कर्मयोगका तत्त्व

वास्तवमें कर्मयोग क्या है—इस बातको जाननेवाले बहुत कम हैं। तत्त्वज्ञ जीवन्मुक्त महापुरुषका मिलना कठिन है, पर कर्मयोगके तत्त्वको जाननेवाला मिलना उससे भी ज्यादा कठिन है! लगभग पाँच हजार वर्ष पहले भगवान‍्ने कहा था कि बहुत समय बीत जानेके कारण वह कर्मयोग लुप्तप्राय हो गया—‘स कालेनेह महता योगो नष्ट: परंतप’ (गीता ४। २)। अब तो यह बहुत ही लुप्त हो गया है। ग्रन्थोंमें कर्मयोगका विवेचन नहीं आता। पढ़ाईमें भी कर्मयोगका विवेचन नहीं आता। सत्संगमें भी कर्मयोगका विवेचन नहीं मिलता। इसका अध्ययन लुप्तप्राय है। इसलिये कर्मयोगकी बात बड़ी कठिन मालूम देती है। कर्मयोगका विवेचन करनेमें कई घण्टे लग सकते हैं। मैं उसकी थोड़ी सार-सार बात बताता हूँ।

सबसे पहली बात यह है कि चाहे ‘कर्मयोग’ कह दो, चाहे ‘निष्काम कर्म’ कह दो, एक ही बात है। ‘निष्काम कर्मयोग’ शब्द बनता ही नहीं। इसका अर्थ ठीक नहीं बैठता। परन्तु अच्छे-अच्छे समझदार भी ‘निष्काम कर्मयोग’ कह देते हैं! इसलिये यह बात कहनेमें जरा कठिन पड़ती है कि ‘निष्काम कर्मयोग’ कहना बिलकुल गलत है। निष्काम कर्म कह दो या कर्मयोग कह दो, दोनों ठीक हैं। पर ‘निष्काम कर्मयोग’ कैसे बनेगा? परन्तु अब क्या करें? किसको कहें?

हमें एक बड़ा दु:ख है कि भाइयोंमेंसे और बहनोंमेंसे कोई भी इस तत्त्वको जाननेके लिये जिज्ञासु नहीं है, जाननेके लिये तैयार नहीं है। माननेके लिये मैं आग्रह करता ही नहीं। कम-से-कम यह है क्या—इसको जानो तो सही। मानो या मत मानो, आपकी मरजी। परन्तु तत्त्व क्या है—ऐसी भीतर लगन तो लगे। मेरी धारणामें इस तत्त्वको समझनेमें आप अयोग्य नहीं हैं, अनधिकारी नहीं हैं। आप सब-के-सब समझ सकते हैं। परन्तु जो समझना चाहे ही नहीं, उसका क्या करें?

योगकी परिभाषा गीताने दो जगह की है—समताका नाम योग है—‘समत्वं योग उच्यते’ (२।४८) और दु:खोंके संयोगका सर्वथा वियोग हो जाय, इसका नाम योग है—‘तं विद्याद् दु:खसंयोगवियोगं योगसंज्ञितम्।’ (६।२३) सम क्या है? सम हैं ब्रह्म—‘निर्दोषं हि समं ब्रह्म’ (५।१९)। दु:खोंका अत्यन्त अभाव कब होता है? परमानन्दकी प्राप्ति होनेपर होता है। कर्मयोग, ज्ञानयोग, भक्तियोग और हठयोग, राजयोग, मन्त्रयोग आदि कई योग हैं। उन सब योगोंका तात्पर्य है कि परमात्माके साथ जो नित्ययोग अर्थात् नित्य-सम्बन्ध है, उसकी जागृति हो जाय। परमात्माका जीवके साथ सदासे नित्ययोग है। कर्मयोग उसको कहते हैं, जिसमें कर्म संसारके लिये हो जाय और योग परमात्माके साथ हो जाय। अब उसको चाहे निष्कामभावसे कर्म करना कह दो, चाहे कर्मयोग कह दो।

श्रोता—कर्मयोगसे परमात्मतत्त्वकी प्राप्ति कैसे होगी?

स्वामीजी—अब ध्यान दें। आपकी शंका है कि हम कर्म तो संसारके हितके लिये करते हैं, फिर उससे परमात्माकी प्राप्ति कैसे हो जायगी? जैसे, बद्रीनारायण जा रहे हैं तो द्वारिका कैसे पहुँच जायँगे? कर किधर रहे हैं और प्राप्ति किधर हो रही है—ऐसा कहीं होता है? जा रहे हैं उत्तरमें और पहुँच जायँ दक्षिणमें अथवा जा रहे हैं दक्षिणमें और पहुँच जायँ उत्तरमें— यह कैसे होगा? सम्भव ही नहीं। इसलिये शंका होती है। बहुत ठीक शंका है।

