विषय-चिन्तन ही पतनका कारण है
तुम्हारे पतन और विनाशका कारण है—विषय-चिन्तन और उत्थान तथा अमरपदकी प्राप्तिका कारण है—भगवच्चिन्तन। जबतक मन केवल विषयोंका ही स्मरण करता है, तबतक पाप-तापसे कभी छुटकारा नहीं मिल सकता। तुम यदि असलमें पाप-तापसे छूटकर अपने जीवनको पुण्यमय, शान्तिमय, ऊँची स्थितिके भगवद्भावसे युक्त बनाना चाहते हो तो भगवान्का स्मरण करो।
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याद रखो—जो मन भगवान्के स्मरणसे भरा है—उस मनसे किसी भी कर्मके लिये जो प्रेरणा होती है, वह विशुद्ध होती है और उसके अनुसार होनेवाला कर्म, चाहे देखनेमें बहुत ऊँचा न भी मालूम हो तो भी वह होता है परम पवित्र और भगवान्की पूजा-स्वरूप! युद्ध-जैसा कर्म भी भगवत्प्राप्तिमें हेतु होता है, यदि वह भगवान्के स्मरणसे युक्त हो। इसीसे तो भगवान्ने अर्जुनसे कहा है—‘तुम सदा-सर्वदा मेरा स्मरण करते हुए युद्ध करो।’
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भगवान्का स्मरण होते-होते जब भगवान्में ऐसा आकर्षण हो जायगा जैसा विषयोंमें विषयी पुरुषका और कामिनियोंमें कामियोंका होता है, तब स्मरण अपने-आप ही होगा और तभी उस स्मरणमें आनन्दका अनुभव होगा। जबतक वैसा नहीं होता, तबतक भगवान्के गुण, प्रभाव, लीला, नाम आदिको सुन-सुनकर उनमें मन लगाते रहो।
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याद रखो—अभी तुम्हारी चित्तवृत्ति व्यभिचारिणी हो रही है; क्योंकि उसने भोगोंको ही आनन्द देनेवाला मान रखा है और रात-दिन वह उन्हींके साथ रमण कर रही है। भगवान्को छोड़कर, जो भोगोंके प्रति आकर्षण है, यही तो मनका व्यभिचार है। इसीसे तो वह भगवान्के प्रति खिंचता नहीं है। मन भगवान्की ओर जाय इसके लिये लगातार चेष्टा करते रहो। भगवान्के गुण सुनो, उनके नामोंका कीर्तन करो, सब कामोंमें भगवान्का हाथ देखो, उनकी मंगलमयी मूर्तिका ध्यान करो, उनके भक्तोंका संग करो और उनके माहात्म्यको प्रकट करनेवाले ग्रन्थोंको बार-बार पढ़ो!
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अपने मनको देखते रहो, वह कितनी देर भोगोंका चिन्तन करता है और कितनी देर भगवान् का? सावधान! मन बड़ा धोखा देगा। तुम समझोगे, हमने उसे भगवान्के चिन्तनमें लगा रखा है और वह छिपकर ऐसा भागेगा तथा इस प्रकार भोगोंमें रम जायगा कि तुम्हें पता भी नहीं लगेगा। बार-बार देखते रहो। जितना ही अधिक मनकी ओर देखोगे, उतना ही वह जल्दी वशमें होगा। ज्यों-ज्यों वह भागे त्यों-ही-त्यों उसे खींच-खींचकर भगवान्में लगाओ। उसके सामने भगवान्के सौन्दर्य, माधुर्य, ऐश्वर्य, आनन्द, शान्ति और कल्याणमय मंगलस्वरूपको बार-बार रखो। बार-बार उसे लुभानेकी चेष्टा करो—भगवान्के मनोहररूपसे। सचमुच विषय तो भयंकर हैं, ऊपरसे ही सुन्दर लगते हैं। अज्ञान शत्रुने उनको विष मिले हुए लड्डूकी तरह सुन्दर और स्वादिष्ट बना रखा है; परन्तु भगवान् तो नित्य सुन्दर और नित्य मधुर हैं। मन एक बार उनकी झाँकी कर लेगा, उनकी सौन्दर्य-सुधाका स्वाद चख लेगा तो फिर वहाँसे सहजमें हटेगा नहीं। जिस दिन भगवान् माशूक बन जायँगे तुम्हारे मन आशिकके—उस दिन सब कुछ आप ही ठीक हो जायगा। चेष्टा करो और भगवान्की कृपापर विश्वास करके अपनेको बार-बार उनके स्वरूप-समुद्रमें डुबा देनेका प्रयत्न करो। भगवत्कृपासे तुम सफल होओगे।