सदुपयोगसे कल्याण
मनुष्योंने वस्तुओंको, व्यक्तियोंको, परिस्थितियोंको बड़ा महत्त्व दे दिया है; परन्तु वास्तवमें इनका महत्त्व नहीं है। महत्त्व इनके उपयोगका है। इनका सदुपयोग और दुरुपयोग दोनों हो सकते हैं। अगर सदुपयोग किया जाय तो हरेक देश, काल, वस्तु व्यक्ति, घटना परिस्थिति आदि मनुष्यका कल्याण करनेवाली हो जाती है। सदुपयोग या दुरुपयोग करनेमें मनुष्य स्वतन्त्र है। परिस्थिति आदिको अपने अनुकूल बनानेमें कोई भी स्वतन्त्र नहीं है।
प्राय: मनुष्य वस्तुओंको ही ज्यादा महत्त्व देते हैं, उनके सदुपयोगकी तरफ ध्यान नहीं देते। इस कारण वे परतन्त्र हो जाते हैं, फँस जाते हैं। उनके सामने ‘क्या करें? कैसे करें?’—ऐसी विकट परिस्थिति आ जाती है। इससे बचनेके लिये इस बातको सीखनेकी आवश्यकता है कि उनका सदुपयोग कैसे किया जाय? परिस्थितियाँ तो मनुष्यके सामने आती-जाती रहती हैं, बदलती रहती हैं। न तो कोई परिस्थिति एक समान रहती है, न वस्तुएँ एक समान रहती हैं, न व्यक्ति एक समान रहते हैं, न अवस्था एक समान रहती है। ये सब बदलते रहते हैं। अगर इन बदलनेवालोंका अच्छे-से-अच्छा उपयोग किया जाय तो ये सब कल्याण करनेवाले हो जायँगे।
सबसे पहले एक बात समझनेकी है। आप और आपकी परिस्थिति, आप और आपकी वस्तु, आप और आपकी अवस्था, आप और आपका समुदाय, आप और आपका देश, आप और आपका समय—ये दोनों अलग-अलग हैं। तात्पर्य है कि उत्पन्न और नष्ट होनेवाली जितनी भी चीजें हैं, वे सब प्रकृतिकी अंश हैं और आप परमात्माके अंश हैं। आप नित्य-निरन्तर रहनेवाले हैं। परन्तु प्रकृतिसे उत्पन्न चीजें नित्य-निरन्तर बदलनेवाली हैं, कभी एक क्षण भी एकरूप रहनेवाली नहीं हैं। इनका संयोग और वियोग हरदम होता रहता है। नदीके प्रवाहकी तरह इनका प्रवाह हरदम चलता रहता है।
आप रहनेवाले हैं—‘नित्य: सर्वगत: स्थाणुरचलोऽयं सनातन:’ (गीता २। २४)। आप अनादिकालसे अचल हैं और ये सब (शरीर-संसार) चल हैं। चल वस्तुओंको लेकर अचलपर असर क्यों पड़ जाता है? क्योंकि चल वस्तुओंके साथ अचल अपना सम्बन्ध जोड़ लेता है। शरीर और शरीरमें रहनेवाले आप—ये दो हैं। आप शरीर नहीं हैं और शरीर आपका नहीं है। परन्तु गलती यह हुई कि आपने शरीरमें अहंता-ममता कर ली। अपनेको शरीरमें बैठा दिया तो ‘अहंता’ पैदा हो गयी और शरीर आदि वस्तुओंको अपनेमें बैठा लिया तो ‘ममता’ पैदा हो गयी। मैं शरीर हूँ—ऐसा मान लेनेसे अहंता पैदा हो जाती है और शरीर आदि वस्तुएँ मेरी हैं—ऐसा मान लेनेसे ममता पैदा हो जाती है। अहंताको लेकर भेदभाव होता है और ममताको लेकर संघर्ष होता है। ये दोनों ही बन्धनकारक हैं।
सन्त-महात्माओंने मैं-मेरीका त्याग करनेके लिये कहा है। वस्तुओंका त्याग तो स्वत: ही हो रहा है। संसारकी मात्र वस्तुएँ प्रतिक्षण आपसे विमुक्त हो रही है। यह बात बहुत खयाल करनेकी, जाननेकी, समझनेकी है। मेरे मनमें तो ऐसी बात आती है कि रोजाना ही इस बातको कह लें, सुन लें और रोजाना विचार करें। यह दृश्यमात्र अदृश्य होनेवाला है। यह दर्शन अदर्शनमें भर्ती हो रहा है। सब-का-सब संसार मौतकी तरफ जा रहा है, प्रलयकी तरफ जा रहा है। सम्पूर्ण सृष्टि महाप्रलयकी तरफ जा रही है। जितने दिन व्यतीत होते हैं, उतने ही हम मौतके नजदीक जाते हैं। एक दिन कुछ भी नहीं रहेगा और वह दिन भी नजदीक आ रहा है! जितने भी शरीर हैं, सब-के-सब प्रतिक्षण मरनेकी तरफ जा रहे हैं। दूसरा कोई काम होगा कि नहीं होगा—इसमें सन्देह है, पर मरना होगा कि नहीं होगा—इसमें कोई सन्देह, विकल्प नहीं है। भविष्यकी बात कोई नहीं कह सकता कि क्या होगा, कैसे होगा, होगा कि नहीं होगा; परन्तु ‘मरना होगा’—यह बात बिलकुल नि:शंक, निधड़क होकर कही जा सकती है।
बन्धन क्या है? न बदलनेवालेने बदलनेवालेके साथ एकता मान ली—यही बन्धन है। अगर कोई विवेकी पुरुष बदलनेवाले और न बदलनेवालेको अलग-अलग देख ले अर्थात् बदलनेवाला मेरा स्वरूप नहीं है, मेरा स्वरूप तो न बदलनेवाला है—ऐसा अनुभव कर ले तो आज ही मुक्त हो जाय। इस बातका ठीक-ठीक ज्ञान होना चाहिये। केवल सीखना नहीं है। पुस्तकोंसे हम सीख सकते हैं, सीखकर पण्डित कहला सकते हैं, पर वास्तवमें सीखनेवाला पण्डित नहीं होता, ठीक-ठीक जाननेवाला ही पण्डित होता है। सीखनेसे काम नहीं बनेगा। सीखनेवाला तोतेकी तरह होता है। तोतेको सिखा दो तो वह ‘राधेकृष्ण-गोपीकृष्ण’ बोलना सीख जायगा और जब बुलवाओगे, तब बोल देगा। परन्तु जब कोई बिल्ली मारने आयेगी, तब वह ‘टें-टें’ करने लगेगा। अरे, अब तो ‘राधेकृष्ण-गोपीकृष्ण’ बोल, अन्तसमयमें भगवान्का नाम ले, जिससे उद्धार हो जाय! पर वह समझता ही नहीं कि भगवान्का नाम क्या होता है?