सबसे पहले एक बात बताता हूँ, उस तरफ आप खयाल करें। परमात्मतत्त्व सब जगह है कि नहीं? इसके उत्तरमें जो भगवान‍्को मानते हैं, वे सब कहेंगे कि परमात्मा सब जगह हैं। यह मूल चीज है। इस विषयमें मैं चार बातें कहता हूँ—

१. परमात्मा सब जगह हैं, २. परमात्मा सब समयमें हैं, ३. परमात्मा सब वस्तुओंमें हैं और ४. परमात्मा सबके हैं। यह नहीं है कि मेरे तो वे कोई नजदीक पड़ते हों और आपसे कोई दूर पड़ते हों। परमात्मा पापी-से-पापी, दुराचारी-से-दुराचारीके भी उतने ही नजदीक हैं, जितने सन्त-महात्मा, जीवन्मुक्त, तत्त्वज्ञ, भगवत्प्रेमी आदिके नजदीक हैं। परमात्मा अपनी तरफसे दूर नहीं हैं, जीव ही उनसे विमुख हो जाता है।

परमात्मा सब जगह हैं तो यहाँ हैं कि नहीं? अगर परमात्मा यहाँ नहीं हैं तो वे सब जगह हैं—यह नहीं कह सकते। यहाँके सिवा सब जगह हैं—ऐसा कह सकते हैं, पर फिर भी ‘सब जगह’ शब्द प्रयोगमें नहीं ले सकते। ऐसे ही परमात्मा सब समयमें हैं तो इस समय हैं कि नहीं? अगर इस समय नहीं हैं तो वे सब समयमें हैं—यह कहनेकी किसीमें हिम्मत नहीं है। ऐसे ही परमात्मा सम्पूर्ण वस्तुओंमें हैं तो हमारेमें हैं कि नहीं? शरीर, प्राण, इन्द्रियाँ, मन, बुद्धि और अहम् (मैं हूँ)—इन सबमें परमात्मा हैं कि नहीं? अगर इनमें नहीं हैं तो परमात्मा सम्पूर्ण वस्तुओंमें हैं—यह कहना कभी नहीं बन सकता। मैं जहाँ हूँ, वहाँ परमात्मा नहीं हैं—ऐसा कह सकते हो क्या? किसी भी आस्तिककी यह कहनेकी हिम्मत नहीं होगी कि मेरेमें परमात्मा नहीं हैं। परमात्मा सबके हैं तो मेरे भी हैं। अगर वे मेरे नहीं हैं तो वे सबके हैं—यह कहना बनता ही नहीं। सब जीव उनके अंश हैं—‘ममैवांशो जीवलोके’ (गीता १५। ७), ‘ईस्वर अंस जीव अबिनासी’ (मानस, उत्तर० ११७। १)। भगवान‍् कहते हैं कि मैं प्राणिमात्रका सुहृद् हूँ—‘सुहृदं सर्वभूतानाम्’ (गीता ५। २९) वे किसी एकके भी सुहृद् न हों, यह नहीं हो सकता। जो सब जगह हैं, सब समयमें हैं, सब वस्तुओंमें हैं और सबके हैं—ऐसे परमात्माको प्राप्त करनेके लिये क्या करें? किसी भी एक योगका अनुष्ठान करें। यहाँ प्रसंग कर्मयोगका है, इसलिये अब कर्मयोगकी बात कहता हूँ।

कर्मोंसे परमात्माका योग (नित्य-सम्बन्ध) कब होगा? जब हम अपने लिये कोई कर्म नहीं करें। खाना-पीना, उठना-बैठना, सोना-जागना, चिन्तन करना, भजन-ध्यान करना और समाधि लगाना भी अपने लिये बिलकुल न करें, तब कर्मयोग होगा, नहीं तो कर्मभोग होगा। अपने लिये कर्म करनेसे भोग होता है, योग नहीं होता। यह मूल बात है।

अपने लिये कोई कर्म नहीं करना है—यह सुनकर आदमी अटक जाता है कि अपने लिये नहीं करें तो किसके लिये करें? एक बात मैं कहता हूँ, अगर आपके विरुद्ध पड़े तो क्षमा करें। जप भी अपने लिये नहीं, तप भी अपने लिये नहीं, समाधि भी अपने लिये नहीं, प्रार्थना भी अपने लिये नहीं—इनको अपने लिये नहीं करना है। कारण कि मूलमें हम परमात्माके अंश हैं—

ईस्वर अंस जीव अबिनासी।

चेतन अमल सहज सुखरासी॥

(मानस, उत्तर० ११७।२)

जो चेतन, मलरहित और सुखराशि है, उसके लिये क्या करना पड़ेगा? उसके लिये कुछ नहीं करना है। हम अपने लिये करते हैं—यही बन्धन है। यह बात थोड़ी कठिन पड़ती है हरेककी समझमें नहीं आती। परन्तु अपने लिये करेंगे तो बन्धन होगा। कैसे बन्धन होगा? कुछ भी कर्म करें, उस कर्मका आरम्भ होगा कि नहीं? और उसकी समाप्ति होगी कि नहीं? कोई भी कर्म किया जायगा तो उसका आरम्भ होगा और उसकी समाप्ति होगी। उसका जो फल मिलेगा, उसका भी संयोग होगा और वियोग होगा। वह आपके लिये उपयोगी कैसे होगा, जबकि आप नित्य रहनेवाले हो?

