नाम-जप और सेवासे भगवत्प्राप्ति
पारमार्थिक साधनोंमें ‘क्रिया’ की प्रधानता नहीं है, प्रत्युत ‘भाव’ और ‘ज्ञान’ की प्रधानता है। क्रियाकी प्रधानता तो सांसारिक कार्योंमें है। भगवन्नामका जप क्रिया होते हुए भी भावको, ज्ञानको जाग्रत् करनेका विलक्षण साधन है। नाम-जपमें ‘भाव’ की प्रधानता है। भावकी कमी रहनेसे नाम-जप करते हुए भी विशेष लाभ नहीं होता। भावके विषयमें बहुत-सी बातें हैं। पहली बात यह है कि भगवान्के साथ अपनापन हो। अपनापन रखकर नाम-जप किया जाय तो उसका भगवान् पर असर पड़ता है। एक बालक माँ-माँ पुकारता है। यहाँ बैठी जिन बहनोंके बालक हैं, उन सभीका नाम माँ है, पर उस बालककी पुकार सुनकर वे सब नहीं दौड़तीं। जिसको वह माँ कहता है, वही उठकर दौड़ती है और उसको प्यारसे दुलारकर हृदयसे लगाती है। तात्पर्य है कि माँका होकर माँको पुकारा जाय तो उसका माँपर असर पड़ता है। खेलते समय भी बालक माँ-माँ कहता है। माँ देख लेती है कि वह खेलमें लगा हुआ है; अत: माँ-माँ कहनेपर भी माँपर इतना असर नहीं पड़ता।
नाम-जपकी खास विधि है—भगवान्का होकर भगवान्का नाम लें। केवल भगवान् ही हमारे हैं और हम भगवान्के ही हैं; संसार हमारा नहीं है और हम संसारके नहीं हैं—यह अगर पक्का विचार हो जाय तो तत्काल लाभ होता है। गोस्वामीजी महाराजने कहा है—
बिगरी जनम अनेक की सुधरै अबहीं आजु।
होहि राम को नाम जपु तुलसी तजि कुसमाजु॥
(दोहावली २२)
अनेक जन्मोंकी बिगड़ी हुई बात आज सुधर जाय और आज भी अभी-अभी, इसी क्षण सुधर जाय। कैसे सुधर जाय? तो कहते हैं कि तू रामजीका होकर रामजीको पुकार। परन्तु हमारेसे भूल यह होती है कि हम संसारके होकर भगवान्को पुकारते हैं। संसारके काम-धन्धोंके कारण वक्त नहीं मिलता, हम तो संसारी आदमी हैं, कलियुगी जीव हैं—इस प्रकार अपने-आपको संसारी और कलियुगी मानोगे तो आपपर संसारका और कलियुगका प्रभाव ज्यादा पड़ेगा; क्योंकि उनके साथ आपने सम्बन्ध जोड़ लिया। बिजलीके तारसे सम्बन्ध जुड़ जाता है तो करेण्ट आ जाता है, ऐसे ही संसार और कलियुगसे सम्बन्ध जोड़ेंगे तो उनका असर जरूर आयेगा। कहते हैं, महाराज! हम तो खाली राम-राम करते हैं, तो ठोस भरा हुआ क्यों नहीं करते भाई? मानो भगवान्के नाममें तो खालीपना है और सम्बन्ध हमारा संसार और कलियुगसे है! यह बहुत बड़ी गलती है।
वास्तवमें भगवान् ही हमारे हैं। जब हमने संसारमें जन्म नहीं लिया था, तब भी वे हमारे थे और जब मर जायँगे, तब भी वे हमारे रहेंगे। यह संसार पहले भी हमारा नहीं था, आगे भी हमारा नहीं रहेगा और अभी भी प्रतिक्षण हमारेसे अलग हो रहा है। उम्र भी बीतती चली जा रही है, शरीर भी बीतता चला जा रहा है और कलियुगका समय भी बीतता चला जा रहा है। संसारका सम्बन्ध आपके साथ है ही नहीं। इस बातको आप खयालमें रखें।
मैंने बहुत बार कहा है, अब भी कहता हूँ। जब आप बालक थे, तब अपनेको बालक कहते थे। परन्तु अब आप अपनेको बालक नहीं कहते। आपने कौन-सी तारीखको बालकपन छोड़ा? कोई भाई-बहन बता सकता है तो बताये! वास्तवमें आपने बालकपन छोड़ा नहीं, प्रत्युत वह अपने-आप छूट गया। जब बालकपन छूट गया तो क्या जवानी नहीं छूटेगी? वृद्धावस्था नहीं छूटेगी? छूटनेकी रीति है। जो निरन्तर छूटता चला जा रहा है, उसके साथ सम्बन्ध केवल आपका माना हुआ है, वास्तवमें सम्बन्ध है नहीं। परन्तु भगवान्के साथ आपका सम्बन्ध पहले भी था, अभी भी है और आगे भी रहेगा। यह सम्बन्ध टूटेगा नहीं कभी। दुष्कर्मोंके कारण चाहे चौरासी लाख योनियोंमें जाना पड़े, नरकोंमें जाना पड़े, तो भी आप भगवान्से अलग नहीं हो सकते और भगवान् आपसे अलग नहीं हो सकते। भगवान्के साथ अपने इस नित्य-सम्बन्धको तो आपने भुला दिया और संसारके साथ सम्बन्ध मानकर भगवन्नामका जप करते हैं, इसी कारण भगवन्नामका प्रभाव देखनेमें नहीं आ रहा है।
कुटुम्बका सम्बन्ध तो ‘नदी-नाव-संयोग’ की तरह है। नदीके इस पार सब एक साथ नौकापर बैठ जाते हैं और उस पार पहुँचते ही उतर जाते हैं। जबतक नदीसे पार नहीं होते, तभीतक हमारा सम्बन्ध रहता है। ऐसे ही कुटुम्बका सम्बन्ध है, जो आगे रहेगा नहीं, छूट जायगा। यह सच्ची बात है। अगर आप इस बातको मान लें कि ‘मैं शरीर-संसारका नहीं हूँ और शरीर-संसार मेरे नहीं हैं, मैं परमात्माका हूँ और परमात्मा मेरे हैं, मैं अपने परमात्माका नाम लेता हूँ’ तो भगवान्की ताकत नहीं कि वे आपकी तरफ कृपादृष्टिसे न देखें!