सीखा हुआ भी भगवान्का नाम आ जाय तो कल्याण हो जाता है। ऐसी कथाएँ पुराणोंमें आती हैं। ‘गोविन्दनामग्रहणमशेषाघहरं विदु:’—किसी कारणसे अन्तसमयमें भगवान्का नाम आ जाय तो सब पाप नष्ट हो जाते हैं। एक वेश्या अपने तोतेको ‘राधेकृष्ण-गोपीकृष्ण’ बोलना सिखा रही थी कि अचानक साँपने आकर काट लिया। वह ‘राधेकृष्ण-गोपीकृष्ण’ कहती रही और उसका उद्धार हो गया। सन्तोंकी वाणीमें भी ऐसी कई कथाएँ आती हैं। एक बार एक बधिक पशु-पक्षियोंको मारनेके लिये धनुष-बाण लेकर जंगलमें घूम रहा था। एक पेड़पर पपीहा बैठा था। इधर तो बधिक उसके ऊपर बाणका निशाना लगाता है और उधर एक बाज उसी पपीहेको मारनेके लिये धावा बोलता है। ऐसे संकटमें पपीहेने भगवान्को याद किया। पूर्वजन्मके संस्कारसे पशु-पक्षियोंमें भी ऐसी बात आ जाती है, जो मनुष्योंमें भी नहीं आती। कबके संस्कार न जाने कब जाग्रत् हो जायँ—इसका पता नहीं चलता। अचानक उस वृक्षमेंसे एक साँप निकला और उसने बधिकको काट लिया। साँपके काटते ही बधिकका हाथ हिला और बाण छूट गया। वह बाण जाकर बाजको लगा। बधिक और बाज—दोनों मर गये और पपीहेकी रक्षा हो गयी।
चातक तरु ठाणे शिर अरि जाणे
पारधि वाणे दिसताणे।
जाकूँ अहि हाणे शर छूटाणे
जाय लगाणे सीचाणे॥
पप्पीह तु प्राणे टल विधनाणे
हरिहि पिछाणे निजहेतम्।
ब्रह्म हो अविनाशी आनंदराशी
दोषविनाशी सुखदेतम्॥
(करुणानिधान १५)
एक बधिकने वनमें एक मृगको मारा और उसको उठाकर चला। रास्तेमें प्यास और थकावटसे व्याकुल होकर वह एक पेड़की छायामें आकर बैठ गया। उस वृक्षपर एक पालतू तोता बैठा हुआ था, जो पिंजड़ेसे निकलकर भाग आया था। इतनेमें एक साँप निकला और उसने बधिकको काट लिया। वहाँ उसे तोतेने दो बार ‘राम-राम’ कहा—बधिकने भगवान्का नाम सुना तो उसके मुखसे भी दो बार ‘राम-राम’ निकला और वह मर गया। मरनेपर उसे ले जानेके लिये यमराजके दूत आये, पर उधरसे उसे वैकुण्ठमें ले जानेके लिये भगवान्के पार्षद भी आ गये। यमदूतोंने उनको रोका और कहा कि इसको कैसे ले जाते हो? इसने तो बहुत जीवोंको मारा है, बहुत पाप किये हैं। इसलिये यह नरकोंमें जायगा। भगवान्के पार्षदोंने कहा कि इसने अन्तसमयमें भगवान्का नाम लिया है, इसलिये इसका कल्याण होगा। दोनोंमें विवाद छिड़ गया। फैसला करनेके लिये सम्पूर्ण पापोंको और नामको तौला गया तो नाम बड़ा वजनदार निकला। अत: बधिकको निर्भय धाम मिल गया—
व्याध एक मारियो मिरग, व्याल डस्यो तरु छाँय।
तृषा मरत शुक सुनि गिरा, नाम प्रगट उर माँय॥
उभय वार श्रवणां सुणे, उभय वार मुख गाय।
अन्तकाल ऐसो भयो, ततछिन भए सहाय॥
जमकिंकर बंधे महा, बंध छुड़ाई ताय।
हरिपुरवासी आय के, लेखै न्याव चुकाय॥
एके चेलै अघ सबै, एके चेलै नाम।
ऐसी विधि भव तारणा, निर्भय दीधो धाम॥
(करुणासागर ६७—७०)
भगवान्का नाम अपार, अनन्त शक्ति रखता है। उसके सामने पाप कितने हैं—ऐसी गणना नहीं हो सकती। जैसे, किलोभर रूईको जलानेके लिये एक दियासलाई होनी चाहिये तो कुन्तलभर रूईको जलानेके लिये चालीस दियासलाई होनी चाहिये? नहीं। एक ही दियासलाई सबको जला देगी। वहाँ यह माप-तौल नहीं होता कि जितनी रूई है, उसको जलानेके लिये अग्नि भी उतनी ही हो। इसी तरह पाप कितने हैं और भगवान्का नाम कितना है—यह गिनती नहीं होती। मकानमें ठसाठस अँधेरा भरा हो तो एक दीपककी लौ करते ही सब भाग जाता है। संसार क्षणभंगुर है, नश्वर है, जा रहा है, नष्ट हो रहा है। परंतु भगवान्, भगवान्का नाम, भगवान्की महिमा, भगवान्का प्रभाव नित्य-निरन्तर रहनेवाला है। उस रहनेवालेके सामने यह बहनेवाला कुछ ताकत नहीं रखता।
