भगवान्से अपनापन
वास्तवमें हम सब परमात्माके हैं और यह संसार भी परमात्माका है; परन्तु जब हम इसपर कब्जा करना चाहते हैं, इसको अपना मान लेते हैं, तब हम इससे बँध जाते हैं। हमारी यह एक धारणा रहती है कि हमारे अधिकारमें जितनी वस्तुएँ और व्यक्ति आ जायँगे, उतने हम बड़े बन जायँगे, उन वस्तुओं और व्यक्तियोंके मालिक बन जायँगे; परन्तु यह धारणा बिलकुल गलत है।
जिन रुपये, परिवार आदिको हम अपना मान लेते हैं, उनके हम पराधीन हो जाते हैं, परवश हो जाते हैं। वहम तो यह होता है कि हम उनके मालिक बन गये, पर बन जाते हैं उनके गुलाम। यह बात खूब समझनेकी है, केवल सुनने-सुनानेकी नहीं है। आप स्वयं विचार करें। जिन मकानोंको आप अपने मकान मानते हैं, उन मकानोंकी ही आपको चिन्ता होती है। जिन मकानोंको आप अपना नहीं मानते, उनकी चिन्ता आपको नहीं होती। जिस परिवारको आप अपना मानते हैं, उसके बनने-बिगड़नेका आपपर असर होता है; और जिसको आप अपना नहीं मानते, उसके बनने-बिगड़नेका आपपर असर नहीं होता। ऐसे ही रुपये-पैसे, जमीन-जायदाद आदि वस्तुओंको आप अपनी मान लेते हैं, उनकी जिम्मेवारी, उनकी चिन्ता, उनके संचालन आदिका भार आपपर आ जाता है। जिनको आप अपना नहीं मानते, उनसे आपका बन्धन नहीं होता। इस युक्तिपर आप विचार करें।
संसारमें जो थोड़े-से मकान हैं, थोड़े-से व्यक्ति हैं, थोड़े-से रुपये (हजार, लाख, करोड़) हैं, उन मकानों, व्यक्तियों और रुपयोंमें ही आप बँधे हुए हैं। जिनको आप अपना नहीं मानते, उन मकानों, व्यक्तियों और रुपयोंसे आप बिलकुल मुक्त हैं। अत: संसारसे आपकी ज्यादा मुक्ति तो है ही, थोड़ी-सी मुक्ति बाकी है! मुक्ति नाम है छूटनेका। जिन रुपयों आदिको आप अपना नहीं मानते, उनसे आप बिलकुल छूटे हुए हैं। जिनमें आपकी ममता नहीं है, उनके हानि-लाभ आदिका आपपर असर नहीं पड़ता अर्थात् उनमें आप सम रहते हैं। वह चाहे सोना हो, चाहे मिट्टी या पत्थर हो, उसके आने-जानेका आपपर कोई असर नहीं पड़ता— ‘समलोष्टाश्मकांचन:’ (गीता ६। ८)। इसी प्रकार मान-अपमान और मित्र-शत्रुके पक्षमें भी आपकी समता रहती है, उनका असर आपपर नहीं पड़ता—‘मानापमानयोस्तुल्यस्तुल्यो मित्रारिपक्षयो:’ (गीता १४। २५)।
वास्तवमें समता ही तत्त्व है। गीतामें कहा है—‘इहैव तैर्जित: सर्गो येषां साम्ये स्थितं मन:।’ (गीता ५। १९) अर्थात् जिनका मन समतामें स्थित है, उन्होंने इस जीवित-अवस्थामें ही सम्पूर्ण संसारको जीत लिया है। तात्पर्य है कि जिनके हृदयमें समता है, उनके हृदयमें वस्तुओंके बनने-बिगड़नेपर, आने-जानेपर कोई विषमता नहीं होती, पक्षपात नहीं होता, राग-द्वेष नहीं होते, हर्ष-शोक नहीं होते। वस्तुओं और व्यक्तियोंके आने-जानेसे हमारेपर किंचिन्मात्र भी असर नहीं पड़े, तब तो हम संसारपर विजयी हो गये; परन्तु उनके आने-जानेका असर पड़ता है तो हम संसारसे पराजित हो गये, हार गये। संसार विजयी हो गया हमपर। हार किसीको भी अच्छी नहीं लगती, जीत सबको अच्छी लगती है। जिनका मन समतामें स्थित है, वे आज और अभी जीत सकते हैं, विजयी हो सकते हैं। यह एकदम सिद्धान्तकी और बिलकुल सच्ची बात है। गीता कहती है—‘निर्दोषं हि समं ब्रह्म तस्माद्ब्रह्मणि ते स्थिता:॥’ (५।१९) अर्थात् जिनके लिये सच्चिदानन्दघन परमात्मा निर्दोष और सम हो गया, वे परमात्मामें ही स्थित हैं। कितनी विलक्षण बात है!