भगवान्के होकर भगवान्के नामका जप करो—‘होहि राम को नाम जपु।’ बच्चा माँके साथ जितना अधिक घनिष्ठ सम्बन्ध रखता है, माँ उतनी ही जल्दी उसके पास आती है। बालक जोरसे रो पड़ता है तो माँ अपनी बड़ी लड़कीको भेजती है कि बेटी! जा, भाईको समझा, राजी कर। वह आकर भाईके हाथमें झुनझुनियाँ देती है, पर वह उसे फेंक देता है। वह लड्डू देती है तो उसे भी फेंक देता है। बहन उसको गोदीमें लेती है तो वह लात मारता है और माँ-माँ करता है। तब माँको उसके पास आना ही पड़ता है। अगर वह झुनझुनियाँसे राजी हो जाय अथवा बहनकी गोदमें चला जाय तो फिर माँ उसके पास नहीं आती। बहनकी गोदमें माँका दूध थोड़े ही है वह प्यार थोड़े ही है! इस तरह नाम-जप करनेवालेका लोगोंमें आदर होता है कि वाह सा! ये तो भगतजी हैं, भजन करनेवाले हैं! बस, अब झुनझुना बजाओ बैठे! लोग आदर-सम्मान करने लगते हैं, दण्डवत् प्रणाम करते हैं, पूजन करते हैं, प्रशंसा करते हैं कि ये बड़े भारी महात्मा हैं। यह मायारूपी बहन आती है और गोदमें ले लेती है। उसमें राजी हो जाते हो तो फिर भगवान् नहीं आते। नामकी बिक्री करके उसके बदले आदर लेते हो, भेंट-नमस्कार लेते हो, सुख लेते हो तो बताओ। नामका संग्रह कैसे हो? सुख लेकर नामको खर्च कर रहे हो।
सन्तोंने कहा है—‘हरिया बन्दीवान ज्यूँ करिये कूक पुकार।’ कोई चारों तरफसे घिरा हुआ हो और वहाँसे निकलना चाहता हो तो वह जैसे पुकारता है—कोई छुड़ाओ! छुड़ाओ! ऐसे ही भीतरसे पुकार निकले—हे नाथ! मैं काम, क्रोध, लोभ, ममता, आसक्तिमें फँस गया हूँ, हे नाथ! मुझे इनसे छुड़ाओ! इस तरह आर्त होकर भगवान्को पुकारो।
आजतक नामकी जितनी महिमा लिखी गयी है, उतनी तो है ही, उसके अलावा भी बहुत अधिक बाकी बची है। परन्तु नाम सही ढंगसे न लेकर कहते हैं कि नामकी जितनी महिमा शास्त्रोंमें लिखी है, सुननेमें आती है, उतनी देखनेमें तो नहीं आती! देखनेमें आये कैसे? आपने उस ढंगसे नाम लिया ही नहीं। नाम लेनेका ढंग है—अनन्यभावसे नाम लेना कि केवल भगवान् ही मेरे हैं, भगवान्के सिवाय और कोई मेरा नहीं है। मैं केवल भगवान्का हूँ, भगवान्के सिवाय और किसीका मैं नहीं हूँ। माता-पिता, स्त्री-पुत्र आदिका मैं नहीं हूँ। वे मेरेको अपना मानते हैं तो मैं उनकी सेवा करनेके लिये हूँ। माता-पिताकी सेवा करो, स्त्री-पुत्रका पालन-पोषण करो, पर उनसे कुछ भी लेनेका भाव मत रखो। खूब तत्परतासे, न्यायसे उनकी प्रसन्नता लो, पर अपने-आपको फँसने मत दो। देनेसे आप फँसोगे नहीं, पर लेनेकी इच्छामात्रसे बँध जाओगे। सेवा करनेके लिये तो सब संसार हमारा है, पर लेनेके लिये संसार हमारा है ही नहीं। बढ़िया बात तो यह है कि भगवान्से भी कुछ लेनेके लिये हमें नाम नहीं लेना है। पापोंका नाश करनेके लिये भी नाम नहीं लेना है। नाम इसलिये लेना है कि भगवान् हमें स्वीकार कर लें, हम केवल भगवान्के रहें, भगवान्को कभी भूलें नहीं। किसी भक्तने कहा है—
दिवि वा भुवि वा ममास्तु वासो
नरके वा नरकान्तक प्रकामम्।
अवधीरितशारदारविन्दौ
चरणौ ते मरणेऽपि चिन्तयामि॥
‘हे नरकासुरका अन्त करनेवाले प्रभो! आप चाहे मेरा स्वर्गमें निवास कर दें, चाहे पृथ्वीपर निवास कर दें और चाहे नरकोंमें निवास कर दें। इसके लिये मैं मना नहीं करता। मेरी तो एक ही माँग है कि शरद-ऋतुके कमलकी शोभाको हरनेवाले आपके जो चरण हैं, उनको मृत्यु-अवस्थामें भी भूलूँ नहीं। आपके चरण मेरेको सदा याद रहें।’