शरीर, इन्द्रियाँ आदि नाशवान् हैं, परिवर्तनशील हैं और स्वयं (जीवात्मा) अविनाशी है, अपरिवर्तनशील है। इन दोनोंका ठीक तरहसे ज्ञान हो जाय अथवा नाशवान्का आश्रय छोड़कर परमात्माके चरणोंका आश्रय ले ले। नाशवान्का आश्रय लेना, उसको अपना आधार मानना बहुत बड़ी गलती है। रुपयोंसे मेरा काम हो जायगा, कुटुम्बियोंसे काम हो जायगा, शरीरसे ऐसे हो जायगा; मेरेमें बड़ी भारी योग्यता है, मेरेमें बड़ी विद्या है, मेरेको बड़ा पद मिला हुआ है, मैं बड़ा अधिकारी हूँ—ये सब बदलनेवाले और मिटनेवाले हैं। अगर इन सबका सहारा छोड़कर केवल भगवान्का सहारा ले लिया जाय तो निहाल हो जायँ!
सबसे पहले इस बातको जाननेकी आवश्यकता है कि विनाशी और अविनाशी—ये दो चीजें हैं। इसको जानना मनुष्यका खास काम है। भगवान्ने गीताके आरम्भमें ही यह विषय चलाया। दूसरे अध्यायके ग्यारहवें श्लोकसे लेकर तीसवें श्लोकतक भगवान्ने सत्-असत्, नित्य-अनित्य; देह-देही, शरीर-शरीरी—इन दोनोंके भेदको बताया। इन दोनोंका भेद ठीक समझमें आ जाय तो कर्मयोग, ज्ञानयोग, भक्तियोग आदि सब-के-सब साधन सुगम हो जाते हैं। इनका भेद समझे बिना साधन कठिन हो जाता है। इनका भेद ठीक समझमें आ जाय तो हम परिवर्तनशीलसे ऊँचे उठ जायँगे, इसमें सन्देहकी बात नहीं है। कारण कि वास्तवमें हम परिवर्तनशीलसे ऊँचे हैं। हम जैसे हैं, वैसा अनुभव करनेमें क्या कठिनता है? नित्य और अनित्य, सत् और असत् अविनाशी और विनाशी—इनके भेदको ठीक तरहसे समझनेपर तत्त्वबोध हो जाता है और जन्म-मरणके चक्करसे छुटकारा हो जाता है। प्रकृतिके गुणोंका संग, आसक्ति, प्रियता, खिंचाव ही जन्म-मरणका खास कारण है—‘कारणं गुणसंगोऽस्य सदसद्योनिजन्मसु’ (गीता १३।२१)।
बहुत-से भाई कहते हैं कि क्या करें, मन नहीं लगता और मन लगे बिना कुछ नहीं होता। भजनमें मन नहीं लगा तो भजन करनेसे क्या फायदा? राम-राम करते हो, पर मन लगे बिना कुछ नहीं—ऐसा निर्णय दूसरे लोग भी दे देते हैं। झट दूसरोंको निर्णय दे देना, सम्मति दे देना बुद्धिकी अजीर्णता है। उनसे पूछो कि आपने ऐसा करके देखा है क्या? इलाज करनेके लिये अच्छे-अच्छे वैद्य हैं, पर आजकल हरेक आदमी इलाज करना चाहता है। इसको अमुक चीज दे दो, ठीक हो जायगा; अमुक चीज मत दो, उससे ठीक नहीं होगा—ऐसी सम्मति चलते-चलते दे देते हैं। उनसे पूछो कि तुमने आयुर्वेद पढ़ा है? ना। वैद्यकी करते हो? ना। यह बुद्धिका अजीर्ण है।
गोस्वामी तुलसीदासजी महाराजका जन्म बीत गया राम-रामके ऊपर। पहले उनका नाम ‘रामबोला’ था; क्योंकि जन्म लेते समय वे ‘राम’ बोले। ‘तुलसीदास’ नाम तो पीछे हुआ। वे कहते हैं—
भायँ कुभायँ अनख आलसहूँ।
नाम जपत मंगल दिसि दसहूँ॥
(मानस, बाल० २८। १)
भगवान्का नाम लेते ही दसों दिशाओंमें मंगल-ही-मंगल होता है। दुर्भावसे भी नाम लिया जाय तो वह भी कल्याण करता है। परन्तु लोग कहते हैं कि मन नहीं लगा तो कुछ नहीं! भाई-बहन ध्यान देकर मेरी बातपर विचार करें। पहले मन लग जाय, फिर नाम लेंगे—ऐसा कभी होनेवाला नहीं है। भगवान्का नाम लेते-लेते ही मन लगेगा। कम-से-कम आप नाम लेना शुरू तो कर दो। लोग खुद तो कुछ करते नहीं और ‘मन नहीं लगा तो कोई फायदा नहीं’—ऐसा कहकर दूसरोंका भी साधन छुड़ा देते हैं! आप भी नरकोंमें जाते हैं और दूसरोंको भी ले जाते हैं। सज्जनो! खास खतरनाक चीज क्या है? नाशवान् वस्तुओंमें हमारा जो मोह है, प्रियता है, खिंचाव है, यह है खतरेकी चीज। नाशवान्की प्रियता ही आपको रुलायेगी—‘प्रियस्त्वां रोदयति।’