परमात्मतत्त्वको प्राप्त करना मनुष्यका खास ध्येय है। प्रत्येक भाई और बहन सब अवस्थाओंमें उस तत्त्वको प्राप्त कर सकते हैं; क्योंकि उस तत्त्वकी प्राप्तिके लिये ही यह मनुष्यशरीर मिला है। परन्तु हम नाशवान् चीजोंको अपनी मानकर फँस जाते हैं, बँध जाते हैं और अपने लक्ष्यसे वंचित हो जाते हैं। ये चीजें पहले भी अपनी नहीं थीं और पीछे भी अपनी नहीं रहेंगी—यह पक्की बात है। बीचमें उनको अपनी मानकर हम फँस जाते हैं। अगर हम उन चीजोंको अपनी न मानें, प्रत्युत उनको भगवान्की ही मानकर अच्छे-से-अच्छे, उत्तम-से-उत्तम व्यवहारमें लायें तो हम बन्धनमें नहीं पड़ेंगे। उन वस्तुओंमें हमारा अपनापन जितना-जितना छूटता चला जायगा, उतनी-उतनी हमारी मुक्ति होती चली जायगी।
प्रभुके साथ हमारा अपनापन सदासे है और सदा रहेगा। केवल हम ही भगवान्से विमुख हुए हैं, भगवान् हमसे विमुख नहीं हुए। हम भगवान्के हैं और भगवान् हमारे हैं—
अस अभिमान जाइ जनि भोरे।
मैं सेवक रघुपति पति मोरे॥
(मानस, अरण्य० ११।२१)
मीराबाई इतनी ऊँची हुई, इसका कारण उसका यह भाव था कि ‘मेरे तो गिरधर गोपाल, दूसरो न कोई।’ केवल एक भगवान् ही मेरे हैं, दूसरा कोई मेरा नहीं है।
सज्जनो! हम भगवान्के हो जाते हैं तो भगवान्की सृष्टिके साथ उत्तम-से-उत्तम बर्ताव करना हमारे लिये आवश्यक हो जाता है। यह सब सृष्टि प्रभुकी है, ये सभी हमारे मालिकके हैं—ऐसा भाव रखोगे तो उनके साथ हमारा बर्ताव बड़ा अच्छा होगा। त्यागका, उनके हितका, सेवाका बर्ताव होगा। इससे व्यवहार तो शुद्ध होगा ही, हमारा परमार्थ भी सिद्ध हो जायगा, हम संसारसे मुक्त हो जायँगे। अत: हम भगवान्के होकर भगवान्का काम करें। ये सब प्राणी भगवान्के हैं, इन सबकी सेवा करें। अपना यह भाव बना लें—
सर्वे भवन्तु सुखिन: सर्वे सन्तु निरामया:।
सर्वे भद्राणि पश्यन्तु मा कश्चिद् दु:खभाग्भवेत्॥
सब-के-सब सुखी हो जायँ, सब-के-सब नीरोग हो जायँ, सबके जीवनमें मंगल-ही-मंगल हो, कभी किसीको दु:ख न हो— ऐसा भाव हमारेमें हो जायगा तो दुनियामात्र सुखी होगी कि नहीं, इसका पता नहीं; परन्तु हम सुखी हो जायँगे, इसमें सन्देह नहीं।
आप थोड़ी कृपा करें, इस बातको ध्यानपूर्वक समझें। भक्तिमार्गमें तो केवल भाव बदलना है कि मैं भगवान्का हूँ और भगवान् मेरे हैं; संसार मेरा नहीं है और मैं संसारका नहीं हूँ। गीतामें आया है—‘अनन्याश्चिन्तयन्तो माम्’ (९।२२), ‘अनन्यचेता: सततं यो मां स्मरति नित्यश:’ (८।१४)। अनन्य होकर भगवान्का चिन्तन करनेका तात्पर्य यह है कि मैं केवल भगवान्का हूँ और केवल भगवान् मेरे हैं। ऐसा करनेवालेके लिये भगवान् कहते हैं—‘तस्याहं सुलभ:’ अर्थात् जो अनन्यचेता होकर मेरा स्मरण करता है, उसको मैं सुलभतासे मिल जाता हूँ।
सज्जनो! जो व्यापार करना चाहता है, उसको यदि कोई बढ़िया बता दे तो वह उसे छोड़ेगा नहीं; क्योंकि उसमें लाभ बहुत होता है। ऐसे ही जो अपनी आध्यात्मिक उन्नति चाहता है, उसके लिये बड़ी श्रेष्ठ और सीधी-सादी बात यह है कि वह मैं भगवान्का हूँ, भगवान् मेरे हैं, यह मान ले। यह मान्यता अगर दृढ़ हो जाय तो आज ही पूर्णता हो सकती है। अगर इस मान्यताको मिटाओगे नहीं तो समय पाकर स्वत: ही पूर्णता हो जायगी। अत: इतनी कृपा करें, मेहरबानी करें कि ‘मैं भगवान्का हूँ और भगवान् मेरे हैं’—यह बात पक्की मान लें। सच्ची बात है, आपको धोखा नहीं देता हूँ। पहले आप भगवान्के थे, अन्तमें भगवान्के ही रहेंगे और अब भी भगवान्के ही हैं। आप मानें या न मानें, पर आप भगवान्के ही हैं—इसमें संदेह नहीं।
‘सब मम प्रिय सब मम उपजाए’
(मानस, उत्तर० ८६। ४)
‘ईस्वर अंस जीव अबिनासी’
(मानस, उत्तर० ११७। २)
‘ममैवांशो जीवलोके’
(गीता १५। ७)
—इस प्रकार भगवान् और सन्त सब कहते हैं कि यह जीव परमात्माका अंश है यद्यपि हम परमात्माके हैं ही, तथापि ‘हम परमात्माके हैं’ ऐसा जबतक नहीं मानेंगे, तबतक परमात्माके होते हुए भी लाभ नहीं ले सकेंगे। जबतक हम परमात्मासे विमुख रहेंगे, तबतक हमें शान्ति, प्रसन्नता नहीं मिलेगी, आनन्द नहीं मिलेगा।
सनमुख होइ जीव मोहि जबहीं।
जन्म कोटि अघ नासहिं तबहीं॥
(मानस, सुन्दर० ४४। २)
