संत-दर्शन
याद रखो—जिसको अपने जीवनमें एक बार भी सच्चे संतके दर्शनका, उससे उपदेश प्राप्त करनेका, उसके करस्पर्शका और उसकी चरणधूलि सिर चढ़ानेका सौभाग्य प्राप्त हो गया, वह परम आनन्द और परम शान्तिका सहज ही अधिकारी हो गया।
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याद रखो—संतोंके दर्शन, स्पर्श, उपदेश-श्रवण और चरणधूलिके सिर चढ़ानेकी बात तो दूर रही, जो कभी अपने मनसे संतोंका चिन्तन भी कर लेता है, वही शुद्धान्त:करण होकर भगवत्प्राप्तिका अधिकारी बन जाता है।
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याद रखो—संत-दर्शन और संत-प्राप्तिका फल परम कल्याणकारी होता है। अनजानमें यदि किसीको संत-समागम मिल जाता है तो वह भी संतके स्वाभाविक पाप-नाशक गुणका स्पर्श पाकर निष्पाप हो जाता है।
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याद रखो—संतोंके द्वारा किसीका अहित तो हो ही नहीं सकता। वे यदि किसीको शाप दे देते हैं तो उससे भी परिणाममें हित ही होता है। नारदजीने नलकूबर और मणिग्रीवको शाप दिया था, वे अर्जुनके जुड़े वृक्ष बन गये; परंतु परिणाममें उन्हें भगवान् श्रीकृष्णके दर्शनका सौभाग्य मिला।
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याद रखो—संतोंके द्वारा उनका अहित करनेवालोंका भी कल्याण ही होता है। अमृतसे भले ही कोई मर जाय; परंतु संतसे किसीका अहित हो नहीं सकता। कुल्हाड़ा चन्दनको काटता है, परंतु चन्दन अपने स्वभावज गुणसे उसे अपनी सुगन्ध देकर चन्दन बना लेता है, वैसे ही संत भी अपने प्रति बुरा करनेवालोंका कल्याण ही करते हैं।
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याद रखो—संतका स्वभाव ही परहित होता है, लोक-कल्याणके लिये ही उनका जीवन होता है। उन्हें कुछ करना नहीं पड़ता, अपने-आप ही उनके द्वारा लोगोंका कल्याण होता रहता है।
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याद रखो—संत स्वयं सांसारिक सुख-दु:खोंसे परे होते हैं, उन्हें किसी वस्तुपर ममता नहीं होती और कहीं भी उनमें अहंकाररूप विकार नहीं रहता, तथापि वे दूसरोंके सुख-दु:खसे सुखी-दु:खी-से होते देखे जाते हैं। यह उनका स्वभाव है।
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याद रखो—संतोंको शरीरका कोई मोह नहीं होता, वे शरीरको सर्वथा असत् मानते हैं। एक परमात्मसत्ताके सिवा उनकी दृष्टिमें और कुछ रहता ही नहीं। तथापि दूसरोंके शरीरपर आये हुए कष्टोंके निवारणके लिये वे अपने शरीरकी सहज ही आहुति दे डालते हैं, यह भी उनका स्वभाव है।
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याद रखो—संतोंकी पहचान कोई भी मनुष्य विषयोंमें फँसी हुई अपनी बुद्धिसे नहीं कर सकता। वे बुद्धिमें आनेवाले भावोंसे बहुत ऊपर उठे होते हैं, किसी भी बाहरी लक्षणसे उन्हें कोई नहीं पहचान सकता। संतोंकी प्राप्ति और पहचान भगवान् और संतोंकी कृपासे ही हो सकती है। अतएव संत-समागम और संत-परिचयके लिये भगवान्से और संतोंसे प्रार्थना करो।
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याद रखो—संत-सेवा और संत-पूजाका सबसे प्रधान साधन है संतोंके बतलाये हुए मार्गपर श्रद्धा और साहसके साथ चलना। जो अपनी साधनाके द्वारा संतोंकी साधनाकी पूजा करता है, वही असलमें सच्ची संत-सेवा करता है।