मज्जन्मन: फलमिदं मधुकैटभारे
मत्प्रार्थनीयमदनुग्रह एष एव।
त्वद्भृत्यभृत्यपरिचारकभृत्यभृत्य-
भृत्यस्य भृत्य इति मां स्मर लोकनाथ॥
(गर्गसंहिता, अश्वमेध ५०।३३)
‘मेरे जन्मका फल यही है, मेरी प्रार्थनाका भी एक ही विषय है और आपकी कृपा भी मैं इसीमें मानता हूँ कि आप अपने दासोंके दास, उन दासोंके नौकरोंका नौकर और उन नौकरोंके गुलामोंका गुलाम तथा उनका भी गुलाम—इस तरह अपने दासोंकी परम्परामें सातवीं जगह भी मेरेको याद कर लें।’
एक बड़ी मार्मिक बात है, कृपया ध्यान दें। भगवान्से हमें कुछ नहीं लेना है। भगवान्ने तो कृपा करके मानव-शरीर दे दिया, अब और क्या चाहते हो उनसे?
कबहुँक करि करुना नर देही।
देत ईस बिनु हेतु सनेही॥
(मानस, उत्तर० ४४। ६)
प्रभुने कम कृपा नहीं की है। देवताओंके लिये भी दुर्लभ शरीर दे दिया। इसके साथ ही यत्किंचित् पारमार्थिक रुचि हो गयी, यह कोई मामूली चीज नहीं है। हजारों-लाखों आदमियोंके भीतर भी भगवान्की तरफ रुचि नहीं है, पर वह रुचि हमारेमें हो गयी—यह विलक्षण बात है। भगवान्के दरबारमें सबसे दुर्लभ और बढ़िया-से-बढ़िया चीज है—भगवान्के प्यारे भक्त! भगवान् कहते हैं—
साधवो हृदयं मह्यं साधूनां हृदयं त्वहम्।
मदन्यत् ते न जानन्ति नाहं तेभ्यो मनागपि॥
(श्रीमद्भागवत ९। ४। ६८)
‘सन्त मेरे हृदय हैं और मैं उन सन्तोंका हृदय हूँ। वे मेरे सिवाय और कुछ नहीं जानते तथा मैं भी उनके सिवाय और कुछ नहीं जानता।’
ऐसे भगवान्के प्यारे सन्तोंकी वाणी, उनका संग, उनका इतिहास हमारेको मिल जाय तो यह भगवान्की कम कृपा है क्या? हनुमान्जी लंकामें विभीषणजीसे मिलते हैं तो वहाँ विभीषणजी कहते हैं—
अब मोहि भा भरोस हनुमंता।
बिनु हरिकृपा मिलहिं नहिं संता॥
(मानस, सुन्दर० ७। ४)
हनुमान्जी! अब मुझे भरोसा हो गया कि भगवान् मेरेपर कृपा करेंगे। आप मिल गये, इससे यह मालूम देता है कि भगवान् भी मिलेंगे! भगवान्ने अपने दरबारकी बढ़िया-से-बढ़िया चीज दे दी है, फिर भी भगवान्से माँगते हैं कि वह दो, अमुक चीज दो! आप समझते ही नहीं कि भगवान्से क्या माँगा जाय। भगवान्की दी हुई वस्तुका मूल्य भी नहीं आँक सकते।
एक मार्मिक बात बताता हूँ। सज्जनो! आपसे भगवान् भी मिले, भगवान्के अभावकी पूर्ति भी आपसे हो—ऐसी विलक्षण योग्यता, अधिकार भगवान्ने आपको दिया है! आपने संसारमें जितनी ममता कर ली, उतनी भगवान्के साथ आत्मीयता छूट गयी अर्थात् उतना भगवान्में अभाव आ गया! किसी माँका बालक दूसरेकी माँकी गोदमें चला जाय और अपनी माँकी गोदमें न आये, माँको याद ही न करे, पसन्द ही न करे, तो क्या माँ खुश होगी? ऐसे ही हम भगवान्को छोड़कर संसारमें लग गये हैं। अगर हम भगवान्में लग जायँ, भगवान्के सम्मुख हो जायँ तो भगवान् निहाल हो जायँगे। हमारी भगवान्में श्रद्धा नहीं है, प्रेम नहीं है, अपनापन नहीं है तो उतना भगवान्में अभाव आ गया। हम भगवान्में श्रद्धा, प्रेम, अपनापन करते हैं तो उस अभावकी पूर्ति हो जाती है। इस प्रकार भगवान्के भी अभावकी पूर्ति करनेकी योग्यतावाले मनुष्य-शरीरको पाकर भी हम नाशवान् पदार्थोंके पीछे-पीछे दौड़ते हैं, जो हमारी कदर करते ही नहीं!
