सारा जगत् भगवान्से भरा है
याद रखो—जगत्में जितने भी प्राणी हैं, सब तुम्हारे अपने आत्मा ही हैं, उनमें कोई भी पराया नहीं है, कोई भी दूसरा नहीं है। जैसे तुम्हारे एक ही शरीरके भिन्न-भिन्न अंग तुम्हारे शरीरके ही अवयव हैं, सबको लेकर ही शरीर है, इसी प्रकार सबको लेकर ही तुम हो।
याद रखो—तुम उन्हें अपना आत्मा न समझकर दूसरा समझते हो, इसीसे उनके सुख-दु:खसे उदासीन रहते हो। अपना समझते तो कभी ऐसा नहीं करते। क्या शरीरके किसी भी अंगमें चोट लगनेपर तुम यह मानते हो कि चोट किसी दूसरेको लगी है? क्या तुम्हें उसके लिये वेदनाका अनुभव नहीं होता? होता है। क्यों? इसीलिये कि तुम्हारा उन सबमें आत्मभाव है।
याद रखो—तुम सबके हितकी परवा न करके उन्हें कष्ट पहुँचाकर यदि केवल अपना भला चाहते हो, अपने लिये सुख चाहते हो तो न तो तुम्हारा कदापि भला होगा, न तुम्हें सुख ही मिलेगा। भला, अपने ही हाथों अपने अंगोंको काटकर क्या कोई कभी सुखी हो सकता है?
याद रखो—समाज, जाति, सम्प्रदाय आदि भेद केवल समाजकी व्यवस्थाका सुचारुरूपसे संचालन हो और प्रत्येक व्यक्ति अपने-अपने मार्गसे चलकर जीवनके परम लक्ष्य भगवान्को प्राप्त कर सकें इसके लिये है और यह आवश्यक तथा उचित भी है; परंतु इसका यह अर्थ कभी नहीं कि इस भेदसे आत्मामें कोई भेद आ जाता है। और एक-दूसरेके हितका नाश करके कोई सुखी हो सकता है।
याद रखो—जो व्यक्ति विश्वात्माके साथ अपनेको मिलाकर सारे विश्वके समस्त जीवोंको अपने ही रूपमें देखता है और सबके दु:ख-सुखको अपना ही दु:ख-सुख मानकर, जैसे अपने दु:खको दूर करनेकी और सुख प्राप्त करनेकी स्वाभाविक चेष्टा करता है, वैसे ही सबके लिये करने लगता है, उसका जीवन ही यथार्थ मनुष्य-जीवन है और वही जीवन धन्य है।
याद रखो—स्वार्थ जितना संकुचित होता है, उतना ही गंदा और हानिकर होता है। जैसे छोटे-से गड्ढेमें एकत्र हुआ जल सड़ जाता है और उसमें कीड़े पड़ जाते हैं। यदि तुम्हारा स्वार्थ अखिल जगत्के स्वार्थके साथ मिल जाय, विश्वके प्राणियोंका स्वार्थ ही तुम्हारा स्वार्थ हो तो फिर तुम्हारा वह स्वार्थ पवित्र और लाभदायक होगा। उससे स्वाभाविक ही विश्वात्मा भगवान्की पूजा होती रहेगी।
याद रखो—जो पुरुष यह अनुभव करता है कि यह सारा जगत् —जगत्के समस्त प्राणी मेरे भगवान्से ही निकले हैं और भगवान् ही सदा सबमें व्याप्त हैं, वह अपने प्रत्येक कर्मके द्वारा भगवान्को पूजकर जीवनको अनायास ही सफल कर सकता है। उसके लिये प्रत्येक जीव भगवान्का स्वरूप और उसका अपना प्रत्येक कर्म उस भगवान्की पूजा बन जाता है। और जिसके द्वारा निरन्तर भगवान्की पूजा ही होती है, उसको जीवनमें परम सिद्धि—भगवत्प्राप्ति हो जाय, इसमें सन्देह ही क्या है?
याद रखो—यदि तुम क्षुद्र सीमाको छोड़कर जाति, वर्ण, अधिकार, धन, देश आदिके भेदोंको आत्माके भेद न मानकर विश्वरूप भगवान्की पूजामें अपना जीवन लगा दोगे तो तुम्हें पद-पदपर और पल-पलमें भगवान्के दर्शन होंगे और तुम्हारा जीवन परम पवित्र तथा सबके लिये आदर्श बन जायगा।