भलाई नहीं होता। तुम्हारे साथ यदि कोई बुरा बर्ताव करता है और तुम भी यदि उसके साथ वैसा ही बर्ताव करोगे तो इससे यही सिद्ध होगा कि तुम्हारे अंदर कोई ऐसा दोष भरा है, जो यह चाहता है कि लोग तुमसे द्वेष करें और तुमको सतायें।
ऐसा न होता तो तुम अच्छा बर्ताव करते और उसके बदलेमें भगवान्के न्यायसे, अब नहीं तो कुछ दिनों बाद तुम्हें अच्छा बर्ताव मिलता ही। अच्छे बर्तावके फलस्वरूप तुम्हारे हृदयमें अच्छाईका भरना तो अनिवार्य ही है।
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अच्छा बर्ताव—निश्छल प्रेमका व्यवहार करके सबमें भलाईका— प्रेमका वितरण करो। यही सच्ची सहायता और सच्चा आश्वासन है। तुम जैसा व्यवहार करोगे, वैसा ही जगत्को दोगे और वैसा ही तुम पाओगे भी।
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सभीको प्रेमभरी मधुरता और सहानुभूतिभरी आँखोंसे देखो।
याद रखो—सुखी जीवनके लिये प्रेम ही असली खुराक है। संसार इसीकी भूखसे मर रहा है! अतएव प्रेम वितरण करो—अपने हृदयके प्रेमको हृदयमें ही मत छिपा रखो। उसे उदारताके साथ बाँटो। जगत्का बहुत-सा दु:ख दूर हो जायगा।
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जिसके बर्तावमें प्रेमयुक्त सहानुभूति नहीं है, वह मनुष्य जगत्में भाररूप है और जिसके हृदयमें स्वार्थयुक्त द्वेष है वह तो जगत्के लिये अभिशापरूप है। हृदयमें विशुद्ध प्रेमको जगाओ, उसे बढ़ाओ और सब ओर उसका प्रवाह बहा दो। तुमको अलौकिक सुख-शान्ति मिलेगी और तुम्हारे निमित्तसे जगत्में भी सुख-शान्तिका प्रवाह बहने लगेगा। याद रखो—प्रेम ईश्वरका स्वरूप है।
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याद रखो—जो कुछ बोओगे, वही अनन्तगुना होकर तुम्हें वापस मिलेगा। बीजके अनुसार ही फल होते हैं। भलाईके बीज बोओ—भलाईके फलोंसे तमाम खेत हरा-भरा हो जायगा। वह तुम्हें भी मिलेगा और जगत् भी उसे पाकर संतुष्ट होगा। द्वेष और वैरसे मनुष्य जैसे जगत्को नरक बना देता है, वैसे ही सहानुभूति और प्रेमसे उसे स्वर्गसे भी बढ़कर बना सकता है।
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जो केवल अपना ही स्वार्थ देखते हैं और जिनका ‘अपना’ बहुत ही सीमित होता है, वे बड़े संकुचित मतवाले होते हैं और उनसे भला बर्ताव नहीं हो पाता। जिनका ‘अपना’ विस्तृत हो गया है, जो सारे जगत्में ‘अपनत्व’ का अनुभव करते हैं, वे गंदे स्वार्थके वशमें होकर जगत्का अहित नहीं कर सकते। उनका स्वार्थ ही परमार्थ होता है।
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मनुष्यमें ज्यों-ज्यों प्रेमका विस्तार होता है, त्यों-ही-त्यों उसके ‘स्व’ का दायरा भी बढ़ता जाता है। बढ़ते-बढ़ते वह सारे विश्वमें छा जाता है। फिर विश्व-कल्याणमें ही उसे अपना ‘कल्याण’ दीखता है। यही प्रेमका शुद्ध रूप है।
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ऐसी हालतमें विश्वके किसी मानवकी बुराई उसे अपने ही किसी अंगकी बीमारी मालूम होती है—अतएव उसे दु:ख होता है और स्वाभाविक ही वह उस बीमारीको मिटानेकी कोशिश करता है। उसका द्वेष बीमारीसे होता है, अंगसे नहीं। वह अंगको नुकसान पहुँचानेमें अपना लाभ नहीं समझ सकता, बल्कि अपने सारे अंगोंको सहज ही उस अंगको नीरोग करनेमें लगा देता है।
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कदाचित् सड़न अधिक होने और उसके द्वारा सारे शरीरके विषाक्रान्त होनेकी सम्भावना होती है तो उस बीमार अंगको वह कटवा भी देता है; परंतु उस समय भी उसके मनमें द्वेषकी जरा-सी भी कल्पना नहीं होती!
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बस, प्रेमका विस्तार होनेपर इसी प्रकार सारे जगत्के साथ अपने आत्माके समान ही व्यवहार—बर्ताव होता है तथा इसी प्रकार सुख-दु:खमें भी समानता होती है। फिर किसीकी बुराई कैसे हो; क्योंकि उसमें अपनी ही तो बुराई होती है।
इस प्रेमका मर्म समझो, इसीमें तुम्हारा तथा विश्वका हित है और इसीमें भगवान्की पूजा है। प्रेमस्वरूप श्रीभगवान्की सच्ची पूजा पावन प्रेमसे ही होती है।