आप रुपयोंके पीछे-पीछे दौड़ते हैं, पर रुपयोंने कभी कहा कि हम तुम्हारे हैं, तुम हमारे हो? घर, जमीन, जायदाद, रुपये, कपड़े, गहने आदिको आप मेरा-मेरा कहते हैं, पर क्या उन्होंने कभी कहा कि हम तुम्हारे हैं, तुम हमारे हो? उलटे वे आपको छिटका रहे हैं, आपको छोड़कर जा रहे हैं। कुटुम्बी भी जा रहे हैं। कपड़े, गहने भी जा रहे हैं, फट रहे हैं, नष्ट हो रहे हैं। फिर भी आप ‘हाय रुपया, हाय रुपया’ करते हैं, यह कोई मनुष्यपना है? रुपयोंके लिये झूठ, कपट, बेईमानी, पाप, अन्याय करते हुए भी डरते नहीं। रुपयोंका अच्छे काममें उपयोग भी नहीं कर सकते। चाहे भगवान्से विमुख हो जायँ, धर्म-कर्म सब डूब जाय, पर किसी तरहसे कहींसे रुपये ले लें। बुरे कर्मसे भी किसी तरहसे कमा लें और खा लें, बस। यह कोई दशा है? आप जरा सोचें। हृदयसे तो रुपयोंको चाहते हैं, पर ऊपरसे भगवान्का नाम लेते हैं!
ऊपर मीठी बात, कतरनी काँखमें।
आग बुझी मत जान, दबी है राखमें॥
भीतरमें आग बुझी नहीं है। कपट, जालसाजी, ठगी धोखेबाजी करके किसी तरहसे दूसरेको चूस लें—ऐसी लूट-खसोट मची है मनमें। कहते हैं कि नाम-जपसे लाभ दीखता नहीं! दीखे कैसे? मनमें तो महान् कूड़ा-कचरा भरा हुआ है।
मीराबाई इतनी ऊँची हो गयी, उसका कारण क्या था? ‘मेरे तो गिरधर गोपाल दूसरो न कोई’मेरे तो केवल भगवान् हैं, बस। और कोई मेरा है ही नहीं। इस प्रकार भगवान्के साथ अनन्य सम्बन्ध हो। यह अनन्यभाव ही भगवान्को पकड़ता है, क्रिया नहीं पकड़ती। पदार्थोंसे और क्रियाओंसे आप भगवान्को खरीदना चाहोगे तो यह नहीं होगा। भगवान्में अपनापन करो तो भगवान् चूँ नहीं कर सकते, जा नहीं सकते।
मैं भगवान्का हूँ और भगवान् मेरे हैं, फिर वे आये क्यों नहीं? अभीतक भगवान् मिले क्यों नहीं? अभीतक भगवान्ने दर्शन क्यों नहीं दिये? ऐसी व्याकुलता होनेपर जब संसारसे सर्वथा सम्बन्ध-विच्छेद हो जाता है, तब भगवत्प्राप्ति हो जाती है। संसारके साथ सम्बन्ध केवल संसारकी सेवा करनेके लिये है। कुटुम्बमें रहते हुए केवल कुटुम्बियोंकी सेवा करनी है, उनसे कोई वस्तु, सेवा लेनेकी आशा मनमें रखनी ही नहीं है।
संसारमें हमारा जन्म ऋणानुबन्धसे हुआ है। मैंने राजस्थानी भाषामें सुना है, कोई दु:ख देता है तो कहते हैं ‘काला चाबिया है इसका’ अर्थात् इसका तिल खाया है, इसका हमारेपर कोई बदला है, उसको यह लेगा। संसारके जितने सम्बन्धी हैं, सबका बदला आपपर है। वह बदला चुकाना है। अगर मुक्ति चाहते हो तो कम-से-कम पुराना ऋण तो चुकाओ, नया ऋण क्यों लेते हो बाबा? संसारकी सेवा करो, पर संसारसे कुछ चाहो मत। ‘आशा हि परमं दु:खं नैराश्यं परमं सुखम्।’ (श्रीमद्भागवत ११। ८। ४४) संसारसे आशा रखनेमें महान् दु:ख है और संसारसे निराश होनेमें महान् सुख है! माता-पिता, स्त्री-पुत्र, भाई-भौजाई, सब हमारे अनुकूल चलें, हमारा काम करें—इस प्रकार केवल लेने-ही-लेनेके लिये सम्बन्ध मानना आसुरी स्वभाव है।
भगवान् राजी कैसे हों? भगवान्से भी कुछ नहीं लेना है, प्रत्युत देना है। जैसे बच्चा माँसे दूर चला जाय तो माँको उसकी बहुत याद आती है। माताओंकी ऐसी बातें मैंने सुनी हैं। दीपावली, अक्षय तृतीया आदि त्यौहार आते हैं तो माताएँ कहती हैं कि क्या बनायें? लड़का तो घरपर है नहीं, अच्छी चीज बनाकर किसको खिलायें? लड़का घरपर होता है तो माताएँ बढ़िया-बढ़िया चीजें बनाती हैं और लड़केको खिलाकर खुश होती हैं। ऐसे ही भगवान्के लड़के हमलोग चले गये विदेशमें! अब भगवान् कहते हैं कि क्या करूँ? क्या दूँ? लड़का तो घरपर ही नहीं है! वह तो धन-सम्पत्तिकी तरफ लगा हुआ है, खेल-कूदमें लगा हुआ है!
