सच्चा आनन्द

याद रखो—आनन्द, सच्चा आनन्द तुम्हारे अंदर है और वह नित्य है। तुम बाहरी वस्तुओंमें—धनमें, जनमें, मानमें, प्रतिष्ठामें, भोगोंमें, आराममें, विलासितामें और परिवारमें आनन्द खोजते हो—यही तुम्हारा भ्रम है।

••••

याद रखो—आनन्द किसी भी सांसारिक स्थिति-विशेषमें नहीं है। तुम जो समझते हो कि ‘मेरी अमुक परिस्थिति हो जायगी, इतना धन हो जायगा, अमुक अधिकार मिल जायगा, पुत्र हो जायगा, जगत‍्में यश फैल जायगा और लोग मेरा सम्मान करने लगेंगे तब मैं सुखी हो जाऊँगा’ यह तुम्हारा भ्रम है।

••••

याद रखो—तुम्हारे वर्तमान दु:खका या आनन्दके अभावका कारण कोई परिस्थिति नहीं है, इसका प्रधान कारण है, नित्य सत्य आन्तरिक आनन्दको न जानना। आनन्दमय भगवान‍्के नित्य सान्निध्यका अनुभव न करना।

याद रखो—जब तुम्हारी वृत्ति अन्तर्मुखी हो जायगी, जब तुम नित्य-निरन्तर सच्चिदानन्दमयके सान्निध्यका सर्वदा अनुभव करने लगोगे, जब उन्हीं आनन्दमयके साथ नित्य संयुक्त हो जाओगे, तब बाहरी कोई भी परिस्थिति तुम्हारे आनन्दको नहीं छीन सकेगी। अपमान, अकीर्ति, दरिद्रता, मित्रहीनता आदि किसी भी स्थितिमें तुम्हारे आनन्दका अभाव नहीं होगा।

••••

याद रखो—तुम जो अपनेको दु:खी मान रहे हो इसीसे दु:खी हो। दु:खी माननेका कारण है अभावका बोध; अभावमें प्रतिकूलताकी अनुभूति होती है और प्रतिकूलता ही दु:ख है। संसारकी परिस्थिति तो कभी ऐसी होती ही नहीं कि जो सदा और सर्वदा सबके अनुकूल हो। प्रत्येक परिस्थितिमें मंगलमय श्रीभगवान् स्वयं विद्यमान हैं, प्रत्येक परिस्थिति मंगलमय भगवान‍्का मंगल-विधान है और प्रत्येक परिस्थिति वस्तुत: लीलामय भगवान‍्की लीलाका ही एक अंग है। यह विश्वास करके यदि तुम परिस्थितिके बाहरी रूपको न देखकर परिस्थितिके परदेमें छिपे हुए श्रीभगवान् को, श्रीभगवान‍्के मंगल-विधानको या श्रीभगवान‍्की लीलाको देखने लगो, उनका मधुर स्पर्श पा सको तो सभी परिस्थितियाँ तुम्हारे लिये अनुकूल हो जायँगी; क्योंकि सभीमें भगवान‍्की अनुभूति होगी—अभाव कहीं रहेगा ही नहीं; और जब अभाव नहीं होगा, तब दु:ख भी नहीं होगा। वस्तुत: दु:ख नहीं होगा, इतना ही नहीं—भगवान‍्की सन्निधिका अनुभव परम अनुकूल होनेसे तथा स्वयं परमानन्दमय होनेसे वह तुम्हारे लिये परमानन्दका कारण होगा। तुम उस समय ऐसे विलक्षण आनन्दका अनुभव करोगे कि फिर जागतिक किसी भी अभावकी स्मृति ही तुमको नहीं होगी!

••••

याद रखो—भाव-अभाव, अनुकूलता-प्रतिकूलता जो कुछ भी है, सभी लीलामय श्रीभगवान‍्के स्वाँग हैं, जिनको तुम्हारे मंगलके लिये ही भगवान‍्ने धारण किया है। उन भगवान‍्को जब पहचान लोगे, तब फिर चाहे वे किसी भी सुन्दर या भयानक स्वाँगमें रहें तुमको न भय होगा, न दु:ख। स्वाँग तुम्हारे लिये मनोरंजनकी सामग्री होगी और तुम उसे देख-देखकर पल-पलमें और पद-पदपर मुग्ध होते रहोगे। तुम्हारा दु:ख-स्रोत सदाके लिये सूख जायगा। तुम फिर स्वयं आनन्दके भण्डार बन जाओगे।

••••

याद रखो—जो लोग आनन्दके लिये परिस्थितिकी अनुकूलता खोज रहे हैं या अभावकी पूर्ति करके आनन्द प्राप्त करना चाहते हैं, उनको कभी स्थिर नित्य आनन्दके दर्शन होंगे ही नहीं; क्योंकि उनका अभाव कभी मिटनेका ही नहीं है। संसारमें कहीं भी—किसीमें भी पूर्णता नहीं है। वे जो कुछ भी पायेंगे, उसीमें उन्हें अपूर्णता—अभावकी अनुभूति होगी और अभावकी अनुभूति ही प्रतिकूलता है। अतएव वे कभी सुखी हो ही नहीं सकेंगे।

••••

याद रखो—सच्चा सुख या परम आनन्द चाहते हो तो सांसारिक अभाव या प्रतिकूलताका ही अभाव कर दो। भगवान् नित्य हैं, सत्य हैं, सर्वत्र, सर्वदा और सर्वथा हैं; उन्हींको देखो। उनका कहीं भी, कभी भी अभाव नहीं है। उनको सर्वत्र देखने लगोगे तब सांसारिक अभाव या प्रतिकूलताका अभाव अपने-आप ही हो जायगा, क्योंकि भगवान‍्के भावमें ही—इनके होनेका भ्रम हो रहा है। ये जहाँ दीख रहे हैं; वहाँ वस्तुत: ये नहीं हैं, वहाँ भगवान् ही हैं। यदि तुम सर्वत्र व्याप्त सर्वरूपमें स्थित उन भगवान‍्को देख सकोगे तो तुम्हें उस नित्य सत्य आनन्दकी प्राप्ति सहज ही हो जायगी, जिसकी खोजमें तुम सदा-सर्वदा लगे रहते आये हो!