खूब गहरी रीतिसे ध्यान दो। अपने लिये कुछ भी नहीं करना है—यह वेदान्तका भी सिद्धान्त है, अद्वैतमार्गका भी सिद्धान्त है, भक्तिमार्गका भी सिद्धान्त है। जितने दार्शनिक हैं, उनका भी यह मत है। जीवात्मा परमात्माका साक्षात् अंश है। वह कर्मोंसे न बढ़ता है, न घटता है—‘कर्मणा न वर्द्धते नो कनीयान्।’ वह ज्यों-का-त्यों रहता है। आप चाहते हो कि वह कर्मोंसे हमारेको मिल जाय, यहीं गलती होती है। हम जो कर्म करें, दूसरोंके लिये करें। संसारके पदार्थ और क्रियामात्र दूसरोंके लिये हैं; क्योंकि पदार्थ और क्रिया—ये दोनों प्रकृतिके हैं, परमात्माके नहीं। परमात्मा पदार्थ और क्रियासे रहित हैं।

परमात्मा सब वस्तुओंमें हैं और सब क्रियाओंमें हैं। सबमें रहते हुए भी परमात्मा सबसे परे हैं, निर्लिप्त हैं। परमात्मामें लिप्तता है ही नहीं। हम कर्म करते हैं और फल चाहते हैं—यही गुणोंका संग है, जिससे ऊँच-नीच योनियोंमें जन्म लेना पड़ता है (गीता १३। २१)। कर्मका फल विनाशी ही होता है, अविनाशी नहीं। फल वही होता है, जो पहले नहीं होता, प्रत्युत पैदा होनेवाला और नष्ट होनेवाला होता है। अत: परमात्मतत्त्व कर्मका फल नहीं हो सकता।

ज्ञानसे जो बोध होता है, वह फल नहीं है। भक्तिमें जो प्रेम होता है, वह फल नहीं है। कर्मयोगसे जो योग होता है, वह फल नहीं है। फल कभी भी होगा, नाशवान‍् ही होगा। फल अविनाशी हो ही नहीं सकता, कभी सम्भव ही नहीं। फिर कर्म किसलिये किया जाय? संसारमें जो राग है, उस रागकी निवृत्तिके लिये कर्म किया जाय। कर्म रागकी पूर्तिके लिये भी किया जाता है और रागकी निवृत्तिके लिये भी। कर्मका आरम्भ केवल रागकी निवृत्तिके लिये किया जाय। हमने जडके साथ जो सम्बन्ध जोड़ा है, उस सम्बन्धके विच्छेदके लिये कर्म किया जाय। सम्बन्ध-विच्छेद तभी होता है, जब कर्म दूसरोंके लिये किया जाय। अपने लिये कर्म किया जायगा तो सम्बन्ध-विच्छेद नहीं होगा।

स्थूलशरीरसे आप दूसरोंकी सेवा करो, स्थूल पदार्थोंका दान करो, पर उसका फल मत चाहो। कारण कि हमारी न क्रिया है और न पदार्थ है, फिर क्रिया करना और दान-पुण्य करना हमारे लिये कैसे होगा? ऐसे ही सूक्ष्मशरीरसे यह चिन्तन किया जाय कि प्राणिमात्रका हित कैसे हो? सबका कल्याण कैसे हो? सबका उपकार कैसे हो? सबकी सेवा कैसे बने? अब रही कारणशरीरकी बात! कारणशरीर अविद्या कहलाता है और उसमें स्वभाव मुख्य रहता है। इससे आगे हम कुछ नहीं जानते—इसका नाम कारणशरीर है। स्थूलशरीरमें जाग्रत्-अवस्था, सूक्ष्मशरीरमें स्वप्न-अवस्था और कारणशरीरमें सुषुप्ति-अवस्था (गाढ़ निद्रा) होती है। ये तीनों अवस्थाएँ प्रकृतिके संगसे होती हैं। समाधि कारणशरीरकी होती है। समाधिमें किंचिन्मात्र भी स्फुरणा नहीं होती, एकदम स्थिरता रहती है। यह समाधि भी हमारे लिये नहीं है, तभी कर्मयोग होगा। कारण कि समाधि भी कर्म है। जैसे ‘गच्छति’ क्रिया है, ‘चिन्तयति’ क्रिया है, ‘ध्यायते’ क्रिया है, ऐसे ही ‘समाधीयते’ भी क्रिया है। करना भी क्रिया है और न करना भी क्रिया है। भगवान‍् कहते हैं—‘नैव तस्य कृतेनार्थो नाकृतेनेह कश्चन।’ (गीता ३।१८) अर्थात् कर्मयोगसे सिद्ध हुए महापुरुषका इस संसारमें न तो कर्म करनेसे कोई प्रयोजन रहता है और न कर्म न करनेसे ही कोई प्रयोजन रहता है। अत: करना भी हमारे लिये नहीं और न करना भी हमारे लिये नहीं।