सनमुख होइ जीव मोहि जबहीं।
जन्म कोटि अघ नासहिं तबहीं॥
(मानस, सुन्दर० ४४। २)
परन्तु आज सम्मुख हो रहे हैं रुपये-पैसोंके, वस्तुओंके, कुटुम्बके, आरामके, मान-आदरके, स्वाद-शौकीनीके!
जो संसारसे आशा रखता है और भगवान्का भजन भी करता है, वह भजन नहीं करनेवालेकी अपेक्षा तो अच्छा ही है। किसी तरहसे भगवान्में मन लग जाय तो बड़ा अच्छा है—‘तस्मात् केनाप्युपायेन मन: कृष्णे निवेशयेत्’ (श्रीमद्भागवत ७। १। ३१)। परन्तु यदि आप नाम-जपका माहात्म्य तत्काल देखना चाहते हैं तो वह तभी देखनेमें आयेगा, जब आप सच्चे हृदयसे भगवान्में लग जायँगे। जिन लोगोंने भजन किया है, उन लोगोंमें विलक्षणता आयी है। हमने ऐसे कई देखे हैं कि नाम-जपसे पहले उनकी क्या अवस्था थी और नाम-जपमें लगनेके बाद उनकी क्या अवस्था हो गयी! परन्तु वे लगनसे जपते थे।
जब मैं पढ़ता था, उन दिनोंकी बात है। रात्रिके दस बजेतक पाठ वगैरह होता था। एक दिन रात्रिके दस बजेके बाद मैं बाहर गया। जंगलमें एक सरोवर था, उसके किनारेपर एक साधु बैठे थे, जो हमारे परिचित थे। वे राम-राम कह रहे थे और रो रहे थे। बात क्या है? भगवद्भजनके बिना मेरे बहुत-से दिन खाली चले गये, अब क्या करूँ? वह गया हुआ समय सार्थक कैसे बने? ऐसे विचारसे उनके आँसू टपक रहे थे। जो समय हाथसे चला गया, वह पीछे नहीं आयेगा। आज साक्षात् भगवान् मिल जायँ तो भी गये हुए समयकी पूर्ति नहीं होगी! अगर समय खाली न जाता तो भगवान् पहले ही मिल जाते, इतने दिन हम भगवान्के वियोगमें न रहते!
एक भी स्वास खाली खोय न खलक बीच,
कीचड़ कलंक अंक धोय ले तो धोय ले।
उर अँधियारो पाप पुंज सु भरो यो देख,
ज्ञान की चिरागां चित्त जोय ले तो जोय ले।
मिनखा जनम फिर ऐसो न मिलेगो मूढ़,
परम प्रभू से प्यारो होय ले तो होय ले।
यह छिनभंगु देह तामे जन्म सुधारबो है,
बिजली के झपाके मोती पोय ले तो पोय ले॥
जब बिजलीका प्रकाश होता है, उस समय मोती पिरो ले, नहीं तो फिर अँधेरा हो जायगा। ऐसे ही इस मनुष्य-शरीरके रहते-रहते भजन कर ले, भगवान्को प्राप्त कर ले। यह मौका फिर नहीं मिलेगा! ‘का बरषा सब कृषी सुखानें। समय चुकें पुनि का पछितानें॥’ (मानस, बाल० २६१।३)। अभी समय है सभी तरफसे मन हटा लो। सब सम्बन्ध टूटनेवाले हैं। कोई भी सम्बन्ध रहनेवाला नहीं है। अगर आप छोड़ दोगे तो निहाल हो जाओगे। छूटनेवालेको ही छोड़ना है, इसमें नयी बात क्या करनी है? छूटनेवालेसे मनसे दूर हो जाओ। दूर होनेका मतलब है—उसकी सेवा करो, पर उससे चाहना मत करो। इससे घरवाले भी नाराज नहीं होंगे; क्योंकि वे सेवा ही चाहते हैं। उनसे सेवा लो मत, तो वे और ज्यादा राजी होंगे।
केवल सेवा-ही-सेवा करें तो दुनिया राजी हो जाय, आप निहाल हो जायँ और भगवान् मिल जायँ। दुनियासे चाहना रखोगे तो वह नाराज हो जायगी। वह आपको देगी भी, तो दु:ख पाकर देगी कि क्या करें, आफत आ गयी! परन्तु चाह नहीं रखोगे तो दुनिया गरज करके देगी। जो वास्तवमें भीतरसे चाहरहित हैं, उन सन्तोंकी सेवा करती है दुनिया। सेवा करनेवाले कहते हैं कि महाराजने मेरी चीज स्वीकार कर ली, आज तो हम निहाल हो गये! लेनेवालेके हृदयमें गरज नहीं होगी तो देनेवाला देकर निहाल हो जायगा। परन्तु यदि आपके हृदयमें गरज होगी तो दूसरेको देनेपर भी वह राजी नहीं होगा। वह उलटे सोचेगा कि यह ठग है, देता है तो पता नहीं भीतर क्या कूड़ा-करकट भरा पड़ा है! इसलिये हृदयमें संसारके प्रति उदार भाव रखो।