भगवान्के सम्मुख होते ही करोड़ों जन्मोंके पाप नष्ट हो जायँगे। अत: सज्जनो! आप कृपा करके यह बात मान लो कि हम भगवान्के हैं, हम और किसीके नहीं हैं। यहाँ शंका हो सकती है कि हम और किसीके नहीं होंगे तो दुनियाका पालन-पोषण कैसे होगा? माताएँ अपने बालकोंका पालन-पोषण कैसे करेंगी? इसका समाधान है कि अपना मानकर पालन करनेकी महिमा नहीं है। अपने बालकका पालन तो हरेक माता करती है, पर इसमें कोई बहादुरी नहीं है। दूसरा कोई ऐसा बालक है, जिससे हमारा न्याति-जातिका कोई सम्बन्ध नहीं है, जिस बेचारेके माँ-बाप नहीं रहे, उसका पालन करनेवाली माईके लिये लोग कहते हैं कि धन्य है यह! अपना नहीं होनेपर भी अपने बालककी तरह उसका पालन किया जाय तो महिमा होगी और शान्ति मिलेगी तथा बालकपर भी बड़ा असर पड़ेगा।
‘कल्याण’ के एक मासिक अंकमें बहुत पहले एक घटना छपी थी। एक गाँवकी बात है। वहाँ एक मुसलमानके घर बालक हुआ, पर बालककी माँ मर गयी। वह बेचारा बड़ा दु:खी हुआ। एक तो स्त्रीके मरनेका दु:ख और दूसरा नन्हें-से बालकका पालन कैसे करूँ—इसका दु:ख! पासमें ही एक अहीर रहता था। उसका भी दो-चार दिनका ही बालक था। उसकी स्त्रीको पता लगा तो उसने अपने पतिसे कहा कि उस बालकको ले आओ, मैं पालन करूँगी। अहीर उस मुसलमानके बालकको ले आया। अहीरकी स्त्रीने दोनों बालकोंका पालन किया। उनको अपना दूध पिलाती, स्नेहसे रखती, प्यार करती। उसके मनमें द्वैधीभाव नहीं था कि यह मेरा बालक है और यह दूसरेका बालक है। जब वह बालक बड़ा हो गया, कुछ पढ़नेलायक हो गया, तो उसने उस मुसलमानको बुलाकर कहा कि अब तुम अपने बच्चेको ले जाओ और पढ़ाओ-लिखाओ, जैसी मर्जी आये, वैसा करो। वह उस बालकको ले गया और उसको पढ़ाया-लिखाया। पढ़-लिखकर वह एक अस्पतालमें कम्पाउण्डर बन गया। उधर संयोगवश अहीरकी स्त्रीकी छाती कुछ कमजोर हो गयी और उसके भीतर घाव हो गया। इलाज करवानेके लिये वे अस्पतालमें डॉक्टरके पास पहुँचे। डॉक्टरने बीमारी देखकर कहा इसको खून चढ़ाया जाय तो यह ठीक हो जायगी। खून कौन दे? परीक्षा की गयी। मुसलमानका वह लड़का, जो कम्पाउण्डर बना हुआ था, उसी अस्पतालमें था। दैवयोगसे उसका खून मिल गया। उस माईने तो उसको पहचाना नहीं, पर उस लड़केने उसको पहचान लिया कि यही मेरा पालन करनेवाली माँ है। बचपनमें उसका दूध पीकर पला था, इस कारण खूनमें एकता आ गयी थी। डॉक्टरने कहा, इसका खून चढ़ाया जा सकता है। उससे पूछा गया कि क्या तुम खून दे सकते हो? उसने कहा कि खून तो मैं दे दूँगा, पर दो सौ रुपये लूँगा। अहीरने उसको दो सौ रुपये दे दिये। उसने आवश्यकतानुसार अपना खून दे दिया। वह खून उस माईको चढ़ा दिया गया, जिससे उसका शरीर ठीक हो गया और वह अपने घर चली गयी।
कुछ दिनोंके बाद वह लड़का अहीरके घर गया और हजार-दो हजार रुपये माँके चरणोंमें भेंट करके बोला कि आप मेरी माँ हैं। मैं आपका ही बच्चा हूँ। आपने ही मेरा पालन किया है। ये रुपये आप ले लें। उसने लेनेसे मना किया तो कहा कि ये आपको लेने ही पड़ेंगे। उसने अस्पतालकी बात याद दिलायी कि खूनके दो सौ रुपये मैंने इसलिये लिये थे कि मुफ्तमें आप खून नहीं लेतीं और खून न लेनेसे आपका बचाव नहीं होता। यह खून तो वास्तवमें आपका ही है। आपके दूधसे ही मैं पला हूँ, इसलिये मेरा यह शरीर और सब कुछ आपका ही है। मेरे रुपये शुद्ध कमाईके हैं। आपकी कृपासे मैं लहसुन और प्याज भी नहीं खाता हूँ। अपवित्र, गन्दी चीजोंमें मेरी अरुचि हो गयी है। अत: ये रुपये आपको लेने ही पड़ेंगे। ऐसा कहकर उसने रुपये दे दिये। अहीरकी स्त्री बड़े शुद्ध भाववाली थी, जिससे उसके दूधका असर ऐसा हुआ कि वह लड़का मुसलमान होते हुए भी अपवित्र चीज नहीं खाता था।
आप विचार करें। जितनी माताएँ हैं, सब अपने-अपने बच्चोंका पालन करती ही हैं। हम सबका पालन बहनों-माताओंने ही किया है। परन्तु उनकी कोई कथा नहीं सुनाता, कोई बात नहीं करता। अहीरकी स्त्रीकी बात आप और हम करते हैं। उसका हमपर असर पड़ता है कि कितनी विशेष दया थी उसके हृदयमें! उसके मनमें यह भेद-भाव नहीं था कि दूसरेके बच्चेका मैं कैसे पालन करूँ? इसलिये आज हमलोग उसका गुण गाते हैं कि कितनी श्रेष्ठ माँ थी, जिसने दूसरे बालकका भी पालन किया और पालन करके उसके पिताको सौंप दिया! अपने बच्चोंका पालन तो कुतिया भी करती है, इसमें क्या बड़ी बात है?