शरीर और वस्तुओंके द्वारा दूसरोंका हित किया जाय तो शरीर और वस्तुओंकी शुद्धि होती है। ऐसे ही दूसरोंके हितका चिन्तन किया जाय तो मन-बुद्धिकी शुद्धि होती है। भगवान‍् कहते हैं कि जो प्राणिमात्रके हितमें रत होते हैं, वे मेरेको प्राप्त होते हैं—

‘ते प्राप्नुवन्ति मामेव सर्वभूतहिते रता:॥’

(गीता १२।४)

लभन्ते ब्रह्मनिर्वाणमृषय: क्षीणकल्मषा:।

छिन्नद्वैधा यतात्मान: सर्वभूतहिते रता:॥

(गीता ५।२५)

—सगुण और निर्गुण—दोनोंकी प्राप्तिके लिये ‘सर्वभूतहिते रता:’ पद आया है। दूसरोंके हितके लिये हम कितना कर सकते हैं—इसका कोई ठेका नहीं है। आपकी रति, रुचि, प्रीति दूसरोंके हितमें हो।

परहित बस जिन्ह के मन माहीं।

तिन्ह कहुँ जग दुर्लभ कछु नाहीं॥

(मानस, अरण्य० ३१। ९)

जिनके हृदयमें दूसरेके हितका भाव रहता है, उनके लिये कुछ भी करना बाकी नहीं रहता।

गीध अधम खग आमिष भोगी।

गति दीन्ही जो जाचत जोगी॥

(मानस, अरण्य० ३३। २)

योगी जिस गतिके लिये याचना करते हैं, वह गति भगवान‍्ने गीधको दे दी! वह (गीधराज जटायु) चतुर्भुजरूप धारण करके हरिरूपसे वैकुण्ठको गया। उसके लिये भगवान‍्ने कहा—‘तात कर्म निज तें गति पाई’ (मानस, अरण्य०३१।८) अर्थात् इसमें मेरा कोई एहसान नहीं है, अपने कर्मसे तुमने यह गति पायी है। कर्म क्या? सीताजीकी रक्षाके लिये रावणसे युद्ध किया। सीताजी जब अपनी रक्षाके लिये पुकारने लगीं, तब उसने देखा—ओ हो! ये तो रघुकुलतिलक श्रीरामकी स्त्री है और दुष्ट लिये जा रहा है। वह जोरसे बोला—बेटी! तू चिन्ता मत कर, मैं अभी आया! जगज्जननी सीताजीको वह बेटी कहकर पुकारता है! इसका कारण यह था कि वह दशरथजीका मित्र था। दशरथजीकी पुत्रवधू मेरी पुत्रवधू ही हुई, मेरी बेटी ही हुई—इस भावसे वह बेटी कहकर बोला। रावणसे उसने ऐसी लड़ाई की कि रावणको मूर्च्छा आ गयी! लड़ते-लड़ते जब रावणने तलवारसे उसके पंख काट दिये तो वह नीचे गिर पड़ा; क्योंकि पक्षीके पास पंखोंका ही बल रहता है। इस प्रकार उसने दूसरेके हितके लिये अपने—आपकी आहुति दे दी, इसलिये उसको परमगति प्राप्त हुई। भगवान‍् इसमें (परमगति देनेमें) अपना कोई एहसान नहीं मानते।

कर्म करनेकी सब सामग्री संसारकी है। यह पांचभौतिक स्थूलशरीर स्थूल-सृष्टिका एक अंश है, सूक्ष्मशरीर समष्टि सूक्ष्म-सृष्टिका एक अंश है और कारणशरीर कारण-सृष्टिका एक अंश है। संसारकी सामग्रीसे कर्म करके अपने लिये चाहते हैं—यही महान् अनर्थका हेतु है। यही असत् का, नाशवान‍्का संग है, जिससे जन्म-मरण होता है।

एक बहुत ही विलक्षण बात बताऊँ! आपके पास कितनी योग्यता है, कितनी सामर्थ्य है, कितने पदार्थ हैं, कितनी विद्या है—इससे कुछ फर्क नहीं पड़ता। बड़े-से-बड़ा विद्वान् और मूर्ख-से-मूर्ख भी अपने लिये कोई कर्म न करे तो मुक्त हो जायगा! इसमें योग्यता आदि कोई काम नहीं देगी; क्योंकि वह तो उत्पत्ति-विनाशवाली है, आने और जानेवाली है; अत: उसके द्वारा नित्य रहनेवाला तत्त्व थोड़े ही मिलेगा! आपके पास बढ़िया या घटिया कैसी सामग्री है, कितनी योग्यता है, आप कैसे अधिकारी हैं—इसकी कोई आवश्यकता नहीं है। इसकी आवश्यकता वहाँ होती है, जहाँ योग्यता काम करती है, विद्या काम करती है, सामग्री काम करती है। ये चीजें संसारमें काम आती हैं। संसारमें आपकी जैसी योग्यता, सामर्थ्य होगी, वैसा मिलेगा। संसारमें अधिकार योग्यताके अनुसार मिलता है। आप कर्म करोगे, योग्यता लाओगे, उसके अनुसार आपको संसारका फल मिलेगा। परन्तु भगवत्प्राप्तिमें इन चीजोंकी कोई आवश्यकता नहीं है। वहाँ केवल त्यागकी आवश्यकता है।