संसारसे मिली हुई चीज बिलकुल संसारकी है। शरीर माँ-बापसे मिला है, विद्या गुरुजनोंसे मिली है। हमने संसारसे लिया-ही-लिया है। अब तो कृपा करके देना शुरू करो। देना सीखो तो सही! देनेसे घाटा नहीं पड़ेगा। केवल भाव उदारताका बन जाय। जैसे शिकारी देखता है कि मेरी बन्दूकके सामने शिकार आ जाय, ऐसे ही आप देखते हैं कि कोई मेरे सामने आ जाय, मेरे कब्जेमें आ जाय तो किसी तरहसे उससे ले लूँ! दशा तो ऐसी है और कहते हैं कि लाभ नहीं हुआ। लाभ क्या होगा, उलटे पतन होगा! खर्चा जितना आज करते हो, उतना ही करो, ज्यादा खर्चा मत करो, पर भाव बिलकुल बदल दो कि हमें लेना ही नहीं है, देना-ही-देना है। हमें तो सेवा करनी है। सुगमतासे जितना खर्च कर सको, उतना खर्च करना है, पर ‘हमें किसीसे कुछ नहीं लेना है, यह भाव बना लो। फिर देखो, जीवन सुधरता है कि नहीं जीवन निर्मल बन जायगा। लोग राजी हो जायँगे। भगवान् राजी हो जायँगे। आप प्रसन्न हो जाओगे, मस्त हो जाओगे।
सेवा करनेवाला कभी दु:खी नहीं होता। लेनेवाला सदा दु:खी होता है। उसको मिले तो भी वह राजी नहीं होगा कि थोड़ा मिला है! ज्यादा मिले तो उसको अभिमान आ जायगा। दु:ख और आसुरी-सम्पत्ति उसके पास रहेगी; क्योंकि जड पदार्थ लेनेकी इच्छा है। इसलिये कहा है—‘देनेको टुकड़ा भला, लेनेको हरि नाम।’ एक साधुको मैंने देखा। एकान्तमें बैठकर नाम-जप कर रहे थे और आँखोंसे टप-टप आँसू बह रहे थे। मकानमें एक छोटी खिड़की थी, वह भी बन्द कर दी थी, जिससे न तो उनपर दूसरेकी दृष्टि पड़े और न उनकी दृष्टि दूसरेपर पड़े। रातमें उनको नींद नहीं आती थी। इस तरह लगनपूर्वक कोई नाम-जप करे तो उसको लाभ क्यों नहीं होगा? आप करके देखो। भूख तो पेटमें है, पर हलवा पीठपर बाँध दिया और कहते हैं कि तृप्ति नहीं हुई! उसको खाकर देखो कि तृप्ति होती है या नहीं।
तेरे भावैं जो करौ, भलौ बुरौ संसार।
‘नारायण’ तू बैठिके, अपनौ भुवन बुहार॥
—इस तरह अनन्यभावसे नाम-जपमें लग जाओ। गृहस्थमें रहते हुए सेवा करो। बहनों-माताओंको चाहिये कि वे आपसमें सेवा करें। चाहे देवरानी हो या जेठानी, सास हो या ननद, चाहे बहू ही हो, उसकी सेवा करो। जैसे कोई पुजारी सेवा करनेके लिये बाजारसे भगवान्की मूर्ति लाता है तो वह यह नहीं सोचता कि इस मूर्तिसे घरका काम-धन्धा करायेंगे। ऐसे ही बेटेका विवाह किया है तो एक मूर्ति आयी है, अब उसकी सेवा करनी है। साधुओंको तो मूर्ति कहते ही हैं; जैसे पूछते हैं—कितनी मूर्ति है? मतलब यह है कि इन मूर्तियोंकी सेवा करनी है, सेवाके सिवाय ये कुछ कामकी नहीं! कोई जन्म गया तो ठाकुरजीके यहाँसे आया है, उसकी सेवा करो। सेवा करनेके लिये ही आपका सम्बन्ध है।
मेला महोत्सवोंमें सेवा-समितिवाले जाते हैं। कोई बीमार हो जाय तो वे उसको कैम्पमें लाते हैं, दवाई देते हैं, उसकी सेवा करते हैं और यदि वह मर जाय तो जला देते हैं। अब रोये कौन? ऐसे ही आप सबके साथ केवल सेवाका सम्बन्ध रखो तो आपका रोना बन्द हो जाय, चिन्ता बन्द हो जाय, शोक बन्द हो जाय। सबको सुख-आराम दो, सबका मान-आदर करो और परिश्रम खुद करो। आपका गृहस्थ सुखदायी हो जायगा। अगर सुख देने-ही-देनेकी इच्छा रहे तो सुख हो जायगा और लेने-ही-लेनेकी इच्छा रहे तो सुख कम हो जायगा। आज रुपये कम क्यों हो गये? संख्या तो घटी नहीं, फिर कम कैसे हो गये? जिसके पास रुपये आये, उसीने दबा लिये, इसलिये रुपये कम हो गये। कुछ वर्ष पहले रेजगारी (खुले पैसे) बहुत कम हो गयी थी। कारण कि एक-एक आदमीके पास बीस, पचास, सौ-सौ रुपयोंकी रेजगारी इकट्ठी की हुई होनेसे बाजारमें कहाँसे मिले? जिसके हाथ जितनी लगी, इकट्ठी कर ली। ऐसे ही अभी जो सुख मिलता नहीं है, उसका कारण यह है कि सभी सुख लेनेमें लगे हुए हैं, खाऊँ-खाऊँ कर रहे हैं। अगर सब एक-दूसरेको सुख देने लग जायँ तो सुख बहुत हो जायगा।