चाहे तो अपने बालकोंको अपना न मानकर (ठाकुरजीका मानकर) पालन करो और चाहे जो अपने बालक नहीं हैं, उनका पालन करो तो बड़ा पुण्य होगा। परन्तु ममता करनेसे यह पुण्य खत्म हो जाता है। मैं अपने बच्चोंका पालन करूँ, अपने जनोंकी रक्षा करूँ—यह अपनापन ही आपके पुण्यका भक्षण कर जाता है। इसलिये सज्जनो! आप कृपा करके अपने कुटुम्बको भगवान्का मानें। छोटे-बड़े जितने हैं, सब प्रभुके हैं। उनकी सेवा करें और प्रभुसे कहें कि हे नाथ! हम आपके ही जनोंकी सेवा करते हैं यदि आप ऐसा करने लग जायँ तो भगवान् पर इसका अहसान हो जाय। भगवान् भी कहेंगे कि हाँ भाई, मेरे बालकोंका पालन किया। आप ममता करेंगे तो भगवान् पर कोई अहसान नहीं। अपने बच्चोंका पालन तो सब करते हैं। केवल यह भाव रखें कि ये हमारे नहीं हैं ये ठाकुरजीके हैं। जीवन सफल हो जायगा सज्जनो!
गीतामें कर्मयोग, ज्ञानयोग और भक्तियोग—इन तीनोंमें ही ममता और अहंताके त्यागकी बात आयी है—
(१) निर्ममो निरहंकार: स शान्तिमधिगच्छति॥
(२। ७१)
(२) अहंकारं बलं दर्पं कामं क्रोधं परिग्रहम्।
विमुच्य निर्मम: शान्तो ब्रह्मभूयाय कल्पते॥
(१८। ५३)
(३) निर्ममो निरहंकार: समदु:खसुख: क्षमी॥
(१२। १३)
ये मेरे नहीं हैं, संसारके हैं—इस प्रकार संसारके माननेसे ‘कर्मयोग’ हो जायगा। ये मेरे नहीं हैं, प्रकृतिमात्रके हैं—इस प्रकार प्रकृतिके माननेसे ‘ज्ञानयोग’ हो जायगा। ये मेरे नहीं हैं, ठाकुरजीके हैं—इस प्रकार भगवान्के माननेसे ‘भक्तियोग’ हो जायगा। ये मेरे हैं—इस प्रकार अपना माननेसे ‘जन्म-मरणयोग’ हो जायगा अर्थात् जन्मो, फिर मरो, मरकर फिर जन्म लो—इस तरह जन्म-मरणके साथ सम्बन्ध हो जायगा। आपकी ममता जहाँ रह जायगी, वहीं जन्म होगा। ममता नहीं रहेगी तो जन्म-मरणके चक्रसे मुक्ति हो जायगी। कितनी सरल और बढ़िया बात है!
श्रोता—बढ़िया बात तो है, पर होती नहीं!