संसारका राग, खिंचाव अज्ञानका चिह्न है, मूर्खताकी खास पहचान है—‘रागो लिंगमबोधस्य चित्तव्यायामभूमिषु।’ जितने दर्जेका नाशवान्में खिंचाव है, उतने ही दर्जेका मूर्ख है। वृक्षके कोटरमें आग लगा दे और फिर ऊपरकी तरफ देखकर प्रतीक्षा करे कि वृक्ष कब हरा होगा, उसमें कब फल-फूल लगेंगे, तो यह मूर्खता ही है। इसी तरह संसारमें तो राग है और देखते हैं कि सुख-शान्ति मिलेगी, प्रसन्नता होगी! यह होगा नहीं कभी।
मनुष्य क्या करते हैं? राग तो बढ़ाते जाते हैं और चाहते हैं शान्ति। इतना धन हो जाय तो सुख हो जायगा, इतनी सम्पत्ति हो जाय तो सुख हो जायगा। अरे भाई! धन-सम्पत्तिके होनेसे सुख नहीं होता। आपको वहम हो तो परीक्षा करके देख लें। जिसके पास ज्यादा-से-ज्यादा धन हो, उससे मिलकर पूछ लो कि आपको किसी तरहका दु:ख तो नहीं है? किसी तरहकी अशान्ति तो नहीं है? वह पोल निकाल देगा तो आपका समाधान हो जायगा!
एक घरमें चूहे बहुत हो गये। उनको मारना तो ठीक नहीं, पकड़कर दूर जंगलमें छोड़ दें, जहाँ वे सुरक्षित रहें—ऐसा सोचकर चूहोंको पकड़नेके लिये तारोंसे बना पिंजड़ा ले आये। उसमें रोटीके टुकड़े रख दिये और उसको अँधेरेमें रख दिया। अब चूहे आते हैं और चारों तरफ चढ़ते हैं कि किसी तरहसे पिंजड़ेमें पड़ी रोटी मिल जाय तो हम निहाल हो जायँ! ढूँढ़ते-ढूँढ़ते दरवाजा मिल जाता है। उधर जाते ही स्प्रिंग लगी हुई पत्ती (बोझ पड़नेपर) नीचे झुक जाती है और चूहा पिंजड़ेमें चला जाता है। भीतर जाते ही पत्ती वापस ऊपर हो जाती है। इधर बाहर खटका लगता है और उधर चूहेके भीतर खटका लगता है। अब वह रोटी खाना भूलकर इधर-उधर दौड़ता है और बाहर निकलनेका उद्योग करता है कि निकलूँ कैसे? बाहरवाले चूहे समझते हैं कि यह भीतरवाला चूहा बड़ी मौजमें है। अन्दर कितनी रोटी पड़ी है और कितनी मौजमें घूमता है। हम ही बाहर रह गये। उनमेंसे कोई दरवाजा ढूँढ़ लेता है और उसके भीतर चला जाता है तो मुश्किल हो जाती है। दोनों पिंजड़ेके भीतर लड़ते हैं और इधर-उधर दौड़ते हैं। बाहरके चूहे देखते हैं कि ये तो मौज करते हैं, हम बाहर वंचित रह गये। इस तरह चूहे उसमें फँसते जाते हैं। यह पिंजड़ा तो दूसरोंका बनाया हुआ होता है। परन्तु जिस पिंजड़ेमें हम फँसते हैं, वह हमारा ही बनाया हुआ होता है।
जिनके पास धन कम होता है, वे देखते हैं कि झूठ, कपट, बेईमानी, चोरी आदि करके किसी तरहसे अधिक-से-अधिक धन इकट्ठा कर लें तो हम सुखी हो जायँगे। धन हो जानेसे खूब मौज हो जायगी, आनन्द हो जायगा। जिनका विवाह नहीं हुआ है, वे देखते हैं कि विवाह किये हुए बड़ी मौजमें हैं, हम रीते ही रह गये। किसी तरहसे हमारा विवाह हो जाय! जब उनका विवाह हो जाता है और पूछते हैं—जै रामजीकी! क्या ढंग है? तब वे कहते हैं—फँस गये! बड़े शहरोंमें नौकरी करते हैं। अकेले होते तो कहीं भी रह जाते, पर अब बड़ी मुश्किल हो गयी! बाल-बच्चोंको कहाँ रखें? कैसे रहें? उनकी पढ़ाई आदिका प्रबन्ध करना है। वे बड़े हो जायँ तो उनका विवाह करना है। बड़ी आफत आ जाती है। ऐसे ही लोग कहते हैं कि वे बड़े धनी आदमी हैं, बड़े सुखी हैं, बड़े आराममें हैं। उनके पास रहकर देखो। उनको रातमें चैनसे नींद नहीं आती। समयपर भोजन नहीं कर सकते। दोपहरके दो बज जायँ तो भी रोटी खानेकी फुरसत नहीं मिलती। रातमें ग्यारह-बारह बज जाते हैं। मेरे सामने ऐसे अनेक उदाहरण आये हैं। मैं केवल पुस्तककी बात नहीं कहता। देखी हुई बात भी कहता हूँ। पुस्तकोंकी बातें सच्ची हैं ही; क्योंकि ऋषि-मुनियोंने अनुभव करके लिखा है।