आपके सामने कैसी ही परिस्थिति हो, चाहे सौम्य हो या घोर उसीमें भगवत्प्राप्ति हो सकती है। अर्जुनने भी कह दिया कि मेरेको युद्ध-जैसे घोर कर्ममें क्यों लगाते हैं—‘घोरे कर्मणि किं नियोजयसि’ (गीता ३। १)? युद्धमें दिनभर मनुष्योंका गला काटनेका लक्ष्य रहता है। ऐसे हिंसात्मक कर्मको करते हुए भी मनुष्यका कल्याण हो सकता है! भगवान‍् कहते हैं—

सुखदु:खे समे कृत्वा लाभालाभौ जयाजयौ।

ततो युद्धाय युज्यस्व नैवं पापमवाप्स्यसि॥

(गीता २। ३८)

(जय-पराजय, लाभ-हानि और सुख-दु:खको समान करके फिर युद्धमें लग जा। इस प्रकार युद्ध करनेसे तू पापको प्राप्त नहीं होगा।) पापका निवास विषमतामें है, समतामें नहीं। समताका नाम योग है। इसलिये समतामें स्थित होकर युद्ध करनेसे पाप नहीं लगता। वास्तवमें जय-पराजय, लाभ-हानि और सुख-दु:खको समान करना नहीं है, प्रत्युत वे तो स्वाभाविक ही समान हैं। जैसे, सुख आते हुए अच्छा लगता है, जाते हुए बुरा लगता है और दु:ख आते हुए बुरा लगता है, जाते हुए अच्छा लगता है। एक तरफ सुख अच्छा और एक तरफ दु:ख अच्छा। एक तरफ सुख बुरा और एक तरफ दु:ख बुरा। सुख और दु:खमें क्या भेद हुआ? इन दोनोंमें जो राग-द्वेष कर लेते हैं, बस कर्मयोगमें यही खास बाधा है। राग-द्वेषके कारण ही मनुष्य कर्मोंसे लिप्त हो जाता है, बँध जाता है।

कर्मयोगकी महिमा गाते हुए भगवान‍् पाँचवें अध्यायके तीसरे श्लोकमें कहते हैं—‘जो न किसीसे द्वेष करता है और न किसीकी इच्छा करता है, वह नित्य-संन्यासी समझनेयोग्य है; क्योंकि द्वन्द्वोंसे रहित मनुष्य सुखपूर्वक संसार-बंधनसे मुक्त हो जाता है।’ जो राग-द्वेष नहीं करता, वह कर्मयोगी नित्य-संन्यासी है। लाभ-हानि, सुख-दु:ख, मान-अपमान, निन्दा-स्तुति, जीना-मरना आदि द्वन्द्वोंसे रहित होनेसे वह सुखपूर्वक बन्धनसे मुक्त हो जाता है। सभी द्वन्द्व प्रकृतिमें हैं। द्वन्द्वरहित होनेसे स्वरूपमें स्थिति स्वत: होती है। मनुष्य द्वन्द्वरहित कब होता है? जब वह अपने लिये किंचिन्मात्र भी नहीं करता।

जब मनुष्य अपने लिये कर्म करता है, तब उसका प्रकृतिके साथ सम्बन्ध हो जाता है। प्रकृतिका सम्बन्ध जन्म-मरण देता है। जो अपने लिये कुछ नहीं करता, उसको कोई जन्म-मरण कैसे दे सकता है? दुनियामें जितने कर्म होते हैं, उनका पाप-पुण्य हमें नहीं लगता। हम अपने लिये जो कर्म करते हैं, उन्हींका पाप-पुण्य हमें लगता है। अगर हम अपने लिये कुछ न करें तो हमें कोई पाप-पुण्य नहीं लगेगा। अपने लिये कुछ भी करेंगे और कुछ भी चाहेंगे तो योग नहीं होगा, प्रत्युत भोग होगा तथा कर्मोंसे बन्धन होगा—

‘कर्मणा बध्यते जन्तु:।’

