सच्चे संत

याद रखो—सच्चे संत भगवत्स्वरूप ही होते हैं। भगवान‍्की भाँति संत भी स्वभावसे सब हैं, सब उन्हींमें हैं, वे सबमें हैं, सबके हैं और सबसे पृथक् भी हैं। यह सब इसीलिये कि वे भगवान‍्को प्राप्त हैं।

याद रखो—सच्चे संत विश्वके आधार हैं, विश्वके आराध्य हैं, विश्वरूप हैं, विश्वकी रक्षा हैं और विश्वकी शोभा हैं। वे धर्मके आधार हैं, धर्मस्वरूप हैं, धर्ममय हैं और धर्मकी रक्षा हैं। उनके द्वारा स्वभावसे ही ऐसी क्रियाएँ होती हैं, जिनसे विश्व तथा धर्मकी रक्षा होती रहती है। इतनेपर भी वे विश्वसे सदा परे होते हैं।

याद रखो—संतमें अहंकारका लेश भी नहीं होता, इसीसे वे अपने पुरुषार्थसे भगवत्प्राप्तिका दावा नहीं करते। वे भगवत्प्राप्तिमें भगवत्कृपाको ही मुख्य मानते हैं। उनका पुरुषार्थ वस्तुत: भगवत्कृपासे ही संचालित और उससे अभिन्न होता है।

याद रखो—संत भगवान‍्की ही भाँति दयाके समुद्र होते हैं, वे स्वभावसे ही सबके सुहृद् होते हैं। उनकी दयामें न कायरता होती है न ममता, न स्वार्थ होता है न भय, न कामना होती है न अभिमान। जैसे सूर्य स्वभावसे ही विश्वको प्रकाश देता है, वैसे ही संत विश्वके प्राणियोंपर दया करते हैं। पर संत बड़े दूरदर्शी या सर्वदर्शी होते हैं। अत: उनकी दया भी परिणामके यथार्थ हितको ही देखती है। इसीलिये संत अत्यन्त मृदुस्वभाव तथा नित्य दयासे द्रवित रहनेपर भी कहीं-कहीं वज्रसे भी कठोर प्रतीत होते हैं।

याद रखो—संत सर्वथा समभावापन्न, समतामय, मूर्तिमान् समत्व ही होते हैं। वे किसीमें कुछ भी आसक्ति न रखते हुए भी सबके प्रति निश्छल प्रेम करते हैं। साधारण मनुष्यको शरीरसे चाहे किसी भी अंगमें कोई सुख-दु:ख हो, जैसे उसकी समान रूपसे अनुभूति होती है; क्योंकि उसकी समस्त शरीरमें अहंकार और ममतायुक्त समता होती है। वैसे ही संतकी समस्त जीव-समूहोंमें अहंकार और ममतासे रहित स्वाभाविक समता होती है। वे दूसरे समस्त जीवोंके सुख-दु:खमें सुखी-दु:खी-से होकर प्राणोंकी बलि देकर भी उनके दु:खोंको दूर करते और सुखोंको बढ़ाते हैं। विषयी लोग जहाँ अपने भ्रमात्मक स्वार्थके लिये दूसरेका चाहे जैसा अहित करनेमें भी नहीं सकुचाते, ठीक इसके विपरीत वे संतजन दूसरोंके यथार्थ हितके लिये हँसते-हँसते अपने शरीर तथा जगत‍्के माने हुए सर्वस्वको न्योछावर कर देते हैं। पर अपने ऊपर आये हुए सुख-दु:खकी ओर वे दृष्टिपात ही नहीं करते। उनके ऐसे व्यवहारमें विषमता दीखनेपर भी उनके अंदर नित्य निर्दोष समता रहती है। न तो उन्हें कोई बड़े-से-बड़ा सुख ही विचलित कर सकता है और न भयानक-से-भयानक दारुण दु:ख ही।

याद रखो—मान-अपमान, स्तुति-निन्दा और लाभ-हानि सभी द्वन्द्वोंमें संत सम रहते हैं। वे मान, स्तुति तथा लाभमें हर्षसे फूलते नहीं और अपमान, निन्दा तथा हानिमें विषादसे अपने स्वरूपको भूलते नहीं; पर यथायोग्य व्यवहार करनेमें सकुचाते भी नहीं। न तो वे मान, स्तुति और लाभको स्वीकार करनेमें डरते हैं और न अपमान, निन्दा और हानिका प्रतीकार करनेमें ही स्वरूपकी हानि समझते हैं। ऐसा करते हुए भी वे इनसे सदा परे, निर्लिप्त तथा नित्य निर्विकार रहते हैं।

याद रखो—संत स्वभावसे ही क्षमा, प्रेम, संतोष, कल्याण, करुणा और सदाचारकी मूर्ति होते हैं। वे सर्वदा संतापहीन, आनन्दमय तथा शान्तिके भण्डार होते हैं और अपने स्वाभाविक आचरणोंके द्वारा जगत‍्के प्राणियोंका संताप हरते हुए उनमें क्षमा, प्रेम, संतोष, कल्याण, करुणा, सदाचार, आनन्द और शान्तिका प्रचार-प्रसार और विस्तार करते रहते हैं।

याद रखो—संतोंके लिये कुछ भी कर्तव्य या विधि-निषेध न होनेपर भी वे बड़े कर्तव्यपरायण और विधिका अनुसरण करनेवाले होते हैं। उनमें बसी हुई लोककल्याणकारिणी वृत्ति उनके द्वारा निरन्तर ऐसे कार्य करवाती है, जिससे जगत‍्का कल्याण हो। वे वृत्तियोंसे परे नित्य स्वरूपस्थित रहते हुए ही सावधान साधककी भाँति सदा शुभ आचरण करते हैं तथा ग्रहण-त्यागकी परिधिसे परे होते हुए ही शुभका ग्रहण और अशुभका त्याग करते हैं। इसीलिये उनका जीवन अन्य लोगोंके लिये आदर्श होता है।

याद रखो—सभी सच्चे संत अंदरसे वस्तुत: ऐसे होनेपर भी सबके बाहरी आचरण ऐसे ही हों—एक-से ही हों, यह आवश्यक नहीं है।