कलकत्ताकी बात है। एक सज्जन दलालीका काम करते थे और सत्संगमें आया करते थे। वे कहते कि ये धनी आदमी सत्संग क्यों नहीं करते? इनके पास बहुत धन है, बैठकर खायें तो भी अन्त नहीं आये, फिर भी सत्संग क्यों नहीं करते? ऐसा वे कहा करते। अब उनके पास भी धन ज्यादा हो गया तो उनका भी सत्संगमें आना बन्द हो गया। अब सत्संगके लिये समय नहीं मिलता। उनसे बातें हुईं। पहले आपको दीखता था कि धनी आदमी सत्संग क्यों नहीं करते, अब आप क्यों नहीं करते? करें कैसे, धंधा बहुत बढ़ गया है, वक्त नहीं मिलता।
सरोवरमें जैसे-जैसे पानी बढ़ता है, वैसे-वैसे कीचड़ भी बढ़ता है। पहले कम होता है, फिर ज्यादा होने लगता है। जैसे-जैसे धन बढ़ता है, वैसे-वैसे दरिद्रता भी बढ़ती है। परन्तु मनुष्यका उस तरफ ध्यान नहीं होता, विचार नहीं होता। साधारण आदमीको सौ या हजार रुपयोंकी भूख रहती है, पर हजार रुपयेवालेको हजारोंकी भूख रहती है। लखपतिको लाखोंकी और करोड़पतिको करोड़ोंकी भूख रहती है। ज्यों-ज्यों धन बढ़ता है, त्यों-त्यों भूख भी बढ़ती है। साधारण आदमीको लाखोंकी भूख नहीं रहती। परन्तु इस तरफ कोई देखता नहीं। यही देखते हैं कि अपने पास धन अधिक हो जाय तो मौज हो जायगी।
भाइयो! ध्यान दो। अधिक पैसोंकी आवश्यकता नहीं है। जितने पैसे आपके पास हैं, उन्हींका बढ़िया-से-बढ़िया उपयोग करें। उससे बड़ा भारी पुण्य होगा। अधिक पैसोंसे अधिक पुण्य होगा—यह कायदा नहीं है। जितनी आपकी शक्ति है, जितना आप खर्च कर सकते हैं, उतना खर्च करनेसे आपका उद्धार हो जायगा। धनी आदमी बहुत खर्च करेगा, तब कल्याण होगा। साधारण आदमीका साधारण खर्चेसे कल्याण हो जायगा।
युधिष्ठिरजी महाराजने बड़ा ही विलक्षण यज्ञ किया। उन्होंने दुर्योधनको खजानेपर रखा। बैर रखनेवालेके हाथमें खजाना दिया कि वह ज्यादा लुटायेगा तो यज्ञ बढ़िया हो जायगा। आजकल लोग खजानेपर कंजूस आदमीको रखते हैं, जो ज्यादा खर्च न करे। कंजूसीसे अपयश होता है। दुर्योधन दस गुना देते थे, जिससे सब तरफ बड़ी प्रशंसा हुई। ब्राह्मणलोग प्रशंसा करने लगे कि वाह-वाह! युधिष्ठिरजी महाराजने बड़ा भारी यज्ञ किया! उसी समय वहाँ एक नेवला आया और मनुष्यकी भाषामें बोला कि इसी वनमें रहनेवाले एक ब्राह्मण परिवारका जो यज्ञ मैंने देखा, उसके सामने यह यज्ञ कुछ नहीं है। उन्होंने पूछा कि क्या देखा? नेवला कहने लगा—ब्राह्मण, ब्राह्मणी, बेटा और उसकी बहू—ये चार प्राणी इस वनमें रहते थे। वे बड़े शुद्ध ब्राह्मण थे। ब्राह्मण तपोधन होते हैं। त्याग ही उनका धन होता है। वे शिलोञ्छवृत्तिसे अपना जीवन-निर्वाह करते थे। खेतोंमें अनाज काटनेके बाद जमीनपर जो अन्न (ऊमी, सिट्टा आदि) गिरा पड़ा हो, वह भूदेवों (ब्राह्मणों)-के हकका होता है। उनको चुनकर अपना निर्वाह करना ‘शिलोञ्छवृत्ति’ है। एक बार ब्राह्मणोंको कई दिनोंसे अन्न नहीं मिला। एक दिन जौके खेतमें कुछ जौ मिले। ब्राह्मणने लाकर घरमें दे दिये। सास-बहूने उनका आटा बनाया और भूनकर सतुआ तैयार किया। राजस्थानमें घी चीनी डालकर जो सत्तू बनाया जाता है, वह नहीं। केवल आटा भुना हुआ सतुआ तैयार किया। चारों प्राणी कई दिनके भूखे थे। उन्होंने उस सतुआके पाँच विभाग किये।
जब रसोई बनती है तब उसको पूरी-की-पूरी स्वयं खा लेना पाप है। जो केवल अपने लिये भोजन पकाकर खाते हैं, वे पापी पापका भक्षण करते हैं—‘भुञ्जते ते त्वघं पापा ये पचन्त्यात्मकारणात्’ (गीता ३। १३)। मनुजीने भी कहा है—‘केवलाघी भवति केवलादी’ जो अपने लिये भोजन बनाता है, वह पापका भक्षण करता है। रसोई बनी तो अतिथि-सत्कार करना गृहस्थका धर्म है। भगवान्ने ब्रह्मचारी, वानप्रस्थी, संन्यासी सबका पालन-पोषण करनेकी जिम्मेवारी गृहस्थपर रखी है। इसलिये कोई घरपर आ जाय तो कुछ दे दो। पेटभर खिलाना ही है—ऐसा कोई नियम नहीं है; परन्तु कुछ दो। लौकिक कहावत है—हाथका उत्तर दो, जबानका उत्तर मत दो।