मैं तो सीधी-सादी बात कहता हूँ कि अगर आप घरमें रहते हैं तो घरमें रहनेकी विद्याको सीख लें। बड़ी सीधी-सरल विद्या है। अगर आप सास हैं तो बहू-बेटोंके लिये मैं सास और माँ हूँ, वे मेरे लिये नहीं हैं। आप बहू हैं तो सास-ससुरके लिये मैं हूँ, वे मेरे लिये नहीं हैं। आप पति हैं तो स्त्रीके लिये मैं हूँ, वह मेरे लिये नहीं है। यह एक धारणा आप कर लो कि उनके लिये मैं हूँ, वे मेरे लिये नहीं हैं। वे मेरे लिये हैं—यह भाव भीतरसे मिटा दो तो आपकी खटपट मिट जायगी। यह घरमें रहनेकी, संसारमें रहनेकी असली विद्या है।

चेला बने हो तो केवल गुरुके लिये बने हो। अपने लिये गुरुकी जरूरत नहीं है। मेरे लिये गुरु नहीं, मैं गुरुके लिये हूँ। मेरे लिये पिता नहीं, मैं पिताके लिये हूँ। मेरे लिये पुत्र नहीं, मैं पुत्रके लिये हूँ। आपके जितने भी सांसारिक सम्बन्ध हैं, वे सब-के-सब सम्बन्ध केवल उनकी सेवा करनेके लिये हैं। लेनेके लिये कोई सम्बन्ध है ही नहीं। लेनेका खाता ही उठा दें। तो क्या होगा? जो सब जगह हैं, सब समयमें हैं, सबके हैं, सबमें हैं, उनकी प्राप्ति हो जायगी।

साधु हैं तो हमारे लिये गृहस्थ नहीं हैं, हम गृहस्थके लिये हैं। वे हमारे लिये नहीं हैं, हम उनके लिये हैं—इतनी-सी बात है! यह बात छोटी-सी है, पर महान् लाभ देनेवाली है। अगर आपकी नीयत प्राणिमात्रका हित करनेकी है तो आपका बन्धन नहीं होगा। इसमें धनकी, विद्याकी, योग्यता आदिकी कोई जरूरत नहीं है। कर्मयोगी वही होता है, जो जैसी भी परिस्थिति आये, उसका उपयोग केवल दूसरोंके हितके लिये करता है।

हमने पहले अपने सुखके लिये किया है, इसीलिये दूसरोंके सुखके लिये करना है, नहीं तो इसको करनेकी भी जरूरत नहीं थी। सेवा करनेसे पुराना कर्जा उतर जायगा और नया कर्जा लोगे नहीं, तो क्या होगा? जैसे किसी दुकानदारको अपनी दुकान उठानी हो तो उसपर जो कर्जा है, उसको तो चुका दे और दूसरोंसे जो लेना है, वे दें तो ले ले, नहीं तो छोड़ दे। ऐसा करनेसे दुकान उठ जायगी। अगर सब-का-सब रुपया लेना चाहेगा तो दुकान उठेगी नहीं। अपनेपर जो कर्जा है, वह पूरा-का-पूरा दे दे। ऐसे ही दूसरोंका हित करना कर्जा चुकाना है, इसमें कोई महत्ताकी बात नहीं है। नया कर्जा लेना नहीं है अर्थात् किसीसे किंचिन्मात्र भी सुख चाहना नहीं है। नया कर्जा लिया नहीं और पुराना कर्जा चुका दिया तो मुक्ति नहीं होगी तो क्या होगी?

दूसरेका हित कितना करे? अपनी शक्तिके अनुसार। माल पर जगात लगती है। इनकम (आय) पर टैक्स लगता है। माल ही नहीं तो जगात किस बातकी? दूसरेके हितके लिये जितना कर सकते हो, कर दो; बस, आपका काम एकदम पूरा हो गया! जो नहीं कर सकते, उसकी कोई आशा भी नहीं रख सकता। आप मेरेसे सुननेकी आशा रखते हो, पर मेरेको जाननेवाले क्या मेरेसे ऐसी आशा रखते हैं कि स्वामीजी हमें दस हजार रुपये दे दें? जो चीज मेरे पास नहीं है, उस चीजकी आशा आप नहीं रखते। ऐसे ही जो चीज आपके पास नहीं है, उसकी आशा भगवान‍् रखेंगे क्या? क्या भगवान‍् आप-जितने भी समझदार नहीं हैं? आप जितना कर सकते हैं, उतना करनेमें कमी न रखें।

आपके पास चार चीजें हैं—समय, समझ, सामग्री और सामर्थ्य (शक्ति)। आपके पास ये चारों चीजें जितनी हैं, उतनी-की-उतनी दूसरोंके हितमें लगा दो तो कल्याण हो जायगा। आपके पास जितना है, उतना लगा दो—इतनी ही आशा भगवान‍् रखते हैं और इतनी ही आशा संसार रखता है। अगर दूसरे आपसे अधिक आशा रखते हैं तो यह उनकी गलती है। समय पूरा दे दिया, अब और समय कहाँसे लायें? चौबीस घण्टे दे दिये, अब पचीसवाँ घण्टा कहाँसे लायें? जितनी समझ है, सामग्री है, सामर्थ्य है, वह सब लोगोंके हितमें लगा दी, अब अधिक कहाँसे लायें? आपके पास जो कुछ है, उसको दूसरोंके हितमें लगानेका भाव हो जाय कि वह हमारा और हमारे लिये नहीं है, प्रत्युत दूसरोंको और दूसरोंके लिये है, तो असंगता स्वत: प्राप्त हो जायगी।