घरमें रहते हुए घरके सब प्राणियोंकी सेवा करो। छोटे, बड़े, समान अवस्थावाले—सबको सुख-आराम कैसे पहुँचे? उनका आदर कैसे हो? यह भाव हरदम बना रहे। कई माताएँ सेवा करके फिर कहती हैं कि मैं इतनी सेवा करती हूँ, मेरा सुख तो गया धूलमें! सुख धूलमें गया तो बहुत अच्छी बात है, खेती हो जायगी! धूलमें बीज मिल जाय तो खेती हो जाती है। आप सेवा करते हैं, पर कोई आपका गुण नहीं गाता, आशीष नहीं देता तो यह बहुत ही बढ़िया चीज है। आपकी सेवा जमा हो जायगी। दूसरे वाह-वाह करेंगे तो आपकी सेवा खत्म (खर्च) हो जायगी। कुछ पानेकी इच्छासे सेवा करोगे तो सेवाकी बिक्री हो जायगी।
गृहस्थाश्रम उद्धार करनेके लिये है, फँसनेके लिये नहीं। सेवा करना उद्धारके लिये है और सेवा लेना फँसनेके लिये है। आप चाहते हो कि सब घरवाले मेरे अनुकूल बन जायँ तो यह पतनका, फँसनेका बढ़िया रास्ता है। जलमें जाकर दोनों हाथोंसे जल लोगे तो एकदम जलके भीतर चले जाओगे, डूब जाओगे। परन्तु दोनों हाथोंसे, लातोंसे जलको धक्का दोगे तो तैरकर पार हो जाओगे। ऐसे ही इस संसार-समुद्रमें लेनेकी इच्छा करोगे तो डूब जाओगे और देनेकी इच्छा करोगे तो पार हो जाओगे। हम सब यहाँ लेनेके लिये नहीं आये हैं, सेवा करनेके लिये आये हैं। इसलिये गृहस्थाश्रममें रहते हुए सबकी सेवा करो, सबका हित करो। प्राणिमात्रके हितमें जिनकी प्रीति हो जाती है, वे भगवान्को प्राप्त हो जाते हैं—‘ते प्राप्नुवन्ति मामेव सर्वभूतहिते रता:’ (गीता १२। ४)। नहीं तो बैठकर संसारके झुनझुनेसे खेलो! उससे क्या मिलेगा? माँका प्यार, माँका दूध तो तब मिलेगा, जब आप झुनझुनेको, सीटी, पी-पीको फेंक दोगे, माँके बिना रह नहीं सकोगे।
मनुष्यको भगवान्ने मध्यलोकमें बनाया है, जिससे यह ऊँचे लोकोंकी भी सेवा करे, नीचेके लोकोंकी भी सेवा करे और इस लोककी भी सेवा करे। इतना ही नहीं, यह भगवान्की भी सेवा करे! भगवान् भी मनुष्यसे आशा रखते हैं। कुटुम्बी भी आशा रखते हैं। इनकी सेवा करो और स्वयं नाम-जप करो। दूसरोंसे भी नाम-जप करनेके लिये कहो—‘स्मरन्त: स्मारयन्त:’, ‘रामनामकी लूट है, लूट सके तो लूट!, भगवान्का नाम मीठा लगे, प्यारा लगे। प्यारा न लगे तो भगवान्से कहो कि ‘हे नाथ! मुझे आपका नाम प्यारा लगे, हे प्रभु! मैं आपको भूलूँ नहीं।’ मिनट-मिनटमें, आधे-आधे मिनटमें कहते रहो कि ‘हे नाथ! आपको भूलूँ नहीं।,
‘भूले नाहिं बने कृपानिधि भूले नाहिं बने’
‘विस्मर्यते कृतविदा कथमार्तबन्धो’ (श्रीमद्भा० ४।९।८)
भगवान्की कृपाको जाननेवाला कोई भी पुरुष भगवान्को कैसे भूल सकता है? भगवान्ने कितनी विचित्र कृपा की है! सब अंग दिये हैं, मन दिया है, बुद्धि दी है, अच्छे घरमें जन्म दिया है। अच्छी जगह पले हो, अच्छे संस्कारमें आये हो, भगवान्को मानते हो, सत्संगमें जाते हो। कितना सुन्दर अवसर दिया है! अब थोड़ा-सा और करो तो निहाल हो जाओ!
