सारा गौरव भगवान्का ही है
याद रखो—मनके मलोंमें सबसे बढ़कर गहरा चिपटा हुआ मल है अहंकार। यह सहज ही दूर नहीं होता। इसके नाशके लिये लगातार जीतोड़ जतन करना पड़ता है; परंतु जबतक अहंकार रहता है, तबतक साधना सिद्ध नहीं हो सकती। अहंकारकी जरा-सी हुंकारसे ही किया-कराया चौपट हो जाता है। अहंकारका नाश होता है अपने गौरव या बड़प्पनका त्याग करनेसे। बात भी यही है—मनुष्यके पास अपने बड़प्पनकी वस्तु ही कौन-सी है? यदि कहीं कुछ गौरव है तो वह श्रीभगवान्का ही है। जो मनुष्य मोहवश भगवान्के गौरवको छीनकर अपनेमें आरोप करनेकी चेष्टा करता है, वह अहंकारके वशमें हो जाता है। और जहाँ अहंकारका अंकुर पैदा हुआ, वहीं सारे पुण्य नष्ट हो जाते हैं—‘अहंकारांकुरस्याग्रे तदा पुण्यं न तिष्ठति’।
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याद रखो—भगवान्को छोड़कर और किसीका भी सहारा ऐसा नहीं है, जो तुम्हारी सारी विपत्तियोंका समूल नाश कर दे। यहाँतक कि साधन करनेवाला पुरुष भी यदि यह मानता है कि इस साधनके बलसे मैं सारी बाधा-विपत्तियोंसे छूट जाऊँगा, तो वह भी गलती करता है। सर्वविपद्भंजन तो एकमात्र श्रीभगवान् ही हैं। उनकी अहैतुकी और असीम दयापर विश्वास करके उन्हींकी दयाका आश्रय करके साधन-भजन करना चाहिये।
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याद रखो—श्रीभगवान् मंगलमय हैं, उन्होंने तुम्हारे लिये जो कुछ विधान कर दिया है, वह सर्वथा मंगलसे परिपूर्ण है। यदि तुम उनके मंगल-विधानको प्रसन्नताके साथ स्वीकार न करोगे तो निश्चय समझो तुम बड़े ही अभागे हो। तुम अबोध हो, तुम्हें वह बुद्धि ही कहाँ है कि जिससे तुम अपनी सच्ची भलाई-बुराईको समझ सको। इसीसे दयासागर सर्वज्ञ भगवान्ने तुम्हारा सारा भार अपने ऊपर ले रखा है। तुम्हारा तो बस यही काम है कि तुम उनके मंगलमय श्रीचरणोंमें अपनेको समर्पित कर दो और पूर्णरूपसे निर्भय तथा निश्चिन्त होकर उनके प्रत्येक विधानको सानन्द सिर चढ़ाते रहो।
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याद रखो—जिसका हृदय संकीर्ण है, जो दूसरेकी श्री, कीर्ति, सम्पत्ति, शान्ति और उन्नतिको देखकर सदा जलता रहा है, जो दूसरोंकी हानिमें आनन्दलाभ करता है, वह न तो कभी परमार्थ-पथपर अग्रसर हो सकता है और न कभी असली सुखका ही मुँह देख सकता है। अतएव हृदयके इन क्षुद्र और नीच विचारोंका त्याग करके हृदयको विशाल बनाओ। दूसरोंकी उन्नतिमें ही अपनी उन्नति, मंगलमें ही अपना मंगल और सम्पत्तिमें ही अपनी सम्पत्ति समझकर प्रसन्न होते रहो एवं सदा सच्चे हृदयसे यही चाहो कि संसारमें भी सभी जीव सच्ची श्री, कीर्ति, सम्पत्ति-उन्नति और सुख-शान्तिको प्राप्त करें।
याद रखो—जब कभी तुमपर विपत्ति आयी है तब विपद्हारी भगवान् सदा तुम्हारी रक्षाके लिये तुम्हारे पीछे खड़े होते हैं। तुम जो अपने सामने एक घना अन्धकार देखते हो, वह तो तुम्हारी अपनी ही छाया है। भगवान्के उस परम प्रकाशमय दिव्य स्वरूपको देखो, जो अपनी विशाल भुजा पसारे तुम्हें अपनी छातीसे चिपटाकर सदाके लिये सुखी करनेको तैयार खड़े हैं।
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याद रखो—विकाररूपा प्रकृतिमें स्थित सभी जीव भूलसे भरे हैं। किसीमें कम तो किसीमें अधिक, दोष सभीमें रहते हैं! तुम कितने ही भले क्यों न हो, सर्वथा निर्दोष नहीं हो। अत: किसी भी दूसरेका दोष मत देखो, दीख जाय तो उसकी निन्दा मत करो। देखो—तुम्हारे अंदर वैसे ही दोष हैं या नहीं। यदि हैं तो उनके लिये पश्चात्ताप करो और चेष्टा करो जिससे वे मिट जायँ। निश्चय समझो—दुनिया उसी रंगकी दीखती है, जिस रंगका चश्मा होता है। तुम निर्दोष हो जाओगे तो फिर तुम्हें कहीं दोष दीखेगा ही नहीं। ब्रह्मनिष्ठको सर्वत्र ब्रह्म ही दीखा करता है।