ब्राह्मणने बलिवैश्वदेव कर दिया, भगवान्को भोग लगा दिया, फिर पाँच पत्तलोंमें परोस करके बाहर जाकर अतिथिको देखने लगे। रसोई बनकर तैयार हो जाय तो बलिवैश्वदेव करके जितनी देरमें एक गाय दुहे, उतनी देर अतिथिकी प्रतीक्षा करनी चाहिये। अतिथि न आये तो उसका हिस्सा निकालकर भोजन कर सकते हैं। अगर भोजनसे पहले अतिथि आ जाय तो अतिथिको भोजन देकर फिर स्वयं भोजन करना चाहिये। इतनेमें ही एक ब्राह्मण आ गये। उनको भिक्षाके लिये कहा तो वे आ गये। उनको भीतर ले गये और अतिथिके लिये रखा हुआ सतुआ दे दिया। उसको वे पा गये। घरके ब्राह्मण देवताने उनको अपने हिस्सेका सतुआ दे दिया। अतिथि ब्राह्मण वह भी पा गये। ब्राह्मणीने जाकर अपने पतिदेवसे कहा कि प्राणनाथ! अभीतक अतिथिकी तृप्ति नहीं हुई है, उसको मेरा भी हिस्सा दे दो। ब्राह्मणने उसको समझाया कि देखो, तुम स्त्री-जाति हो, भूख अधिक लगती है। तुम भूख सहन नहीं कर सकोगी। जब हमने अतिथिका सत्कार कर दिया तो गृहस्थके धर्मका पालन हो गया। तुम कोई चिन्ता मत करो। ब्राह्मणीने कहा कि आप भूखे रहें और मैं खाऊँ—ऐसा कभी हो नहीं सकता। ब्राह्मणीने ज्यादा हठ किया तो उसका हिस्सा भी अतिथिको दे दिया। वे उसे भी पा गये। अब बेटा पहुँचा पिताजीके पास। दान-पुण्य करना, श्राद्ध आदि करना परिवारके बड़े (मुख्य) व्यक्तिका काम होता है। इसलिये लड़केने अतिथिको अपना हिस्सा खुद न परोसकर पिताजीसे प्रार्थना की। पिताजी (ब्राह्मण)-ने कहा कि देखो बेटा! तेरी अवस्था छोटी है। छोटी अवस्थामें अग्नि तेज होती है, भूख ज्यादा लगती है। इसलिये तुम खाओ। हम तो बूढ़े हैं, हमारी कोई बात नहीं। बेटा माना नहीं। उसने बहुत हठ किया तो उसका हिस्सा भी अतिथिको परोस दिया। अब बेटेकी बहू पहुँची अपनी सासके पास और बोली कि माताजी! मेरा भाग भी अतिथिको दे दीजिये, जिससे वे तृप्त हो जायँ। हम कई दिनोंसे भूखे हैं, एक दिन और भूखे रह जायँ तो क्या है! बहुत हठ करनेपर उसका हिस्सा भी अतिथिको दे दिया गया। अतिथिको देकर चारों प्राणी बहुत प्रसन्न हुए कि आज तो बड़े आनन्दकी बात हो गयी!
यदि कोई दान देकर पछताता है, दु:खी हो जाता है, तो वह दान उतना फलीभूत नहीं होता। देकर प्रसन्न हो जाय कि आज हम निहाल हो गये! अपना पेट भरा रहनेपर अन्न देना सुगम है। लाखों, करोड़ों रुपये रहनेपर थोड़े रुपये देना सुगम है। परन्तु भूखे पेट अन्न देना मामूली बात नहीं, बड़ा मुश्किल काम है। आपने सुन लिया, हमने कह दिया, जोर क्या आया? पता तब लगे जब ऐसा काम पड़े। वे चारों प्राणी देकर बहुत प्रसन्न हुए कि आज तो हम निहाल हो गये! वे अतिथि ब्राह्मण धर्मराज रूपसे प्रकट हो गये और बोले कि तुम कितने धर्मात्मा हो—इसकी मैंने परीक्षा ली थी। आज मैं हार गया, तुम जीत गये! तुमने धर्मपर विजय कर ली। अब तुम इसी शरीरसे स्वर्गमें चलो। वे सब धर्मराजके साथ चले गये। वह नेवला कहता है कि मैंने यह सब देखा! पत्तलके ऊपर आचमनका पानी बिखरा था। वहाँ जाकर जब मैंने लोट लगायी तो शरीरके जितने भागमें वह पानी लगा, उतना भाग सोनेका हो गया। बाकीका भाग भीगा नहीं, इसलिये पूरा शरीर सोनेका नहीं हुआ। मैंने इस यज्ञकी महिमा सुनी कि युधिष्ठिरजी महाराजने बड़ा भारी यज्ञ किया है। यहाँ आकर मैं कीचड़में लोटा तो कीचड़ और लग गया, रोयाँ एक भी सोनेका नहीं हुआ! आप इस यज्ञकी झूठी प्रशंसा क्यों करते हो?