असंगता हमारा स्वरूप है—‘असंगो हि अयं पुरुष:’ (बृहदारण्यक ४। ३। १५)। जो असंगता ज्ञानयोगीको विचार करनेसे प्राप्त होती है, वही असंगता कर्मयोगीको दूसरोंके लिये कर्म करनेसे प्राप्त हो जाती है। इन दो श्लोकोंको खूब ध्यान देकर पढ़ो, याद कर लो—

सांख्ययोगौ पृथग्बाला: प्रवदन्ति न पण्डिता:।

एकमप्यास्थित: सम्यगुभयोर्विन्दते फलम्॥

यत्सांख्यै: प्राप्यते स्थानं तद्योगैरपि गम्यते।

एकं सांख्यं च योगं च य: पश्यति स पश्यति॥

(गीता ५। ४-५)

‘बेसमझ लोग ही सांख्य (ज्ञानयोग) और योग (कर्मयोग)-को अलग-अलग बताते हैं, न कि पण्डितजन। कारण कि इन दोनोंमेंसे एक साधनमें भी अच्छी तरहसे स्थित मनुष्य दोनोंके फलरूप परमात्माको प्राप्त कर लेता है। ज्ञानयोगी जिस तत्त्वको प्राप्त करते हैं, कर्मयोगी भी उसी तत्त्वको प्राप्त करते हैं। अत: जो मनुष्य ज्ञानयोग और कर्मयोगको फलरूपमें एक देखता है, वही ठीक देखता है।’

कोई भी पढ़ा-लिखा आदमी इन श्लोकोंपर विचार करके विवाद नहीं कर सकता, इतनी पक्‍की बात है! ज्ञानके बिना मुक्ति नहीं हो सकती; कर्मयोगसे अन्त:करणका मल-दोष दूर होता है—ऐसा मान लो तो कोई हर्ज नहीं; क्योंकि इस सिद्धान्तको भी मैं मानता हूँ, मेरा विरोध नहीं है। परन्तु एक बात अधिक मानता हूँ कि कर्मयोग, ज्ञानयोग और भक्तियोग—तीनों ही साधन स्वतन्त्रतासे मुक्ति करते हैं। गीता स्पष्ट कह रही है—

संन्यासस्तु महाबाहो दु:खमाप्तुमयोगत:।

योगयुक्तो मुनिर्ब्रह्म नचिरेणाधिगच्छति॥

(गीता ५। ६)

‘महाबाहो! कर्मयोगके बिना ज्ञानयोग सिद्ध होना कठिन है। मननशील कर्मयोगी शीघ्र ही ब्रह्मको प्राप्त हो जाता है।’

इसलिये अपने स्वार्थका, अभिमानका, आसक्तिका, कामनाका त्याग करना है; क्योंकि ये सब हमारा सम्बन्ध संसारके साथ जोड़ते हैं। याद रखो, संसारके साथ सम्बन्ध केवल हमारा जोड़ा हुआ है। परन्तु परमात्माके साथ सम्बन्ध स्वत:सिद्ध है, जोड़ा हुआ नहीं है। इसमें भी विलक्षण बात यह है कि पदार्थोंने, शरीरने, दूसरोंने, किसीने भी आपको नहीं बाँधा है, आपके साथ सम्बन्ध नहीं जोड़ा है। आपने ही उनके साथ सम्बन्ध जोड़ा है। इसलिये आप इस सम्बन्धको छोड़ना चाहो तो छोड़ सकते हो।

रुपयोंने कभी नहीं कहा कि हम तुम्हारे हैं, तुम हमारे हो। मकानने कभी नहीं कहा कि हम तुम्हारे हैं, तुम हमारे हो। अकेले आपने ही मेरे रुपये, मेरा मकान, मेरा शरीर, मेरा मन, मेरी बुद्धि, मेरा अहंकार—ऐसे मेरापन किया है। इसलिये अकेले आपको ही छोड़ना पड़ेगा। प्रकृति और प्रकृतिके कार्य (शरीर-संसार)-ने कभी आपको अपना नहीं कहा, कभी आपको अपना नहीं माना। वह तो तेजीसे जा रहा है, खत्म हो रहा है। आप उसको अपना मानते हैं—यही बन्धन है। उसको अपना न मानकर सेवामें लगा दें तो उसका प्रवाहमात्र संसारकी तरफ हो जायगा और आप स्वयं ज्यों-के-त्यों निर्लेप रह जायँगे।

श्रोता—भीतरमें जो अज्ञान है, उसको मिटानेके लिये क्या करें?