स्वामीजी—होती नहीं, ऐसी बात नहीं है। आप इसको आज, अभी मान लें तो अभी हो जायगी। आप यह तो मानते ही हैं कि मैं धोखा नहीं देता हूँ और सन्तोंकी, शास्त्रोंकी, गीताजीकी बात कहता हूँ। बड़ी-बूढ़ी माताओंसे पूछो। जब वे छोटी बच्ची थीं, तब वे अपने पिताके घरको अपना घर मानती थीं। उस घरमें उनकी ममता थी कि यह मेरा घर है। परन्तु विवाह होनेके बाद वे पतिके घरको अपना घर मानने लग गयीं। ससुरालवाले अपने हो गये। अत: मेरापन बदलना तो आपको आता ही है। ससुरालमें रहते-रहते वह इतनी रच-पच जाती है कि उसको यह खयाल ही नहीं आता कि मैं कभी इस घरकी नहीं थी। परिवार फैल जाता है, बेटे-पोते हो जाते हैं। पोतेका विवाह होता है और उसकी बहू आकर घरमें खटपट मचाती है तो वह बूढ़ी दादी माँ कहती है कि इस परायी जायी छोकरीने आकर मेरा घर बिगाड़ दिया—‘घर खोयो परायी जायी!’ अब उस बूढ़ी माँसे कोई पूछे कि यह तो परायी जायी है, पर आप यहीं जन्मी थीं क्या? उसको याद ही नहीं कि मैं तो परायी जायी हूँ! वह यही मानती है कि मैं तो यहाँकी ही हूँ। बोलो, अपनापन बदल गया कि नहीं? वह परायी जायी छोकरी भी एक दिन कहेगी कि यह मेरा घर है। आज आप उसको भले ही परायी जायी कह दो, पर यह घर भी उसका हो जायगा। माताओ! जो घर अपना नहीं था, वह घर भी अपना हो गया, फिर भगवान्का घर तो पहलेसे ही अपना है! भगवान् कहते हैं—
ममैवांशो जीवलोके जीवभूत: सनातन:।
हम सब-के-सब उस परमात्माके अंश हैं, उस प्रभुके लाड़ले पुत्र हैं। हम चाहे कपूत हों या सपूत, पर हैं प्रभुके ही।
कुपुत्रो जायेत क्वचिदपि कुमाता न भवति॥
पुत्र तो कुपुत्र हो सकता है, पर माता कभी कुमाता नहीं होती। ऐसे ही हमारे प्रभु कभी कुमाता-कुपिता नहीं होते। वे देखते हैं कि यह अभी बच्चा है, गलती कर दी; परन्तु फिर प्यार करनेके लिये तैयार!
अपि चेत्सुदुराचारो भजते मामनन्यभाक्।
साधुरेव स मन्तव्य: सम्यग्व्यवसितो हि स:॥
(गीता ९। ३०)
दुराचारी-से-दुराचारी मनुष्य भी यदि भगवान्के भजनमें अनन्यभावसे लग जाय कि ‘मैं तो भगवान्का हूँ और भगवान् मेरे हैं’ तो उसको साधु ही मानना चाहिये। वह बहुत जल्दी धर्मात्मा बन जाता है और निरन्तर रहनेवाली शान्तिको प्राप्त हो जाता है—‘क्षिप्रं भवति धर्मात्मा शश्वच्छान्तिं निगच्छति’ (गीता ९। ३१)। यह सच्ची बात है।
संसारके हम नहीं हैं, संसार हमारा नहीं है। संसारके साथ अपनापन हमने किया है। वास्तवमें तो हम सदासे भगवान्के हैं और भगवान् हमारे हैं। हम भले ही भूल जायँ, पर भगवान् हमें भूले नहीं हैं। हम चाहे भगवान्से विमुख हो जायँ, पर भगवान् हमारेसे विमुख नहीं हुए हैं। भगवान् कहते हैं—‘सब मम प्रिय सब मम उपजाए’ (मानस, उत्तर० ८६।२) सब-के-सब मेरेको प्यारे लगते हैं। इसलिये सज्जनो! हम सब भगवान्के लाड़ले हैं, उनके प्यारे हैं!
अर्जुनने पूरी गीता सुननेके बाद क्या कहा? ‘नष्टो मोह: स्मृतिर्लब्धा’ (१८।७३) मोह नष्ट हो गया और स्मृति मिल गयी, याद आ गयी। जो भूल हो गयी थी, वह याद आ गयी कि मैं तो आपका हूँ। अब क्या करोगे? तो कहा—‘करिष्ये वचनं तव’ आप जो कहोगे, वही करूँगा। मैं तो आपका हूँ ही, पहले भूल गया था, अब वह भूल मिट गयी।
हम सदासे परमात्माके ही हैं। शरीर संसारसे मिला है। जिन माता-पितासे यह शरीर मिला है, उनकी सब तरहसे सेवा करना, सुख पहुँचाना, आदर करना हमारा कर्तव्य है। पर हम स्वयं परमात्माके ही हैं। इस बातको ज्ञानी भक्त प्रह्लादजी जानते थे। पिताजी कहते हैं कि तुम भगवान्का नाम मत लो, उनका भजन मत करो; यदि करोगे तो मार दिये जाओगे। परन्तु प्रह्लादजी इस बातसे भयभीत नहीं होते। उनके पिता हिरण्यकशिपुने अपनी स्त्री कयाधूसे कहा कि तू अपने लड़केको जहर पिला दे। कयाधू पतिव्रता थी। उसकी गोदमें प्रह्लाद