अब आप विचार करें, इतना दान-पुण्य करनेपर भी युधिष्ठिरजीका यज्ञ उतना बड़ा नहीं हुआ, जितना उस ब्राह्मणके द्वारा हुआ। अधिक दान देनेसे अधिक पुण्य हो जायगा—यह बात है ही नहीं। बहनोंके मनमें बहुत रहती है कि हमारे पास धन होगा तो ऐसा दान करूँगी, ऐसा उद्यापन करूँगी, वैशाख नहाऊँगी, ऐसा करूँगी, वैसा करूँगी। न जाने कितने-कितने मनोराज्य होते हैं! बहनो! आपके पास जितना है, उसके अनुसार करो। मालपर जगात (टैक्स) लगती है। आपके पास माल नहीं तो जगात किस बातकी? आपके पास जितना है, उतना ही आपपर लागू होता है।
सत्त सारु दत्त बाँटिये, ‘नापो’ कहत नरां।
निपट नकारो न दीजिये, उणद देख घरां॥
(‘नापो कवि कहते हैं कि मनुष्यो! अपनी शक्तिके अनुसार दान दो। घरमें अभाव देखकर किसीको साफ ‘ना’ मत कहो, प्रत्युत कुछ-न-कुछ दे दो।’)
शक्तिके अनुसार दो तो वह बड़ा भारी दान हो जायगा। महिमा वस्तुके सदुपयोगकी है। यह नहीं कि ज्यादा धन होगा तो हम दान-पुण्य करेंगे; तीर्थ, व्रत, यज्ञ आदि करेंगे, बड़े-बड़े सत्संग-समारोह करेंगे; परन्तु क्या करें, हमारे पास पैसा नहीं है! सज्जनो! पैसा नहीं है तो आपपर दान, तीर्थ, व्रत, यज्ञ आदि करना लागू ही नहीं होता। आप भी छोटे बालकसे उतनी ही आशा रखते हैं, जितना वह कर सकता है। क्या भगवान् आप जितने भी जानकार और दयालु नहीं हैं? क्या भगवान् आपकी शक्तिको नहीं जानते? आपको उतना ही करना है, जितनी आपकी शक्ति है। आपके पास जो योग्यता, परिस्थिति आदि है, उसका सदुपयोग करो तो कल्याण कम नहीं होगा। युधिष्ठिरजीसे उस ब्राह्मणका यज्ञ कम नहीं था। पासमें खानेको भी नहीं था; परन्तु यज्ञ हो गया युधिष्ठिरजीके यज्ञसे बढ़कर!
ऐसी इच्छा न करें कि अधिक हो जाय तो अधिक करेंगे। जो पासमें है, उसीका अच्छे-से-अच्छा उपयोग करो। प्राप्त परिस्थितिका बढ़िया-से-बढ़िया सदुपयोग करें तो वह काम छोटा नहीं होगा, बड़े महत्त्वका हो जायगा। मैंने एक कथा सुनी है। वह किसी दाक्षिणात्य रामायणमें आती है, ऐसा सुना है। रामजी और रावणका आपसमें घमासान युद्ध हो रहा था। इतनेमें एक गिलहरी दोनों हाथोंमें तिनका लेकर रामजीके पास पहुँची और बोली कि मैं अभी रावणको मार दूँ! भगवान् उसपर प्रसन्न हो गये। उसपर हाथ रखा, जिससे (अँगुलियोंके स्पर्शसे) वे लकीरें हो गयीं। गिलहरीमें रावणको मारनेकी क्या ताकत है? पर उसने अपना पूरा बल लगा दिया, जिससे भगवान् खुश हो गये।
आप दूसरेके उद्धारके लिये अपनी पूरी शक्ति लगा दें। भगवान् देखते हैं कि मामूली शक्ति होते हुए भी वह दूसरोंके उद्धारके लिये चेष्टा करता है तो मैं कम-से-कम इसका उद्धार तो कर ही दूँ! साधारण शक्तिवाला भी जब अपनी पूरी शक्ति लगाकर दूसरोंके हितकी चेष्टा करता है, तो अच्छे-अच्छे सन्त-महात्माओंपर और भगवान् पर भी उसका असर पड़ता है। एक बच्चा कुछ बोझा उठाता है तो कहते हैं कि वाह-वाह, कितना बोझा उठा लिया! जबकि उसी बोझेको आप एक हाथसे उठाकर रख सकते हैं। बच्चेने अपनी पूरी शक्ति लगाकर बोझा उठाया, इसीलिये आप उसकी वाह-वाह करते हैं। ऐसे ही सज्जनो! आपको जो वस्तु, परिस्थिति आदि मिली है, उसीका सदुपयोग करो। आप चाहते हैं कि धन मिल जाय, अच्छी परिस्थिति मिल जाय, हमारा शरीर नीरोग हो जाय तो हम अपना कल्याण कर लेंगे, पर क्या करें, हमारे पास विद्या, बुद्धि, योग्यता नहीं! वास्तवमें आपसे अधिक विद्या, बुद्धि, योग्यताकी कोई आशा रखता ही नहीं। भगवान् भी आशा नहीं रखते। आपके पास जितना है, उसीका अच्छी तरहसे उपयोग कीजिये; भगवान् कल्याण कर देंगे। सज्जनो! परिस्थिति कल्याण करनेवाली नहीं होती। कल्याण करनेवाली है—परिस्थितिका सदुपयोग करनेकी युक्ति। वह आप ठीक तरहसे विचारपूर्वक समझ लें और परिस्थितिका सदुपयोग करें तो उससे कल्याण हो जायगा।
