विचारोंका नियन्त्रण

याद रखो—मनुष्यके जैसे विचार होते हैं, यथार्थमें वैसा ही उसका स्वरूप होता है। बाहरसे कोई मनुष्य कितनी ही ऊँची ज्ञानकी, भक्तिकी या वैराग्यकी बातें क्यों न करे, जबतक उसके भीतरी विचार वैसे नहीं हैं, तबतक उसमें न वस्तुत: ज्ञान है, न भक्ति है और न वैराग्य ही है।

याद रखो—विचारोंका परिवर्तन केवल कथनमात्रसे नहीं हो जाता। उसके लिये दीर्घकालतक निरन्तर श्रद्धापूर्वक अभ्यास करनेकी आवश्यकता होती है। तुम्हारे अन्दर जो-जो बुरे विचार हों, उन-उनके विरोधी अच्छे विचारोंका बार-बार मनन करो। विषयोंकी आसक्ति दूर करनेके लिये उनमें दु:ख-दोषादि देखकर वैराग्यका अभ्यास करो; स्त्री या पुरुषके रूप-सौन्दर्यके मोहका तथा कामवासनाका नाश करनेके लिये शरीरके अंदर भरे हुए गंदे पदार्थ—रक्त, मांस, मेद, मज्जा, हड्डी, विष्ठा, मूत्र और कफ आदिका विचार करो, सड़े मुर्देका चित्र मनके सामने रखो; दूसरेके दोषोंका चिन्तन दूर करनेके लिये दूसरोंके गुणोंको खोज-खोजकर देखो और अपने दोषोंपर दृष्टिपात करो, क्रोधका नाश करनेके लिये क्षमाका उपयोग करो, लोभको हटानेके लिये लोभी मनुष्योंको विपत्तिमें फँसकर परिणाममें जो भयानक दु:ख भोगने पड़ते हैं, उनपर विचार करो, शोक-विषादके नाशके लिये भगवान‍्के मंगलमय विधानपर विश्वास करो और पाप-वासनाओंके नाशके लिये नरकोंकी भीषण यन्त्रणाओंका स्मरण करो।

याद रखो—मनके प्रधान पाँच दोष हैं—विषाद, क्रूरता, व्यर्थ-चिन्तन, निरंकुशता और गंदे विचार। विरोधी विशुद्ध विचारोंके द्वारा इनका नाश करो। प्रसन्नता, सौम्यत्व, मानसिक मौन, मनोनिग्रह और शुद्ध भावोंका परिशीलन इनके विरोधी विचार हैं। भगवान‍्के मंगलमय विधानसे जो कुछ फलरूपमें प्राप्त होता है, सब मंगलमय ही है, चाहे देखनेमें भयानक ही हो, ऐसा विश्वास हो जानेपर प्रत्येक स्थितिमें प्रसन्नता रहेगी। तुम्हारे साथ कोई क्रूरताका बर्ताव करे, तो तुम्हें कितना बुरा लगता है और शान्त-सौम्य व्यवहारसे कितना सुख होता है, इसी प्रकार तुम्हारी क्रूरता लोगोंको बुरी लगती है और तुम्हारी सौम्यतासे उनको सुख होता है। इस प्रकारके विचारसे सौम्यता आयेगी। दिन-रात संसारके अनुकूल-प्रतिकूल विषयोंका चिन्तन करते रहनेसे चित्तमें कभी शान्ति नहीं होती, अतएव इसके बदलेमें प्रभुके मंगलमय नाम, गुण, लीला, तत्त्व, रहस्य आदिका चिन्तन-मनन सदा-सर्वदा करते रहनेसे विषयोंके लिये मन मौन हो जायगा। जबतक मन वशमें नहीं है तबतक वह जहाँ-तहाँ भटकता और अशुद्ध संकल्प-विकल्पोंमें पड़कर नये-नये दु:खोंकी सृष्टि करता रहता है, मन वास्तवमें तुम्हारा (आत्माका) सेवक है, स्वामी नहीं, इस बातको अच्छी तरह समझकर मनको वशमें कर लोगे तो वह तुम्हारे नियन्त्रणमें आकर प्रत्येक शुभ प्रयत्नमें तुम्हारा सहायक बन जायगा। और मनमें जो काम, क्रोध, लोभ, मद, मोह, हिंसा, असत्य, स्तेय और मान आदिके अशुभ भाव भरे हैं, इनके कारण इनके अनुकूल ऐसी ही क्रिया बनती है और जीवन अशुभका मूर्तिमान् रूप बन जाता है, इन दुर्भावोंकी जगह ब्रह्मचर्य, क्षमा, संतोष, विवेक, विनय, अहिंसा, सत्य, अस्तेय, अमानिता आदिके स्वरूप, गुण और लाभोंका चिन्तन किया जाय तो चित्त शुद्ध भावोंसे भर जायगा। इस प्रकार जब चित्तमें ये पाँचों बातें भलीभाँति आ जायँगी, तब तुम्हारा मानसतप सिद्ध हो जायगा। फिर तुम्हारा बाहरी व्यवहार भी वैसा ही विशुद्ध होगा।

याद रखो—विचारोंके नियन्त्रणके लिये सबसे बढ़कर उपयोगी साधन है—आत्मशक्तिपर या सर्वशक्तिमान् परम सुहृद् भगवान‍्की कृपापर दृढ़ विश्वास। यह विश्वास जितना ही बढ़ेगा, उतना ही शीघ्र और सरलतासे मनुष्य अपने मनोगत अशुभ विचारोंके नाश और शुभ विचारोंके विस्तारमें समर्थ होगा। आत्मा और भगवान् पर विश्वास करनेवाले पुरुषके मनसे देहाभिमान, स्थूल अहंकार, भौतिक बलका आश्रय आदि दूषित और गिरानेवाले भाव नष्ट हो जाते हैं।