है और हाथमें जहरका प्याला। माँके द्वारा बच्चेको जहर पिलाया जाना बड़ा कठिन काम है। प्रह्लादजी अपनी माँसे कहते हैं कि माँ! तू मेरेको जहर पिला दे तो तेरे भी धर्मका पालन हो जायगा और मेरे भी धर्मका पालन हो जायगा। प्रह्लादजी जहर पी गये, पर मरे नहीं; क्योंकि उनको भगवान् पर पूरा भरोसा था। उन्होंने पिताजीकी आज्ञाको भंग नहीं किया। उनको समुद्रमें डुबाने लगे तो उन्होंने यह नहीं कहा कि मेरेको समुद्रमें क्यों डुबाते हो? वे वहाँसे बच गये तो उनके ऊपर वृक्ष और पत्थर डाल दिये गये। उनको पहाड़से गिराया गया, हाथीसे कुचलवाया गया, अस्त्र-शस्त्रोंसे काटनेकी चेष्टा की गयी, पर वे मरे नहीं। प्रह्लादजीने कभी यह नहीं कहा कि आप मेरेको मारते क्यों हो? परन्तु भगवान्का भजन नहीं छोड़ा।
पिताजीने उनको शुक्राचार्यजीके पुत्र शण्डामर्कके पास भेजा। वहाँपर वे पढ़ाई नहीं करते। गुरुजी जब बाहर जाते, तब वे पाठशाला बना देते। वे राजकुमार थे; अत: सब लड़के उनके कहनेसे भजन करते। गुरुजीने देखा कि प्रह्लादजीने तो पाठशालाको भजनशाला बना दिया; अत: वे हिरण्यकशिपुके पास जाकर बोले कि महाराज! आपका लड़का खुद तो बिगड़ा ही है, दूसरे लड़कोंको भी बिगाड़ रहा है। हिरण्यकशिपुने प्रह्लादजीको बुलाकर पूछा कि तेरी यह खोटी बुद्धि कहाँसे आयी है? स्वत: पैदा हुई है या किसीने तेरेको सिखायी है? प्रह्लादजीने कहा कि पिताजी! ऐसी बुद्धि न तो स्वत: पैदा होती है और न इसको कोई सिखा सकता है। यह तो सन्त-महात्माओंकी कृपासे मिलती है।
बचपनमें प्रह्लादजीपर नारदजी महाराजकी कृपा हुई थी। प्रह्लादजी जब माँके गर्भमें थे, तब इन्द्रने आकर लूटपाट की और कयाधूको ले गया। हिरण्यकशिपु उस समय तपस्याके लिये वनमें गया हुआ था। जब इन्द्र कयाधूको लेकर जा रहा था, तब रास्तेमें नारदजी मिले। नारदजीने कहा कि इस अबलाको क्यों दु:ख दे रहा है? इस बेचारीने क्या अपराध किया है? इन्द्र बोला कि महाराज! इसके पेटमें मेरे शत्रु हिरण्यकशिपुका अंश है। उसने अकेले ही हमें इतना तंग कर दिया है, जब दो हो जायँगे, तब बड़ी मुश्किल हो जायगी! इसलिये मैं कयाधूको ले जाता हूँ। जब इसका बच्चा जन्मेगा, तब मैं उसको मार दूँगा, कयाधूको कुछ नहीं कहूँगा। नारदजीने कहा कि इसका जो बच्चा होगा, वह तेरा वैरी नहीं होगा। नारदजीका बात राक्षस, असुर, देवता, मनुष्य सब मानते हैं; क्योंकि वे सन्त जो ठहरे। सन्तोंपर सबका विश्वास होता है। इन्द्रने उनकी बात मान ली और कयाधूको छोड़ दिया। नारदजीने कयाधूको एक कुटियामें रखा और कहा कि बेटी! तुम चिन्ता मत करो और यहींपर आनन्दसे रहो। जैसे पिताके घर लड़की प्यारसे रहती है, ऐसे ही वह भी वहाँ रहने लग गयी। नारदजी उसके गर्भको लक्ष्यमें रखकर भगवान्की कथाएँ सुनाते थे। इसके गर्भमें जो बालक है, वह भगवान्का भक्त बन जाय— इस भावसे वे सत्संगकी बड़ी अच्छी-अच्छी बातें सुनाते थे।
माता घट रह्यो न लेश नारदके उपदेशको।
सो धारॺो अशेष गर्भ मांहि ज्ञानी भयो॥
नारदजीका उपदेश माँको तो याद नहीं रहा, पर प्रह्लादजीने गर्भमें ही उस उपदेशको धारण कर लिया। वे वहींसे भक्त बन गये। भक्त बननेसे उनके हृदयमें यह बात आ गयी कि मैं स्वयं तो वास्तवमें परमात्माका ही हूँ और यह शरीर माता-पिताका है। माता-पिता यदि इस शरीरके टुकड़े-टुकड़े भी करें तो भी मेरेको बोलनेका कोई अधिकार नहीं है; क्योंकि शरीर इनका दिया हुआ है। परंतु मैं स्वयं साक्षात् परमात्माका अंश हूँ; अत: परमात्मासे हटानेका इनको अधिकार नहीं है। मैं परमात्माकी तरफ लगूँ और यह शरीर माता-पिताकी सेवामें लगे।
