सच्ची समता
याद रखो—जगत्में छोटे-बड़े, नीचे-ऊँचे, अधम-उत्तम जितने भी जड-चेतन प्राणी हैं सबमें भगवान् भरे हैं, सभी भगवान्से ओत-प्रोत हैं। उनकी आकृति-प्रकृतिमें, खान-पानमें, व्यवहार-बर्तावमें चाहे जितना भेद हो, पर उन सबके अंदर नित्य समभावसे विराजमान भगवान्में तनिक भी भेद नहीं है।
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याद रखो—जो मनुष्य इन सर्वस्वरूप, सर्वव्यापी, सर्वात्मा भगवान्की ओर देखता हुआ जगत्में व्यवहार करता है, उसके व्यवहारमें यथायोग्य व्यावहारिक विषमता रहनेपर भी मनमें कोई विषमता नहीं रहती। वह समतामें स्थित होकर वैसे ही विषम व्यवहार करता है, जैसे मनुष्य आत्मरूपमें सर्वत्र समान देखता हुआ भी अपने ही हाथसे दूसरे प्रकारका व्यवहार करता है और पैरसे दूसरे प्रकारका। पर उसके मनमें हाथ या पैर किसीके प्रति राग-द्वेष नहीं है। दोनोंमें ही समान आत्मबुद्धि है। इसलिये व्यवहार कैसा भी हो, उससे जान-बूझकर न हाथका अपमान—अहित होता है और न पैरका ही। इसी प्रकार उस मनुष्यके द्वारा किसीका अपमान या अहित नहीं होता।
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याद रखो—जो मनुष्य मनमें विषमता रखता है, अनेक प्रकारसे भेद-बुद्धि रखता है, पर बाहर सबको समान बताकर सबके साथ समान बर्ताव करना चाहता है, उसका यह साम्यभाव कभी सफल नहीं होता; क्योंकि भिन्न-भिन्न स्वभावोंके विभिन्न प्रकारके प्राणियोंसे सभी प्रसंगोंमें समताका व्यवहार सम्भव ही नहीं है। बुद्धिमान् तथा श्रेष्ठ विचारवाले पुरुषोंके प्रति जितने आदरका व्यवहार होगा, उतना मूर्ख और नीच विचारवाले पुरुषोंके साथ नहीं होगा। कुत्ते, गाय और हाथीके साथ किसी भी क्षेत्रमें एक-सा व्यवहार सम्भव नहीं। साँप-बिच्छूके साथ वैसा व्यवहार तुम नहीं कर सकते, जैसा गाय-बकरीके साथ करते हो; परंतु व्यवहारमें विषमता रखते हुए भी तुम आत्मरूपसे सबमें समान भाव रख सकते हो। भगवत्-रूपसे मन-ही-मन सबको पूजनीय मानते हुए उनका सत्कार कर सकते हो।
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याद रखो—भीतरकी समता ही सच्ची समता है; क्योंकि उसके प्राप्त होनेपर राग-द्वेषका, अपने-परायेका सर्वथा अभाव हो जाता है; फिर सभीमें समभावसे भगवद्बुद्धि रहती है, सभीके प्रति समान भावसे श्रद्धापूर्वक सेवाका आचरण होता है। किसीका बुरा करनेकी बात मनमें कभी आ ही नहीं सकती। कहीं किसीसे कोई हानि हो भी जाती है तो भी मनमें वैसे ही उसपर क्रोध नहीं होता, जैसे दाँतोंसे जीभ कट जानेपर दाँतोंपर क्रोध नहीं होता।
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याद रखो—भगवान्में स्थित रहकर अथवा सर्वात्मारूपसे विराजमान भगवान्की ओर देखता हुआ जो जगत्में व्यवहार करता है उसका प्रत्येक कर्म भगवान्की पूजा होता है। वही यथार्थमें सर्वरूपोंमें विराजमान भगवान्का सर्वत्र पूजन कर सकता है। किसी भी देश, किसी भी काल और किसी भी पात्रमें उसके भगवान् उसकी आँखोंसे कभी ओझल नहीं होते, वह सर्वत्र उनको देख-देखकर श्रद्धावनत मस्तकसे प्रणाम करता है और उनकी विचित्र स्वरूपाकृतियों और भावभंगिमाओंको देख-देखकर मुग्ध होता रहता है। तुम यदि इस प्रकार सर्वत्र भगवान्को देख सको तो तुम्हारा भी विषम व्यवहार समरूप भगवान्की समरूप पूजामें परिणत हो जायगा।
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याद रखो—जगत्में विषमता कभी मिट नहीं सकती। जगत् भगवान्का लीलाक्षेत्र है। लीलामें समता हो जाय तो लीला ही न रहे। जगत्में यदि प्रकृति साम्यभावको प्राप्त हो जाय तो जगत् ही न रहे। अतएव भगवान्की लीलाके लिये चित्र-विचित्र विभिन्न भावों, गुणों, आकृतियों और क्रियाओंकी आवश्यकता है। पर इन सारे भावों, गुणों, आकृतियों और क्रियाओंमें सर्वत्र समभावसे भगवान् भरपूर हैं। जो इन भरपूर भगवान्को देखकर, पहचानकर जगत्में व्यवहार करता है, उसमें जगत्की दृष्टिसे व्यावहारिक यथायोग्य विषमता रहते हुए ही जिसका व्यवहार वस्तुत: समत्वपूर्ण होता है वही सच्चा साम्यवादी है; जिसका बाह्य विषम व्यवहार आभ्यन्तरिक समतासे उत्पन्न और समतासे युक्त है। पर जो केवल बाहरसे समव्यवहारका प्रयत्न करता है, अंदर विषमता रखता है, वह तो समताका रहस्य ही नहीं समझता। ऐसे विषमतासे उत्पन्न और विषमतासे युक्त साम्यवादसे सदा दूर रहो।