त्यागसे शान्ति

याद रखो—संसारके भोगोंमें सुख है ही नहीं, जो वस्तु जहाँ नहीं है, वह वहाँ कैसे मिलेगी। ढूँढ़ते रहो, दर-दर भटकते रहो, सिर पटकते रहो, सर्वत्र और सदा। अन्तमें निराशा, निर्वेद और व्यथाके ही थपेड़े लगेंगे। सुख, सच्चा और स्थायी सुख तो है—भगवान‍्में और उन भगवान‍्की प्राप्ति होती है त्यागसे।

याद रखो—जो पुरुष त्यागसे प्राप्त होनेवाले निर्मल सुखका अनुभव करता है, वह भोगोंकी ओर कभी आँख उठाकर देखता ही नहीं। हाँ, भोगोंके प्रचुर प्रलोभन भाँति-भाँतिसे सज-धजकर उसके सामने स्वयमेव आते हैं उसे अपनी ओर खींचनेके लिये, परंतु वह उन्हें उसी प्रकार ठुकरा देता है जैसे बहुमूल्य रत्नोंको पा जानेवाला मनुष्य रंग-बिरंगे काँच-पत्थरोंको।

याद रखो—त्यागीको अपनी संतोषमयी वृत्तिसे और त्यागभरी स्थितिसे जो सुख प्राप्त होता है, उसकी तुलनामें भोगोंके—धन, मान, यश, आराम, अधिकार आदिके सभी सुख सर्वथा तुच्छ और नगण्य हैं। सच्ची बात तो यह है कि भोग-सुख वस्तुत: सुख ही नहीं है। बुद्धिहीन मनुष्योंको भ्रमके कारण ही उसमें सुखकी प्रतीति होती है। असलमें तो उनसे दु:ख ही उत्पन्न होते हैं, इससे बुद्धिमान् लोग भोगोंमें अपने मनको नहीं फँसने देते—

ये हि संस्पर्शजा भोगा दु:खयोनय एव ते।

आद्यन्तवन्त: कौन्तेय न तेषु रमते बुध:॥

(गीता ५। २२)

याद रखो—जो वस्तु अनित्य, परिवर्तनशील और अपूर्ण है, उससे कभी सच्चा और स्थायी सुख मिल नहीं सकता। इसीलिये आज जो किसी भोग-सामग्रीसे, धनसे, मानसे, संतानसे, सत्तासे अपनेको सुखी मानता है, वही कल रोता-बिलपता देखा जाता है।

याद रखो—त्यागमें पहले-पहल कुछ कठिनाई-सी लगती है, कुछ कर्कशता-सी प्रतीत होती है, इसीसे मन उससे भागना चाहता है, परंतु गहराईसे विचार कर देखनेपर यह स्पष्ट हो जाता है कि जितनी कठिनाइयाँ, जितने क्लेश, जितनी कर्कशता और जितनी पीड़ा भोग-पदार्थोंकी प्राप्तिके साधनमें और प्राप्त होनेपर उनके संरक्षणमें हैं, उतनी त्यागमें कदापि नहीं हैं। वरं त्यागकी कठिनाई और भोगकी कठिनाईमें जातिगत बड़ा भेद है। त्यागकी कठिनाई सात्त्विक है और भोगकी कठिनाईमें राजसिकता तथा तामसिकता है। त्यागकी कठिनाईका परिणाम परम अमृतकी प्राप्ति है और भोगकी कठिनाईका परिणाम विषमयी ज्वाला है, जो लोक-परलोकके जीवनको जलाकर सर्वथा यातनापूर्ण और जर्जरित कर देती है।

याद रखो—भोग भ्रमाते हैं और त्याग स्वरूपमें स्थित कराता है। भोगोंसे कभी न पूरी होनेवाली भयानक इच्छा, कामना और वासनाएँ उत्पन्न होती हैं, जिनसे सदा दु:ख-ही-दु:ख मिलते हैं एवं त्यागसे वे सब-की-सब क्षीण होती हैं तथा खुराक न मिलनेसे—ईंधनके अभावमें आग बुझ जानेके समान—स्वयमेव बुझ जाती हैं, मर जाती हैं।

याद रखो—त्यागसे जीवनमें शान्ति मिलती है—‘त्यागाच्छान्तिरनन्तरम्’ और शान्तिसे मनुष्य परमानन्दस्वरूप परमात्माका साक्षात्कार करता है। भोगसे अशान्ति प्राप्त होती है और वह जीवको जबर्दस्ती नरकानलमें दग्ध होनेके लिये ले जाती है।

याद रखो—यदि तुम ‘भोगोंमें सुख है’ इस भ्रान्तिको त्यागकर भोगोंका मोह छोड़ दोगे तो शीघ्र ही सुखी हो जाओगे और तुम्हारा यह त्यागका सुखी जीवन तुम्हें भगवान‍्की ओर ले जायगा। एवं ऐसा करनेपर तुम्हें निश्चय ही भगवान‍्की प्राप्ति हो जायगी।