सज्जनो! यह शरीर माता-पिताका है। इसलिये माता-पिताकी खूब सेवा करो, सब तरहसे उनको सुख पहुँचाओ, उनका आदर-सत्कार करो। वास्तवमें सेवा करके भी आप उऋण नहीं हो सकते। माँके ऋणसे कोई भी उऋण नहीं हो सकता। संसारमें जितने भी सम्बन्ध हैं, उनमें सबसे बढ़कर माँका सम्बन्ध है। इस शरीरका ठीक तरहसे पालन-पोषण जैसा माँ करती है, वैसा कोई नहीं कर सकता—‘मात्रा समं नास्ति शरीरपोषणम्।’ इसलिये कहा गया है—
कुलं पवित्रं जननी कृतार्था
वसुन्धरा पुण्यवती च तेन।
अपारसंवित्सुखसागरेऽस्मिन्
लीनं परे ब्रह्मणि यस्य चेत:॥
(स्कन्दपुराण, माहे० कौमार० ५५। १४०)
अर्थात् जिसका अन्त:करण परब्रह्म परमात्मामें लीन हो गया है, उसका कुल पवित्र हो जाता है, उसकी माता कृतार्थ हो जाती है, और यह सम्पूर्ण पृथ्वी महान् पवित्र हो जाती है।
जननी जणे तो भक्त जण, कै दाता कै सूर।
नहिं तो रहजे बाँझड़ी, मती गमाजे नूर॥
मैंने सन्तोंका बधावा बोलते समय सुना है—‘धिन जननी ज्यांरे ए सुत जाया ए, सोहन थाल बजाया ए।’ जिस माताने ऐसे भक्तको जन्म दिया है, वह धन्य है! कारण कि बालकपर माँका विशेष असर पड़ता है। प्राय: देखा जाता है कि माँ श्रेष्ठ होती है तो उसका पुत्र भी श्रेष्ठ होता है। इसलिये जिसका मन भगवान्में लग जाता है, उसकी माँ कृतार्थ हो जाती है।
आप दान-पुण्य करके, बड़ा उपकार करके इतना लाभ नहीं ले सकते, जितना लाभ भगवान्के चरणोंकी शरण होनेसे ले सकते हैं। कारण कि परमात्माके साथ हमारा अकाट्य अटूट सम्बन्ध है। यह सम्बन्ध कभी भी टूट नहीं सकता। इस सम्बन्धको जीव ही भूला है, भगवान् नहीं भूले। इसलिये जीवके ऊपर ही भगवान्की तरफ चलनेकी जिम्मेवारी है। भगवान् तो अपनी ओरसे कृपा कर ही रहे हैं, चाहे वह कैसा ही क्यों न हो। भगवान् सबका पालन, भरण-पोषण करते हैं। पापीको भी दण्ड देकर सुधारते हैं, नरकोंमें डालकर पवित्र करते हैं। इस तरह भगवान् तो सम्पूर्ण जीवोंका पालन-पोषण करनेमें, उनको पवित्र करनेमें लगे हुए हैं। भगवान् कहते हैं—
सनमुख होइ जीव मोहि जबहीं।
जन्म कोटि अघ नासहिं तबहीं॥
(मानस, सुन्दर० ४४। २)
जीव ही भगवान्से विमुख हुआ है, इसलिये इसपर ही भगवान्के सम्मुख होनेकी जिम्मेवारी है। जहाँ सम्मुख हुआ कि बेड़ा पार! इसलिये हम प्रभुके चरणोंकी शरण हो जायँ और अपनी अहंता बदल दें कि हम परमात्माके हैं। जैसे बहनें-माताएँ अपनी अहंता बदल देती हैं कि मैं अब इस घरकी नहीं हूँ; जहाँ विवाह हुआ है, उस घरकी हूँ। उनका गोत्र बदल जाता है, पिताका गोत्र नहीं रहता। कई जगह ऐसी बात आती है कि घरमें कोई बालक पैदा हुआ और सूतक लगनेके कारण हम ठाकुरजीकी सेवा नहीं कर सकते, तो कहते हैं कि तुम्हारी जो विवाहित लड़की घरपर है, वह सेवा कर देगी; क्योंकि उसको सूतक नहीं लगता, उसका गोत्र दूसरा है। वही लड़की आपके घरमें है और उसके ससुरालमें बालक पैदा हुआ तो आप उसको कहते हैं कि देख बेटी, जलको हाथ मत लगाना। वह खास अपनी बेटी है, पर उसके ससुरालमें बालक पैदा होनेसे उसको सूतक लगता है। ऐसे ही आप अपनी अहंता बदल दें कि हम तो भगवान्के हैं तो आप वास्तविकतातक पहुँच जायँगे।
हम अपनी तरफसे भगवान्को अपना मानते नहीं पर भगवान् अपनी तरफसे हमें अपना मानते हैं। मानते ही नहीं, जानते भी हैं। बच्चा माँको अपनी माँ मानता है, पर कभी-कभी अड़ जाता है कि तू मेरा कहना नहीं मानती तो मैं तेरा बेटा नहीं बनूँगा। माँ हँसती है; क्योंकि वह जानती है कि बेटा तो मेरा ही है। बच्चा समझता है कि माँको मेरी गरज है, बेटा बनना माँको निहाल करना है, इसलिये कहता है कि तेरा बेटा नहीं बनूँगा, तेरी गोदमें नहीं आऊँगा। परन्तु बेटा नहीं बननेसे हानि किसकी होगी? माँका क्या बिगड़ जायगा? माँ तो बच्चेके बिना वर्षोंसे जीती रही है, पर बच्चेका निर्वाह माँके बिना कठिन हो जायगा। बच्चा उलटे माँपर अहसान करता है। ऐसे ही हम भी भगवान् पर अहसान कर सकते हैं!
