योगक्षेमका भार भगवान् पर

विश्वास करो—भगवान् शक्ति और ज्ञानके भण्डार हैं। वे तुम्हारे परम सुहृद् हैं, परम प्रेमी हैं। वे सदा-सर्वदा तुम्हारा कल्याण करनेको प्रस्तुत हैं। जिस क्षण तुम्हारा भगवान‍्में सच्चा विश्वास हो जायगा, उसी क्षण तुम्हारी दुर्बलता दूर हो जायगी, तुम्हारा भय भाग जायगा और सारी प्रतिकूलताएँ तुम्हारे मनके अनुकूल हो जायँगी।

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विश्वास करो—भगवान‍्के न्याय और सत्यमें विश्वास होते ही हृदयमें कोई डर नहीं रह जायगा। यह अनुभव होगा कि मैं सदा-सर्वदा उस अचिन्त्य महाशक्तिकी छत्रछायामें हूँ। भगवान‍्की कल्याणमयी, मंगलमयी ज्ञानपीयूष-धारासे हृदय सिक्त हो जायगा। इतना सात्त्विक उत्साह उमड़ेगा कि फिर भगवान‍्की सेवाके बिना एक क्षण भी रहा नहीं जायगा।

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विश्वास करो—भगवान‍्की सुहृदतामें विश्वास होते ही जीवन पलट जायगा। अशान्ति सदाके लिये शान्त हो जायगी। स्वार्थपरता निष्काम-सेवामें बदल जायगी। असहिष्णुता सहिष्णुता, धीरता, उदारता और वदान्यता बन जायगी। गर्व-अभिमान, विनय-विनम्रताके रूपमें, असद्भावना सद्भावनाके रूपमें, दोषदर्शन और तीव्र निन्दा गुणदर्शन और प्रशंसाके रूपमें तथा द्वेष प्रेमके रूपमें परिणत हो जायगा। जगत‍्में सर्वत्र निजजन, आत्मीयजन और अपने बन्धु-ही-बन्धु दिखायी देंगे।

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विश्वास करो—भगवान‍्की सुहृदता और अहैतुकी प्रीतिमें विश्वास होते ही उनसे माँगना-जाँचना बंद हो जायगा। फिर यह नहीं कहा जायगा कि ‘भगवान्! हमारा अमुक अभीष्ट पूर्ण कर दो और हमें अमुक समय अमुक साधनमें सफलता प्रदान कर दो। फिर तो भगवान‍्के प्रत्येक विधानमें कल्याणके दर्शन होंगे।’

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विश्वास करो—जो लोग भगवान‍्से कोई निर्दिष्ट कार्य करवाना चाहते हैं और उन्हें उसका साधन बतलाते हैं, उनका वस्तुत: भगवान‍्में सच्चा विश्वास ही नहीं है। वह तो विश्वासाभास है। सच्चा विश्वास होनेपर तो भगवान् उनसे जो कराते हैं, जैसे कराते हैं और जो कुछ फल प्रदान करते हैं, वे उसीमें संतुष्ट रहते हैं। विश्वासी पुरुष भगवान‍्के स्वयं निर्दिष्ट पथमें कामना, स्वार्थ या अहंकारवश अपना मत बताकर बाधा डालनेकी मूर्खता नहीं करते। बल्कि प्रतिकूल दीखनेपर भी वे भगवान‍्के निर्दिष्ट पथपर ही प्रसन्नतासे चलते हैं और भगवान‍्के दिये हुए प्रत्येक दानको परम मंगलमय जानकर सिर चढ़ाते हैं।

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विश्वास करो—तुम्हारा यथार्थ मंगल किस बातमें और क्या है; कब, किस प्रकारसे और किस सूत्रसे तुम्हें उस मंगलकी शीघ्र प्राप्ति हो सकती है एवं शीघ्र प्राप्त होनेमें तुम्हारा कल्याण है या देरसे प्राप्त होनेमें—इन सब बातोंको पूर्णरूपसे तथा सत्यरूपसे भगवान् ही जानते हैं। तुम तो बहुत बार अमंगलको मंगल मान बैठते हो और ऐसे समय, ऐसे प्रकारसे और ऐसे सूत्रसे उस मंगलको प्राप्त करना चाहते हो कि जिसमें मंगल हो ही नहीं सकता। तुम्हारी मोहाच्छन्न दृष्टि यथार्थको देख ही नहीं पाती। छोटा शिशु जैसे अज्ञानवश सुन्दर समझकर अग्नि और सर्पको पकड़नेके लिये लपकता है, वैसे ही मोहाच्छन्न मनुष्य अनर्थकारी विषयोंकी ओर दौड़ता है। पर जो पुरुष विश्वासपूर्वक, छोटे शिशुके मातृपरायण होनेकी भाँति भगवान‍्के चरणोंमें आत्मसमर्पण कर चुकते हैं—अपने योगक्षेमका सारा भार भगवान‍्को सौंप चुकते हैं, उनके लिये क्या मंगलमय है और वह कब कैसे चाहिये, इस बातका निर्णय भी भगवान् ही करते हैं और भगवान् स्वयं ही ठीक समयपर उन्हें वह मंगलमयी वस्तु प्रदान करते हैं।