स्वामीजी—स्थूलशरीरसे की जानेवाली क्रिया, सूक्ष्मशरीरसे किया जानेवाला चिन्तन और कारणशरीरसे की जानेवाली समाधि भी केवल संसारके हितके लिये हो तो फिर सब अज्ञान मिट जायगा। जडतासे सम्बन्ध-विच्छेद हो जायगा और चिन्मय तत्त्वकी स्वत: जागृति हो जायगी।

आपके पास जो धन है, पद है, वह अपने लिये बिलकुल नहीं है। उसको अपना मान लिया—यह बेईमानी है। इस बेईमानीको मिटाना है और कुछ नहीं करना है। साधक हो, पर बेईमानी भी नहीं छोड़ सकते और कल्याण चाहते हो! स्थूलशरीरको अपना मानना बेईमानी है, सूक्ष्मशरीरको अपना मानना बेईमानी है और कारणशरीरको अपना मानना बेईमानी है। स्थूल, सूक्ष्म और कारण—इन तीनों शरीरोंका सम्बन्ध संसारके साथ है, आपके साथ नहीं। ये तीनों आपके नहीं हैं और आप इनके नहीं हैं।

यदि पापका फल (दु:ख) हमारेको बिना माँगे मिलता है तो पुण्यका फल (सुख) बिना माँगे क्यों नहीं मिलेगा? उसको झख मारकर मिलना पड़ेगा। क्या बीमारीकी कभी चाहना करते हो? उद्योग करते हो? कभी ज्योतिषीसे पूछते हो कि क्या करें, बीमारी नहीं आयी? महाराज, देखो तो, कब आयेगी? पाँच-सात वर्ष हो गये, हमारे घरमें कोई मरा नहीं, कौन कब मरेगा—ऐसी इच्छा होती है क्या? दस वर्ष हो गये, व्यापारमें घाटा नहीं लगा, कब लगेगा—यह चाहना होती है क्या? क्या घाटेके लिये उद्योग करते हो? फिर भी लगता है कि नहीं? तात्पर्य है कि जैसे बिना चाहे दु:ख मिलता है, ऐसे ही बिना चाहे सुख भी मिलता है, फिर सुखकी चाहना क्यों करें?

जो हमें पापोंका फल तो जबर्दस्ती भुगताये और पुण्योंके फलके लिये हमारेसे नाक रगड़वाये, वह भी कोई भगवान‍् हो सकता है? अगर वह हमें जिलाना चाहता है तो रोटी दे दे, नहीं तो हमें जीनेकी गरज नहीं है। किसी चीजके लिये हम उसको क्यों कहें? हमारी अपेक्षा उसको गरज ज्यादा है। इसलिये नि:शंक हो जाओ, निश्चिन्त हो जाओ, निर्भय हो जाओ और नि:शोक हो जाओ। न शंका है, न चिन्ता है, न भय है, न शोक है! तत्परतासे अपने कर्तव्य-कर्मका पालन करो—

तस्मादसक्त: सततं कार्यं कर्म समाचर।

असक्तो ह्याचरन्कर्म परमाप्नोति पूरुष:॥

कर्मणैव हि संसिद्धिमास्थिता जनकादय:।

लोकसंग्रहमेवापि सम्पश्यन्कर्तुमर्हसि॥

(गीता ३। १९-२०)

‘तू निरन्तर आसक्तिरहित होकर कर्तव्य-कर्मका भलीभाँति आचरण कर; क्योंकि आसक्तिरहित होकर कर्म करता हुआ मनुष्य परमात्माको प्राप्त हो जाता है। राजा जनक-जैसे अनेक महापुरुष भी कर्मके द्वारा ही परमसिद्धिको प्राप्त हुए हैं। इसलिये लोकसंग्रहको देखते हुए भी तू (निष्कामभावसे) कर्म करनेके योग्य है।’

कर्मयोगका प्रचार नहीं है, पुस्तकें नहीं हैं, जानकार नहीं हैं, इसलिये इसमें कठिनता दीखती है। वास्तवमें कठिनता नहीं है। कर्मयोग बहुत सुगम है, सरल है। करना चाहो तो सरल हो जायगा। कामनाके कारण पहले कठिनता मालूम देगी, पर कामना छूटनेपर सुगम हो जायगा। कर्मयोग बहुत ही विलक्षण चीज है।

गीताने बहुत ही अलौकिक बात बतायी है कि आप जहाँ हैं, जिस वर्णमें हैं, जिस आश्रममें हैं, जैसी परिस्थितिमें हैं, केवल उसीका सदुपयोग करना है। उसीसे मुक्ति हो जायगी! न कहीं जाना है, न वर्ण बदलना है, न आश्रम बदलना है, न सम्प्रदाय बदलना है, न देश बदलना है, न वेश बदलना है। बदलना है मनका भाव। केवल प्राप्त परिस्थितिका सदुपयोग करना है।