उन्नतिके चिह्न

साधनमें प्रेम होना, साधनमें जरा भी परिश्रम न प्रतीत होना, त्यागी महापुरुषोंके जीवनमें श्रद्धा होना और भगवान् पर विश्वास होना—ये साधककी उन्नतिके प्रधान चिह्न हैं। ऐसा साधक बहुत तेज चालसे आगे बढ़ता है।

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प्रभु-प्राप्तिके साधनको ही जीवनका मुख्य कार्य समझो। शरीरसे संसारमें रहो; परन्तु मनको तो निरन्तर प्रभुके चरणोंमें रखो।

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केवल पुस्तकें पढ़नेसे काम नहीं चलेगा, न बड़ी-बड़ी बातें बनानेसे ही कुछ हाथ लगेगा। तुम्हें खुद अपने मनको प्रभुमें लगानेकी साधना करनी पड़ेगी।

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भगवान‍्के स्मरण, चिन्तन और उनके गुणगानमें समय बिताना ही समयका सदुपयोग है।

याद रखो—जिसपर भगवान‍्के सिवा और किसी भी पुरुष, किसी भी परिस्थिति, किसी भी घटना और किसी भी कालका कोई प्रभाव नहीं पड़ता अर्थात् जो हर समय हर प्रकारसे भगवान‍्के ही शरण रहता है, वही महापुरुष है। तुम भी चेष्टा करो—सारे प्रभावोंसे छूटकर भगवान‍्के एकमात्र भगवान‍्के ही प्रभावमें रहनेकी।

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तुम्हारा परिचय केवल भगवान‍्से ही रहे और सबको भूल जाओ और तुम जो कुछ भी करो, सब केवल भगवान‍्की प्रसन्नताके लिये ही।

चाहो केवल भगवान‍्को ही। यह भी मत सोचो कि भगवान् सर्वज्ञ और सर्वशक्तिमान् हैं, वे मेरी आवश्यकताओंको आप ही पूर्ण कर देंगे। तुम्हारे मनमें भगवान‍्के सिवा न तो और कोई आवश्यकता ही रहे; और न किसी वस्तुकी चाह ही हो।

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भगवान‍्में ही विश्वास, भगवान‍्की ही आवश्यकता, भगवान‍्की ही चाह और भगवान् ही साधन—ये चार बातें जिस साधकमें होती हैं, वह बड़ा ही भाग्यवान् है। इससे भी बड़ा वह है, जो केवल भगवान‍्के प्रेममें ही मस्त रहता है। जिसे न चाह है, न आवश्यकता।

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भगवान‍्की प्रसन्नताके लिये ही कर्म करनेवाला पुरुष यह कभी नहीं सोचता कि लोग मेरे कार्यको सराहें, मेरी बड़ाई करें, मेरा सम्मान हो, मेरी जीवनी लिखी जाय या मेरा स्मारक बने। ये इच्छाएँ तो उसीमें रहती हैं, जो तुच्छ विषयोंका गुलाम है और भगवद्भक्तिका स्वाँग धरकर अपने-आपको धोखेमें डाल रहा है!

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जगत‍्के लोगोंके परिचयमें न आओ, न उनका परिचय प्राप्त करो। ऐसी चेष्टा करो जिसमें वे तुम्हें भूल जायँ और तुम उनको भूल जाओ, फिर केवल प्रभुका और तुम्हारा—दोका ही परस्पर परिचय रहे। चुपचाप तुम प्रभुकी सेवा करो और प्रभु उसे स्वीकार करें। जो दूसरोंको दिखानेके लिये सेवा करता है, उसकी सेवा भगवान् स्वीकार नहीं करते।

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जगत‍्को सुधारनेकी ठेकेदारी छोड़ दो, इसे प्रभु आप ही सुधारेंगे। तुम तो प्रभुके चरणोंपर न्योछावर हो जाओ। चुपचाप पड़े रहो दीन होकर उन दीनबन्धुके दरवाजेपर।

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जो मनुष्य जगत‍्के लोगोंमें बहुत परिचित होना तथा उनके साथ रहना चाहता है, याद रखो—वह प्रभुके परिचयसे अपनेको दूर करना चाहता है और प्रभुके संगको भी छोड़ना चाहता है। जितना ही जगत‍्में अधिक परिचय प्राप्त करोगे, उतना ही प्रभुके परिचयसे हटोगे।

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जो मनुष्य भोगोंके त्याग और भगवत्-प्रेमका बाना पहनकर भी लोगोंको अपना—अपने साधनका परिचय देना चाहता है, वह तो उस कुलटा स्त्रीके समान है जो किसी सुयोग्य पतिकी धर्मपत्नी होकर भी दूसरे लोगोंको रिझानेके लिये उन्हें अपना रूप और शृंगार दिखाती फिरती है!