भगवान्के एक बड़े प्यारे भक्त थे, नाम याद नहीं है। वे रात-दिन भगवद्भजनमें तल्लीन रहते थे। किसीने उनके लिये एक लंबी टोपी बनायी। उस टोपीको पहनकर वे मस्त होकर कीर्तन कर रहे थे। कीर्तन करते-करते वे प्रेममें इतने मग्न हो गये कि भगवान् स्वयं आकर उनके पास बैठ गये और बोले कि भगतजी! आज तो आपने बड़ी ऊँची टोपी लगायी! वे बोले कि किसीके बापकी थोड़े ही है, मेरी है। भगवान्ने कहा कि मिजाज करते हो? तो बोले कि माँगकर थोड़े ही लाये हैं मिजाज? भगवान्ने पूछा कि मेरेको जानते हो? वे बोले कि अच्छी तरहसे जानता हूँ। भगवान् बोले कि यह टोपी बिक्री करते हो क्या? वे बोले कि तुम्हारे पास देनेको है ही क्या जो आये हो खरीदनेके लिये? त्रिलोकी ही तो है तुम्हारे पास, और देनेको क्या है? भगवान् बोले कि इतना मिजाज! तो वे बोले कि किसीका उधार लाये हैं क्या? भगवान्ने कहा कि देखो, मैं दुनियासे कह दूँगा कि ये भगत-वगत कुछ नहीं हैं तो दुनिया तुम्हारेको मानेगी नहीं। वे बोले कि अच्छा, आप भी कह दो, हम भी कह देंगे कि भगवान् कुछ नहीं हैं। आपकी प्रसिद्धि तो हमलोगोंने की है, नहीं तो आपको कौन जानता है? भगवान्ने हार मान ली!
माँके हृदयमें जितना प्रेम होता है उतना प्रेम बच्चोंके हृदयमें नहीं होता। ऐसे ही भगवान्के हृदयमें अपार स्नेह है। अपने स्नेहको, प्रेमको वे रोक नहीं सकते और हार जाते हैं! ‘और सबसों गये जीत, भगतसे हारॺो’ कितनी विलक्षण बात है! ऐसे भगवान्के हो जाओ। दूसरोंके साथ हमारा सम्बन्ध केवल उनकी सेवा करनेके लिये है। उनको अपना नहीं मानना है। अपना केवल भगवान्को मानना है। भगवान्की भी सेवा करनी है, पर उनसे लेना कुछ नहीं है।
आपकी कन्या आपकी अहंता बदल देती है, अपनेको दूसरे घरकी बहू मान लेती है। क्या आप अपनी अहंता नहीं बदल सकते? क्या आपमें उस कन्या जितनी सामर्थ्य भी नहीं है? जिस कन्याका आपने पालन-पोषण किया, बड़ी धूमधामसे विवाह किया, उस कन्याके बदलनेपर (दूसरे घरको अपना माननेपर) भी आप नाराज नहीं होते। ऐसे ही आप अपनेको भगवान्का और भगवान्को अपना मान लें तो कोई नाराज नहीं होगा; क्योंकि यह सच्ची बात है। मीराबाईने कहा—‘मेरे तो गिरधर गोपाल, दूसरो न कोई।’ गिरधर गोपालके सिवाय मेरा कोई नहीं है और मैं किसीकी नहीं हूँ।
आप नौकरी करो तो आपकी योग्यताके अनुसार आपको तनख्वाह मिलेगी। परन्तु आप घरमें माँके पास जाओ तो क्या माँ आपकी योग्यताके अनुसार रोटी देगी। आप काम करो तो भी वह रोटी देगी और काम न करो तो भी रोटी देगी। इस तरह भजन करनेसे ही भगवान्से सम्बन्ध होगा, भजन न करनेसे सम्बन्ध नहीं होगा—यह बात नहीं है। यदि आप भगवान्से अपनापन कर लेंगे कि हे नाथ! मैं तो आपका ही हूँ, तो भगवान् सोचेंगे कि यह चाहे जैसा भी है, अपना ही बालक है! अत: भगवान्को आपका पालन करना ही पड़ेगा। इसलिये ‘मैं तो आपका ही हूँ और आप ही मेरे हैं’—यह बड़ा सीधा रास्ता है।
भगवान् कहते हैं कि यह जीव है तो मेरा ही अंश, पर प्रकृतिमें स्थित शरीर, इन्द्रियाँ, मन, बुद्धिको खींचता है, उनको अपना मानता है (गीता १५। ७)! अरे! किस धंधेमें तू लग गया! है कहाँका और कहाँ लग गया! संसारकी सेवा करो। अपने तन, मन, धन, बुद्धि, योग्यता, अधिकार आदिसे दूसरोंको सुख पहुँचाओ, पर उनको अपना मत मानो। यह अपनापन टिकेगा नहीं। केवल सेवा करनेके लिये ही वे अपने हैं। संसारकी जिन चीजोंमें अपनापन कर लेते हैं, वे ही हमें पराधीन बनाती हैं। वहम होता है कि इतना परिवार मेरा, इतना धन मेरा, पर वास्तवमें ये तेरे नहीं हैं, तू इनका हो गया, इनके पराधीन हो गया! न तो ये हमारे साथ रहेंगे और न हम इनके साथ रहेंगे। इसलिये बड़े उत्साह और तत्परतासे इनकी सेवा करो तो दुनिया भी राजी हो जाय और भगवान् भी राजी हो जायँ! आप भी सदा आनन्दमें, मौजमें रहें! जब सेवा करनेवाला नहीं मिलता, तब सेवा चाहनेवाला दु:खी रहता है। परन्तु सेवा करनेवाला सदा सुखी रहता है, आनन्दमें रहता है।