जिन जीवोंको भगवान्ने मनुष्य-शरीर दिया है, उन जीवोंको भगवान्ने अपने पास आनेका निमन्त्रण दे दिया है! जैसे ब्राह्मणको, साधुको कोई निमन्त्रण देकर अपने घर ले जाय, आसन देकर बैठा दे, सामने पत्तल और जल रख दे, तो फिर यह सोचनेकी जरूरत नहीं है कि वह अन्न देगा कि नहीं देगा? अगर वह अन्न नहीं देगा तो उसने निमन्त्रण क्यों दिया है? जब सब सामग्री दी है तो अन्न भी देगा। ऐसे ही भगवान्ने मनुष्य-शरीर दे दिया, अच्छी रुचि दे दी, अच्छा संग दे दिया, तो क्या अपनी प्राप्ति नहीं करायेंगे? वे तो तैयार हैं कि आओ, खूब मौजसे भोजन करो और सदाके लिये तृप्त हो जाओ! इसलिये भगवत्प्राप्तिकी चिन्ता न करके नाम-जप करो, संसारकी सेवा करो और आशा मत रखो। संसार आपसे सुखकी आशा रखता है। जो आपसे सुख चाहता है, उससे आप भी सुख चाहोगे तो दो ठगोंमें ठगाई कैसे होगी? आपके मनमें है कि भाई-बन्धु, माँ-बापसे मैं ले लूँ और वे चाहते हैं कि आपसे ले लें। दोनों ठग हुए। दोनों ठगे जायँगे और मिलेगा कुछ नहीं। जैसे भूखेको अन्न देनेका और प्यासेको जल पिलानेका बड़ा माहात्म्य है, ऐसे ही सेवा चाहनेवालोंकी सेवा करनेका बड़ा माहात्म्य है!
बहनोंको चाहिये कि ससुरालमें रहें तो सबकी सेवा करें। अपने पिताके घरमें रहें तो सबकी सेवा करें। मनमें यह भाव रखें कि मैं दूसरे घर चली जाऊँगी तो वहाँ इनकी—माता, पिता, चाचा, ताऊ, मामा, भाई, भौजाई आदिकी सेवा कहाँ मिलेगी? माता-पितासे शरीर मिला है, उन्होंने मेरा पालन-पोषण किया है। इतने कुटुम्बियोंसे मैंने लिया-ही-लिया है तो वापस कब दूँगी? इसलिये बहनोंको चाहिये कि लड़कपनसे ही सेवा शुरू कर दें। पीहरसे लेना-ही-लेना किया तो सेवा कब करोगी? वे तो फिर भी उम्रभर देंगे। ससुरालमें अधिकार मिल गया तो अब वहाँ भी सबकी सेवा करो, सबको सुख पहुँचाओ। फिर देखो, आपका गृहस्थ भी शान्तिदायक हो जायगा और भगवान्की प्राप्ति भी हो जायगी।
केवल भाव बदल दो कि मैं तो सेवा करनेके लिये हूँ। रोजाना सुबह और शाम बड़ोंके चरणोंमें प्रणाम करो। काम-धन्धा खुद करो और सुख-आराम दूसरोंको दो। निन्दा, तिरस्कार, उलाहना, अपमान अगर मिलते हों तो खुद ले लो और मान-बड़ाई, आदर-सत्कार दूसरोंको दो। फिर आप देखो, कितना आनन्द होता है! कौटुम्बिक स्नेह भी हो जायगा और भजन भी हो जायगा। भजनका लाभ भी दीखेगा। संसारकी आशा रखोगे तो लाभ नहीं दीखेगा। रुपये मिल जायँ, आराम मिल जाय तो आपको यह लाभ दीखता है। इसके लिये आप रात-दिन दौड़ते रहते हैं। वह तो जितना मिलना है, उतना ही मिलेगा। नहीं मिलना है तो नहीं मिलेगा। परन्तु भगवान्का भजन असली धन है, जो करनेसे ही मिलेगा। नहीं करोगे तो नहीं मिलेगा। अत: इस असली धनका संग्रह करो।