सुख चाहते हो तो सुख दो

प्रतिध्वनि ध्वनिका ही अनुसरण करती है और ठीक उसीके अनुरूप होती है, इसी प्रकार दूसरोंसे हमें वही मिलता है और वैसा ही मिलता है, जो और जैसा हम उनको देते हैं। अवश्य ही वह मिलता है बीज-फल-न्यायके अनुसार कई गुना बढ़कर।

सुख चाहते हो, दूसरोंको सुख दो; मान चाहते हो, मान प्रदान करो; हित चाहते हो, हित करो और बुराई चाहते हो तो बुराई करो! याद रखो, जैसा बीज बोओगे वैसा ही फल मिलेगा। फलकी न्यूनाधिकता जमीनके अनुसार होगी।

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हिंसापरायण लोग अपनी हिंसाके फलसे स्वयं नष्ट हो जाते हैं। और जो साधु-स्वभावके लोग हैं, वे अपनी साधुताके परिणामस्वरूप समस्त पापोंसे छूट जाते हैं। हिंसा हिंसकको खा जाती है और साधुता पापकी प्रचण्ड अग्निसे साधुको बचा लेती है।

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हिंसासे साधुकी तुलना वैसे ही नहीं हो सकती, जैसे जहरसे अमृतकी। साधु पुरुष जैसे अपने स्वाभाविक आचरणोंसे जगत‍्में प्रेम, करुणा, क्षमा और एकात्मताका विस्तार किया करते हैं, वैसे ही हिंसक मनुष्य वैर, निर्दयता, क्रोध और अनात्मीयताका प्रसार करते हैं।

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हिंसकोंसे इस जगत‍्में दु:ख बढ़ता है और परलोक बिगड़ता है; दूसरी ओर साधुओंसे जगत‍्में सुख-शान्ति फैलती है और परलोक तो बनता ही है। साधुताका फल देरसे भले ही हो, पर होता है अमृतमय।

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मनुष्यको पापसे सदा सावधान रहना चाहिये। जरासे पापको भी सहन करना पापके विशाल वृक्षकी जड़ जमाना है। मनुष्य जब एक बार पापको स्वीकार करके उसमें फँस जाता है, तब फिर वह दिनोंदिन उसीमें लिपटता ही चला जाता है और आगे चलकर उसीके संगमें सुखका—यहाँतक कि कर्तव्यका अनुभव करने लगता है। उसके पापोंकी ऐसी एक दृढ़ और मोहक शृंखला बन जाती है जिसके बन्धनसे वह सहज ही कभी छूट नहीं सकता और उसके नये-नये रूपोंपर मोहित होता रहता है।

पाप करते समय अज्ञानवश सुखका बोध होता है। उस समय परिणाम सामने नहीं होता; परन्तु परम्परासे चली आयी हुई परिणामकी एक कल्पना मनमें होती है जो पापकर्मका सम्पादन करनेके बाद उसे धिक्‍कारती और डराती है; परंतु पाप करते-करते वह कल्पना भी मिट जाती है और पापमें ही गौरव-बुद्धि हो जाती है। फिर उसकी बुद्धि सहज ही पुण्यको पाप और पापको पुण्य देखती है। मनुष्यकी यह स्थिति बहुत ही निराशाजनक होती है।

इसलिये निरन्तर पापियोंके संगसे बचना और साधुओंके संगमें रचना-पचना चाहिये। बुद्धिके विपरीत निर्णयसे सम्भव है एक बार इसमें प्रत्यक्ष हानि दिखलायी दे; परंतु यह निश्चय है कि पापात्माओंके संगका परिणाम दु:ख और साधुओंके संगका परिणाम सुख अनिवार्य है। साधु-संगका महत्त्व समझनेके बाद बननेवाला साधु-संग तो इतना विलक्षण होता है कि उससे दु:ख-बीजका सर्वथा नाश और सातत्य-आत्यन्तिक सुखकी सहज प्राप्ति हो सकती है।