बचपनमें पढ़ी हुई एक कहानी याद आ गयी। ‘बीरबल-विनोद’ पुस्तकमें बादशाह अकबर और बीरबलका संवाद है। एक बार बादशाहने पूछा कि शस्त्र कौन-सा बड़ा है, जिससे विजय हो जाय? बीरबलने सीधा राजस्थानी भाषामें उत्तर दिया—‘ओसाण (अवसर) बादशाहने विचार किया कि इसकी परीक्षा करेंगे। एक दिन बीरबल बादशाहके साथ जंगलमें गया। वह बड़ा बुद्धिमान् ब्राह्मण था। बादशाहकी उसपर बड़ी कृपा थी। वह अपनी रसोई अलग बनाकर खाता था। वहाँ जंगलमें वह एकान्तमें अपनी रोटी बना रहा था। बादशाहने एक हाथीको मदिरा पिलाकर बीरबलकी तरफ छोड़ दिया कि देखें, अब यह कैसे अपनी रक्षा करता है? बीरबलने देख लिया कि हाथी आ रहा है। वहाँ एक कुतिया बैठी थी। बीरबलने कुतियाको रोटीका टुकड़ा दिया। ज्यों ही हाथी नजदीक आया, कुतियाके पैर पकड़कर हाथीपर फेंका। कुतिया जाकर हाथीके माथेपर लगी। हाथी भाग गया पीछे कि न जाने यह क्या आफत आ गयी! अब हाथी भगानेका यह भी शस्त्र कभी किसीने सुना है? यह तो मौका, अवसर है कि हाथीको भगा दिया। बादशाहने कहा कि ठीक है जो ओसाण (अवसर) आ जाय, वही शस्त्र है। इसी तरह जो अवसर आ जाय वही दान है, पुण्य है।
लोगोंमें कहावत है—‘छल-बलकी खेती भली, बेला-पुलको दान।’ वर्षा बरसते ही चट खेती कर लो तो वह हो जायगी। दो दिनके बाद वह नहीं होगा, जो आरम्भमें हो जायगा। इसी प्रकार जब सुपात्र मिल जाय, तभी दान दे दो तो उसका बड़ा भारी पुण्य होता है। द्रौपदीकी एक बात हमने सुनी है। द्रौपदी पहले जन्ममें भी एक स्त्री थी। एक दिन वह नदीमें जल भरने गयी। सरदीका समय था। एक ब्राह्मण देवता लँगोटी लगाकर नदीमें स्नान कर रहा था। संयोगवश उसकी लँगोटी पानीमें बह गयी। बाहर माताएँ खड़ी थीं। वह बेचारा ठण्डसे काँपने लगा। परन्तु बाहर कैसे आये? कपड़ा था नहीं पासमें। उस स्त्रीने देखा कि इस बेचारेके पास कपड़ा नहीं है और सरदीमें ठिठुर रहा है। उसने अपनी साड़ीकी लीरी फाड़कर उसकी तरफ फेंकी, पर वह बह गयी। एक-दो लीरी और भी फेंकी, पर वे भी बह गयीं। फिर एक लीरी पत्थर बाँधकर फेंकी तो वह उसके हाथमें आ गयी और उसकी लँगोटी लगाकर वह बाहर निकल आया। उस स्त्रीके मनमें यह भाव नहीं आया कि अपनी साड़ी कैसे फाड़ दूँ? उस एक चीरकी लीरसे कितना बढ़ गया चीर! जब द्रौपदीका चीर खींचा गया, उस समय भगवान्ने कहा—
आरतवान अतीत को, दीवी चीर कि लीर।
मैं न बढ़ायौ द्रौपदी, तू हि बढ़ायौ चीर॥
बेचारा दु:खी ब्राह्मण जलमें काँप रहा था। लज्जा-निवारणके लिये तूने अपना चीर फाड़कर दे दिया। उसी कारण यह तुम्हारा चीर बढ़ गया। ‘दुस्सासन की भुजा थकित भई, बसन रूप भये स्याम।’ इस प्रकार समयपर जो दान दिया जाता है, वस्तुका सदुपयोग किया जाता है, उसका बड़ा भारी माहात्म्य होता है।
आपके पास शक्ति कम है, परिस्थिति भी बड़ी विकट आयी हुई है, फिर भी आप घबरायें नहीं, प्रत्युत सोचें कि इस समय क्या किया जाय। कुछ-न-कुछ उपाय निकल आयेगा। आपके द्वारा बड़ा उपकार हो जायगा, जो आपका कल्याण कर देगा। सज्जनो! वस्तु परिस्थितिकी महिमा नहीं है, उसके उपयोगकी महिमा है। आप अनुकूल परिस्थितिका भी सदुपयोग कर सकते हैं और प्रतिकूल परिस्थितिका भी। स्वस्थताका भी सदुपयोग कर सकते हैं और अस्वस्थताका भी। पासमें बहुत कुछ हो अथवा कुछ न हो—दोनों परिस्थितियोंका आप सदुपयोग कर सकते हैं। इसलिये आप अपनी परिस्थिति देखकर घबरायें नहीं। उस परिस्थितिका सदुपयोग करें तो भगवान् प्रसन्न हो जायँगे।